दो दशकों के इंतज़ार के बाद ऐतिहासिक करार… भारत-ईयू एफटीए से नई आर्थिक धुरी

करीब दो दशकों की बातचीत, ठहराव और रणनीतिक बदलावों के बाद भारत और यूरोपीय संघ ने ऐसा मुक्त व्यापार समझौता पूरा किया है, जो दोनों पक्षों के लिए एक पीढ़ी में सबसे अहम आर्थिक करार बन गया है। खास बात यह रही कि इस समझौते का औपचारिक समापन ब्रसेल्स के बजाय नई दिल्ली में 16वें भारत-ईयू शिखर सम्मेलन के दौरान हुआ। गणतंत्र दिवस समारोह में यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डर लेयेन और यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष एंतोनियो कोस्टा की मौजूदगी ने इस क्षण को और भी ऐतिहासिक बना दिया। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र और सबसे बड़े लोकतांत्रिक समूह ने वैश्विक व्यापार की दिशा को नए सिरे से परिभाषित किया।

इस समझौते का प्रतीकात्मक महत्व भी कम नहीं है। भारत और यूरोप के बीच व्यापारिक संबंध सदियों पुराने हैं, लेकिन उस इतिहास में समानता नहीं दिखती। यूरोपीय शक्तियों ने लंबे समय तक एकाधिकार, शुल्क और शोषणकारी नीतियों के जरिए भारतीय अर्थव्यवस्था को कमजोर किया। यूरोप ने औद्योगिक प्रगति की, जबकि भारत ने उसकी कीमत चुकाई। अब पहली बार भारत ने यूरोप के साथ व्यापार वार्ता एक आत्मविश्वासी और संप्रभु साझेदार के रूप में की है।

पिछले वर्ष हुआ भारत-ब्रिटेन सीईटीए इस बदलाव का संकेत देता था, लेकिन भारत-ईयू एफटीए (फ्री ट्रेड अग्रीमेंट) का दायरा और प्रभाव उससे कहीं बड़ा है। वैश्विक अर्थव्यवस्था के बिखराव ने इस प्रक्रिया को तेज किया। चीन की आक्रामकता और अमेरिका की ऊंची शुल्क नीति ने बड़े देशों को स्थिर और भरोसेमंद विकल्प तलाशने पर मजबूर किया। यूरोपीय संघ आपूर्ति शृंखला, तकनीकी सुरक्षा और जनसांख्यिकीय चुनौतियों को लेकर सतर्क है। ऐसे में भारत उसके लिए स्वाभाविक विकल्प बनकर उभरा है।

भारत ने भी इस समझौते में रणनीतिक परिपक्वता के साथ प्रवेश किया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में जीएसटी सुधार, श्रम कानूनों का आधुनिकीकरण, पीएलआई योजनाएं और बुनियादी ढांचे में निवेश ने देश की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता को मजबूत किया। साथ ही भारत ने अपनी व्यापार नीति को यथार्थवादी आधार दिया। 2019 में आरसीईपी से बाहर रहने का फैसला इसी सोच को दर्शाता है कि भारत केवल वहीं उदारीकरण करेगा, जहां लाभ जोखिम से अधिक होंगे।

रणनीतिक स्तर पर यह एफटीए इसलिए सफल रहा क्योंकि इसने भारत की व्यापार नीति की तीन कसौटियों को पूरा किया। पहला, विकसित अर्थव्यवस्थाओं के साथ समझौते, जहां प्रत्यक्ष प्रतिस्पर्धा कम और पूरकता अधिक हो। दूसरा, सेवाओं और पेशेवर गतिशीलता पर जोर, क्योंकि भारत की असली ताकत कौशल और ज्ञान आधारित क्षेत्रों में है। तीसरा, तकनीकी या पर्यावरणीय मानकों को छिपे हुए अवरोध न बनने देना। भारत-ईयू एफटीए इन तीनों मानकों पर खरा उतरा।

व्यावहारिक रूप से यह समझौता एक नहीं बल्कि 27 एफटीए का रूप लेता है। यह दो अरब से अधिक आबादी और वैश्विक जीडीपी के लगभग एक चौथाई हिस्से को जोड़ता है। वस्तुओं के क्षेत्र में भारत को 97 प्रतिशत टैरिफ लाइनों पर 99.5 प्रतिशत निर्यात के लिए तरजीही पहुंच मिली है। 70 प्रतिशत लाइनों पर तुरंत शून्य शुल्क लागू होगा। कपड़ा, चमड़ा और समुद्री उत्पाद जैसे श्रम-प्रधान क्षेत्रों को बड़ा लाभ मिलेगा। सेमीकंडक्टर और बैटरी जैसे उन्नत क्षेत्र भी यूरोपीय आपूर्ति शृंखला में प्रवेश करेंगे। निर्यातकों को करीब 6.41 लाख करोड़ रुपये का अनुमानित लाभ मिलेगा।

यूरोपीय संघ को भी 96.6 प्रतिशत वस्तुओं पर शुल्क समाप्त होने से हर साल लगभग चार अरब यूरो की बचत होगी। भारत ने कृषि जैसे संवेदनशील क्षेत्रों की सुरक्षा सुनिश्चित की है। ऑटोमोबाइल क्षेत्र में कोटा आधारित उदारीकरण के जरिए संतुलन बनाया गया है, जिससे उपभोक्ताओं को लाभ मिलेगा और घरेलू विनिर्माण को नुकसान नहीं पहुंचेगा।

अनुपालन व्यवस्था को भी सरल बनाया गया है। स्टेटमेंट ऑफ ओरिजिन के जरिए स्व-प्रमाणीकरण समय और लागत दोनों घटाएगा। उत्पाद-विशिष्ट नियम, संक्रमण काल और एमएसएमई से जुड़े क्षेत्रों के लिए तय कोटा प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देंगे।

इस समझौते का सबसे परिवर्तनकारी पहलू सेवाएं और पेशेवर गतिशीलता हैं। यूरोपीय संघ ने 144 उप-क्षेत्रों में और भारत ने 102 उप-क्षेत्रों में प्रतिबद्ध पहुंच दी है। पेशेवरों के अस्थायी प्रवेश, परिवार के साथ रहने और सामाजिक सुरक्षा समझौतों के रोडमैप से भारतीय प्रतिभा को यूरोप में नई ऊर्जा मिलेगी और वहां के कौशल संकट को भी राहत मिलेगी।

कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म के दौर में भारत ने यह भी सुनिश्चित किया कि जलवायु नियम व्यापार बाधा न बनें। एमएफएन आधार पर आश्वासन, कार्बन मूल्य निर्धारण की मान्यता और तकनीकी सहयोग इस दिशा में अहम हैं।

आर्थिक पहलुओं से आगे यह शिखर सम्मेलन भारत-ईयू सुरक्षा और रक्षा साझेदारी तथा 2030 तक की संयुक्त रणनीतिक कार्ययोजना की घोषणा भी करता है। कानूनी प्रक्रिया भले बाकी हो, लेकिन इस समझौते ने एक स्पष्ट संदेश दिया है। अस्थिर वैश्विक माहौल में भारत-ईयू एफटीए संतुलन, भरोसे और भविष्य की साझेदारी का प्रतीक बनकर उभरा है। यह केवल व्यापारिक करार नहीं, बल्कि भारत की वैश्विक भूमिका का स्पष्ट बयान है।

Subscribe to our channels on WhatsApp, Telegram &  YouTube. Follow us on Twitter and Facebook

Related Articles

Shomen Chandra
Shomen Chandra
Shomen Chandra contributes articles to select media organisations. He is the founding editor of The Tilda Times and holds a postgraduate degree in journalism and mass communication.

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Latest Articles

Sign up to receive HinduPost content in your inbox
Select list(s):

We don’t spam! Read our privacy policy for more info.