उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में चल रहे माघी मेले के दौरान कुछ ऐसी घटनाएं घटी हैं, जिन्होंने न केवल तीर्थराज प्रयागराज, बल्कि पूरे देश के हिंदू समाज को ‘सिंहावलोकन’ के लिए विवश कर दिया है।
विवाद की शुरुआत माघी अमावस्या पर एक पीठासीन शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी को त्रिवेणी संगम में स्नान से रोकने के लिए प्रशासन द्वारा बल प्रयोग से हुई। इसके पश्चात, प्रदेश के प्रभावशाली सत्तासीन योगी आदित्यनाथ जी द्वारा बिना नाम लिए किसी को ‘कालनेमि’ कहे जाने पर चर्चा गर्म हो गई। परिणाम स्वरूप, आज पूरा समाज उस ‘कालनेमि’ की खोज में जुटा है जिसका जिक्र प्रत्यक्ष रूप से कोई नहीं कर रहा। वर्तमान परिवेश में किसी व्यक्ति या संगठन को सीधे कालनेमि कहना जटिल है, क्योंकि आहत पक्ष अपनी प्रतिष्ठा की दुहाई देकर न्यायालय की शरण ले सकता है।
रामायण काल में कालनेमि एक मायावी राक्षस था। रावण का यह मंत्री और मामा (मारीच का पुत्र), छद्म वेश धारण करने में निपुण था। जब हनुमान जी लक्ष्मण जी के प्राण बचाने हेतु संजीवनी बूटी लेने जा रहे थे, तब कालनेमि ने साधु का वेष धरकर उन्हें रोकने का प्रयास किया था और अंततः मारा भी गया।
माना जाता है कि हर युग में कालनेमि का प्रादुर्भाव होता है। प्रश्न यह है कि वर्तमान युग में वह कौन है जो सामाजिक, सांस्कृतिक या राजनीतिक क्षेत्र में रूप धारण कर हिंदू धर्म और समाज को ठगने का प्रयास कर रहा है? यह लेख उस अज्ञात कालनेमि की पहचान हेतु शब्दावली और कृत्यों के विश्लेषण पर आधारित एक प्रयास मात्र है। पाठक अपने विवेक से निर्णय लें।
जब इन ‘आधुनिक कालनेमियों’ से उनके कार्यों के बारे में पूछा जाता है, तो उत्तर प्रायः अस्पष्ट होते हैं। वे कभी व्यक्ति निर्माण, कभी राष्ट्र सेवा तो कभी हिंदू एकता का दावा करते हैं। किंतु उनके द्वारा निर्मित व्यक्तियों की कोई प्रामाणिक सूची उपलब्ध नहीं है। विडंबना यह है कि वे अपने भाषणों में महाराणा प्रताप, स्वामी विवेकानंद, छत्रपति शिवाजी महाराज, रानी लक्ष्मीबाई, सरदार पटेल, श्यामा प्रसाद मुखर्जी, डॉ. अंबेडकर, चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह या सावरकर जैसे महापुरुषों का नाम लेते हैं, जिनका निर्माण कालनेमियों ने नहीं किया।
वे उन नेताओं का भी श्रेय लेते हैं जो प्रधानमंत्री पद तक पहुंचे, किंतु उन नेताओं के व्यक्तिगत चरित्र पर प्रश्नचिह्न लगते रहे हैं। कालनेमियों द्वारा पिछले सदी में वास्तव में किन व्यक्तियों का निर्माण हुआ, इसकी पारदर्शी सूची के स्थान पर केवल ‘मनोहर कहानियां’ परोसी जा रही हैं। यहाँ तक कि वर्तमान में राष्ट्रहित में सक्रिय कुछ प्रमुख मुख्यमंत्रियों के व्यक्तित्व विकास में भी इन कालनेमियों की कोई भूमिका नहीं रही है।
कालनेमी राजनीतिक दल के लिए ‘हिंदू एकता’ केवल चुनावी भाषणों में बोले जाने वाला एक जुमला मात्र है। इनकी परिभाषा में एकता का मापदंड केवल चुनावी परिणाम है। जीत मिलने पर हिंदू एकता की दुहाई दी जाती है और हारने पर—जैसा कि कर्नाटक विधानसभा चुनाव के समय देखा गया—अपनी प्रशासनिक विफलताओं और भ्रष्टाचार को छिपाने के लिए हिंदू समाज में ‘एकता की कमी’ को दोष दिया जाता है।
सत्ता पाते ही ये समाज को विभिन्न वर्गों में बांटने का खेल शुरू कर देते हैं ताकि आगामी चुनावों के लिए नया सामाजिक या राजनीतिक समीकरण तैयार हो सके। हाल ही में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा जारी किया गया विवादस्पद दिशा-निर्देश इसका एक उदाहरण है जिसके द्वारा सरकार देश के उच्च शिक्षण संस्थानों में छात्रों को जाति के आधार पर बांटने की कथित कोशिश कर रही है।
राजनीतिक क्षेत्र में कार्यरत कालनेमि के लिए ‘हिंदू’ वही है जो इनका अंधभक्त हो या इन्हें वोट दे; प्रश्न पूछने वालों को ये तत्काल ‘विधर्मियों का एजेंट’ घोषित कर देते हैं। कौन हिन्दू है और कौन हिन्दू नहीं है, इसका जबानी सर्टिफिकेट देने का दंभ भी रखते हैं।
‘सामाजिक समरसता’ सुनने में सुखद लगती है, किंतु इसके पीछे की सोच सनातन धर्म की मौलिक संरचना को आघात पहुंचाने वाली हो सकती है। सामाजिक क्षेत्र में सक्रिय कालनेमियों द्वारा बिना धर्म, जाति, गोत्र और कुल के विचार के वैवाहिक संबंधों को बढ़ावा देना, हिंदू समाज को ‘वर्णसंकरता’ की ओर ले जाने का प्रयास प्रतीत होता है। यह उस लक्ष्य की प्राप्ति का षड्यंत्र है जिसे विदेशी आक्रांता व मिशनरी सदियों में भी हासिल नहीं कर पाए। श्रीमद् भागवत गीता (१:४३) में भी इस दोष के परिणाम का वर्णन मिलता है कि वर्णसंकर पैदा करनेवाले दोषों से कुलघातियों के सनातन कुल धर्म और जाति धर्म नष्ट हो जाते हैं।
दोषैरेतैः कुलघ्नानां वर्णसङ्करकारकैः।
उत्साद्यन्ते जातिधर्माः कुलधर्माश्च शाश्वतः॥
विकास के नाम पर ये कोई क्रांतिकारी परिवर्तन लाने के बजाय आम जनता से निरंतर ‘त्याग’ की अपेक्षा करते हैं। पुरानी योजनाओं को नया नाम देकर अपने व्यावसायिक मित्रों को लाभ पहुंचाना, भारी कर वसूली, तुष्टिकरण की राजनीति और आरक्षण के नाम पर जातिगत विद्वेष फैलाना इनकी कार्यशैली बन गई है।
कालनेमि की सबसे बड़ी पहचान हिंदू प्रतीकों का दुरुपयोग है। उनके लिए हिंदू धर्म एक ‘जीवन शैली’ मात्र है, न कि कोई विशिष्ट आध्यात्मिक परंपरा। वे भौगोलिक आधार पर सबको हिंदू मानकर हिंदू देवी-देवताओं में आस्था की अनिवार्यता को समाप्त करना चाहते हैं। यहाँ तक कि गुरु-शिष्य परंपरा को खंडित करने और जीवित गुरु के स्थान पर निर्जीव वस्तुओं को थोपने के प्रयास भी दिखाई देते हैं। कभी-कभी तो ये हिंदुओं को अपने आराध्यों को भुलाकर काल्पनिक प्रतीकों की पूजा करने की सलाह तक दे डालते हैं।
दिलचस्प बात यह है कि कोई भी कालनेमि व्यक्ति या समूह शुरू में हिन्दू समाज की सेवा के नाम पर कार्य प्रारम्भ करता है मगर कालांतर में हिन्दू धर्म की गलतियां गिनाते-गिनाते स्वयं एक अलग संप्रदाय विशेष का रूप ले लेता है। तब शुरू होता है कालनेमियों का मनोहर मायाजाल जिसमें होते हैं इनके अपने (नकली) शंकराचार्य, परम पूजनीय संगठन प्रमुख, मनगढ़ंत प्रार्थना व मंत्र, पूजा पद्धति आदि जो जरूरी नहीं है कि हिन्दू – शास्त्र संगत हो।
आज के आधुनिक युग में कालनेमि हर मोड़ पर छद्म रूप में खड़े हैं। यह विभेद करना कठिन हो गया है कि कौन वास्तव में हिंदू हित में है और कौन ढोंग कर रहा है। समस्त हिंदू समाज को अत्यंत सतर्क होकर अपने आसपास सक्रिय इन ‘आधुनिक कालनेमियों’ को
उनके कृत्यों से पहचानने की आवश्यकता है।
— डॉ गोविंद माधव
