एन. पुरुषोत्तम मलय: कोंकणी के प्रति समर्पित विद्वान
कोंकणी भाषा और संस्कृति के व्यापक इतिहास में एन. पुरुषोत्तम मलय का स्थान विशेष रूप से उल्लेखनीय है। उन्होंने अपने जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा कोंकणी भाषा, साहित्य, इतिहास और सांस्कृतिक विरासत के अध्ययन तथा संरक्षण के लिए समर्पित किया। वे केवल कोंकणी के प्रेमी नहीं थे, बल्कि भाषा और उससे जुड़ी सांस्कृतिक स्मृतियों को गंभीरता से समझने और आगे पहुँचाने वाले विद्वान, साहित्यकार, कवि और इतिहास-अध्येता के रूप में भी जाने गए।
मलय की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में उनकी कोंकणी भाषा के प्रति गहरी निष्ठा और विद्वत्तापूर्ण दृष्टि थी। उनके लिए कोंकणी केवल बोलचाल की भाषा नहीं थी; वह एक समुदाय के इतिहास, साहित्य, पहचान और सामूहिक स्मृति का आधार थी। इसी दृष्टिकोण से उन्होंने कोंकणी की साहित्यिक और सांस्कृतिक परंपराओं के महत्व को सामने रखा।
उनकी रुचि केवल कोंकणी तक सीमित नहीं रही। भारतीय भाषाओं और साहित्य की व्यापक परंपरा के प्रति उनका दृष्टिकोण भी उल्लेखनीय था। तमिल की महान शास्त्रीय कृति ‘तिरुक्कुरल’ के प्रति उनकी रुचि और अध्ययन उनके व्यापक भारतीय साहित्यिक दृष्टिकोण को दर्शाता है। इससे यह समझने में सहायता मिलती है कि अपनी मातृभाषा और सांस्कृतिक विरासत के प्रति गहरा लगाव रखते हुए भी अन्य भारतीय भाषाओं और साहित्यिक परंपराओं के प्रति सम्मान और जिज्ञासा बनाए रखी जा सकती है।
कोंकणी भाषा की आधुनिक यात्रा में वर्ष 1992 में संविधान की आठवीं अनुसूची में कोंकणी का शामिल होना एक ऐतिहासिक उपलब्धि थी। 71वें संविधान संशोधन के माध्यम से मिली इस मान्यता ने कोंकणी को भारत के संवैधानिक भाषाई ढाँचे में महत्वपूर्ण स्थान दिया। कोंकणी साहित्य और भाषा के लिए लंबे समय तक कार्य करने वाले लेखकों, विद्वानों, सांस्कृतिक संगठनों और समुदाय के प्रयासों की व्यापक पृष्ठभूमि में इस उपलब्धि को समझना चाहिए।
मलय का योगदान इसी व्यापक भाषाई और सांस्कृतिक चेतना से जुड़ा हुआ था। उनका जीवन यह दिखाता है कि किसी भाषा के संरक्षण के लिए केवल उसका उपयोग करना पर्याप्त नहीं है; उसके साहित्य का अध्ययन, इतिहास का दस्तावेजीकरण, सांस्कृतिक स्मृतियों का संरक्षण और नई पीढ़ी तक उस विरासत को पहुँचाना भी उतना ही आवश्यक है।
उनके साहित्यिक और सांस्कृतिक योगदान को भारत सरकार के पद्म श्री सम्मान से राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता मिली। पद्म श्री भारत के प्रमुख नागरिक सम्मानों में से एक है। यह सम्मान उनके योगदान को केवल कोंकणी समुदाय के संदर्भ में ही नहीं, बल्कि भारत की व्यापक भाषाई और सांस्कृतिक विरासत के संदर्भ में भी महत्वपूर्ण बनाता है।
मलय की उपलब्धियों को इसलिए केवल पुरस्कार या व्यक्तिगत साहित्यिक योगदान तक सीमित करके नहीं देखा जाना चाहिए। उनकी सबसे स्थायी विरासत भाषा के प्रति समर्पण, साहित्य और इतिहास के प्रति उनकी रुचि तथा भारतीय भाषाई विविधता को व्यापक सांस्कृतिक दृष्टि से देखने की उनकी क्षमता में निहित है।
आज जब अनेक भारतीय भाषाएँ नई पीढ़ी के बीच अपनी निरंतरता बनाए रखने की चुनौती का सामना कर रही हैं, मलय का जीवन एक महत्वपूर्ण संदेश देता है—भाषा को जीवित रखने के लिए उसे बोलना ही नहीं, बल्कि पढ़ना, लिखना, शोध करना, उसकी स्मृतियों को सुरक्षित रखना और अगली पीढ़ी तक पहुँचाना भी आवश्यक है।
इसी कारण एन. पुरुषोत्तम मलय को याद करना केवल एक व्यक्ति को श्रद्धांजलि देना नहीं है। यह कोंकणी भाषा, साहित्य और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण के प्रति उस दीर्घकालीन प्रतिबद्धता को याद करना भी है, जिसे उन्होंने अपने जीवन और कार्य के माध्यम से महत्व दिया।
— वी राजेश मोहन राव
