यह लेख बंगाल की एक ऐसी देवी को समर्पित है जो भक्ति और करुणा का अनूठा संगम थी तथा बंगाल पुनर्जागरण के सबसे महत्वपूर्ण लोगों में से एक थी। हां, यहां बात हो रही हैं रानी रासमणि की जिनके योगदानों को आज भी जनता स्मरण करती है तथा उनके चरणों में नतमस्तक होती हैं।
प्रारंभिक जीवन एवं परिवार
रानी रासमणि का जन्म 28 सितंबर 1793 को तत्कालीन बंगाल प्रेसीडेंसी के कोना ग्राम में हुआ था। उनके पिता हरेकृष्ण दास गृह निर्माण कला में निपुण थे जबकि उनकी माता का नाम रामप्रिया दास था। जब रासमणि केवल सात वर्ष की थी तभी उनकी माता का निधन हो गया। अपने यौवन में वो परम सुंदरी हुआ करती थीं।
विवाह एवं संतानें
जब रानी केवल ग्यारह वर्ष की थी तभी उनका विवाह कोलकाता के एक धनी ज़मींदार बाबू राजचंद्र दास से हुआ। उनके चार पुत्रियां थीं जिनके नाम थे पद्ममणि, करुणामयी, कुमारी और जगदंबा। उनके पति काफ़ी आधुनिक विचारों वाले थे तथा अपनी विशाल ज़मींदारी को संभालने के शुरुआती सिद्धांत उन्होंने ही अपनी पत्नी को सिखाये।
रानी का नेतृत्व
1836 में अपने पति के निधन के पश्चात जमींदारी एवं वित्तीय मामलों का पूरा भार रानी ने उठाया। संपत्ति विरासत में मिलने के बाद न केवल उन्होंने इसके प्रबंधन में असाधारण दक्षता दिखायी, बल्कि शहर में धर्मार्थ कार्यों के द्वारा लोगों के दिलों में अपनी एक खास जगह बनायी साथ ही अपनी नेतृत्व क्षमता एवं साहसिकता के कारण जनता के द्वारा भरपूर प्रेम मिला।
धार्मिक कार्य
कोलकाता का प्रसिद्ध दक्षिणेश्वर काली मंदिर रानी रासमणि के ही प्रयासों का परिणाम है। वह कालीमाता की परम भक्त थी और लोककथा के अनुसार एक रात स्वप्न में कालीमाता ने ही रानी को यह निर्देश दिया था कि उनके लिए एक मंदिर का निर्माण किया जाये। रासमणि ने इस दिव्य आशीर्वाद को सत्य किया और इस ऐतिहासिक मंदिर का निर्माण कराया। ये रानी रासमणि ही थीं जिन्होंने रामकुमार चट्टोपाध्याय को मंदिर का मुख्य पुजारी नियुक्त किया जिनके साथ उनके भतीजे गदाधर भी सहायता हेतु आये। यही गदाधर बाद में स्वामी रामकृष्ण परमहंस के रुप में विख्यात हुए तथा अपने चाचा की मृत्य के बाद उन्होंने ही मुख्य पुजारी के रुप में अपनी सेवाएं दी। और इन्हीं के एक महान शिष्य, स्वामी विवेकानंद न केवल भारत में, बल्कि पूरे विश्व में अपने कार्यों, विचारों और शिक्षाओं द्वारा विख्यात हुए। साथ ही तीर्थयात्रियों की सुविधा हेतु सुवर्णरेखा नदी से श्री जगन्नाथ पुरी तक एक सड़क का निर्माण कराया। इसके अलावा गंगास्नान की सुविधा हेतु हुगली नदी के किनारे बाबूघाट, अहेरीतोला घाट तथा नीमताल घाट का निर्माण भी रानी द्वारा करवाया गया था।
अंग्रेजों से टक्कर
साल 1840 में अंग्रेज़ी सरकार द्वारा हुगली नदी में मछली पकड़ने पर टैक्स लगा दिया गया था जिससे मछुआरों की रोज़ी रोटी ठप हो गई थी। विदेशियों की ओर से यह तर्क दिया गया कि मछलियां पकड़ने के जालों के कारणों स्टीमर्स के आवागमन में बाधा उत्पन्न होती है। मछुआरे सहायता हेतु रानी के पास पहुंचे और सारी बातें विस्तार से समझाई। उन्होंने मछुआरों की मदद के लिए एक अनोखा उपाय निकाला। एक डील के तहत ईस्ट इंडिया कंपनी को दस हज़ार रुपए दिए गए जिसके बदले नदी के किनारे का दस किलोमीटर का हिस्सा उन्हें मिला। अपने हिस्से के किनारों पर उन्होंने लोहे की मोटी ज़ंजीरें लगवा दी और उस जगह को कुछ ऐसे घेरा जिससे कि वो अलग ही स्थान बन गया। रानी ने अब मछुआरों से कहा कि वे इस स्थान पर मछलियां पकड़ सकते हैं। जंजीरों से घेराबंदी के चलते अंग्रेजों के स्टीमर बीच में ही अटकने लगे। इस पर कंपनी ने रानी से स्पष्टीकरण मांगा, तो उन्होंने अपने करार के कागजात पेश कर दिए। साथ ही, मछुआरों की कठिनाइयों का भी उल्लेख किया। अंत में अंग्रेजी हुकूमत को झुकना पड़ा। वे समझ गए कि रानी ने मछुआरों की मदद के लिए ही यह कदम उठाया था। इसके बाद, उन्होंने हुगली में मछली पकड़ने पर लगे भारी टैक्स को पूरी तरह से हटा लिया।
समाज सुधार के कार्य
उन्होंने विधवा पुनर्विवाह के लिए समाज सुधारक और विद्वान ईश्वर चंद्र विद्यासागर के अभियान का अप्रत्यक्ष रूप से समर्थन किया। उन्होंने बहुविवाह के विरुद्ध एक ड्राफ्ट बिल भी ईस्ट इंडिया कंपनी को प्रस्तुत किया था। रानी रासमणि ने तत्कालीन इंपीरियल लाइब्रेरी (अब भारतीय राष्ट्रीय पुस्तकालय) और हिंदू कॉलेज (अब प्रेसीडेंसी यूनिवर्सिटी) को भी दिल खोलकर दान दिया। उनका घर प्रत्येक शरद ऋतु में पारंपरिक दुर्गा पूजा उत्सव का स्थल था और इसे पूरी धूमधाम से मनाया जाता था।
देहावसान
19 फरवरी 1861 को 67 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया। उनके सम्मान में कोलकाता में कई स्थानों पर उनकी प्रतिमाएं स्थापित की गई हैं। इसके अतिरिक्त साल 1993 में भारतीय डाक विभाग ने उनकी स्मृति में एक डाक टिकट भी जारी किया गया था। ऐसी महान विभूति को हमारा शत शत नमन।
