जिन में स्वप्न आकार लेते है वो एक गहन ऊर्जा, उच्च महत्वाकांक्षा से युक्त युवा की दृष्टि होती है। इसलिए नवाचार भी अक्सर इसी उम्र में आकार लेते हैं । भगवान राम, स्वामी विवेकानंद , भगवान बिरसा मुंडा, माँ रानी गाईदिन्ल्यू ने जीवन के जिस चरण में राष्ट्र जागरण किया वो एक युवा की ही आयु थी । जनजाति समाज को उनकी धर्म संस्कृति की रक्षा करते हुए सर्वांगीण विकास की दिशा में ले जाना वनवासी कल्याण आश्रम का लक्ष्य है। आगे चलकर युवाओं की सहभागिता को ध्यान में रख 2020 में इसके द्वारा ‘युवा-कार्य’ के रूप में स्वतंत्र आयाम प्रारंभ किया गया।
और अब कल्याण आश्रम द्वारा प्रकाशित पत्रिका वन बंधु का 2025 के नवंबर माह का विशेषांक युवाओं को समर्पित है। पढ़ने में आया, 2022 में आजादी का अमृत महोत्सव मनाया गया तो जनजाति समाज के नायकों के योगदान से पढ़ा-लिखा वर्ग सुपरिचित हो इस हैतु विश्वविद्यालयों में व्याख्यानों , प्रदर्शनी का आयोजन किया गया। इस दौरान कुल 110 विश्वविद्यालयों के 50000 से अधिक छात्र-छात्राओं से संवाद हुआ।
जगदेव राम उरांव (पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष, कल्याण आश्रम) , दिलीप सिंह जुदेव , नरहरि प्रसाद सहाय(विष्णु देव सहाय , मुख्यमंत्री छग के चाचा) , जनजाति समाज के अनेक अर्जुन सहाय जैसे विस्तारक-प्रचारक अपने युवा काल में ही बाला साहब देशपांडे के संपर्क में आकर तपे हुए कार्यकर्ता बनकर निकले। शबरी कन्या छात्रावास रायपुर, निवेदिता छात्रावास रुद्रपुर, श्रीराम छात्रावास गोरखपुर जैसे संस्थानों से निकलकर अनेक युवक आगे चलकर असम, नागालेंड, मणिपुर , त्रिपुरा आदि पूर्वाञ्चल प्रदेशों में कार्यकर्त्ता बनकर जनजाति समाज में परंपरागत सांस्कृतिक अस्मिता जागरण कर क्षेत्र की स्थिति को बदलने में सहायक हुए। युवा विशेषांक में इसका बड़ा ही प्रेरक वर्णन मिलता है।
‘ तू-मैँ एक रक्त’ के संदेश के साथ प्रयागराज कुम्भ में 6-7 फरवरी, 2025 को वनवासी कल्याण आश्रम-युवा आयाम द्वारा ‘जनजाति युवा कुम्भ’ आयोजित किया गया। पूर्वोत्तर राज्य, गुजरात, झारखंड-छत्तीसगढ़, दक्षिण भारत के 10,000 से अधिक जनजातीय युवाओं ने इसमें भाग लिया। उनके पारंपरिक परिधानों, वाद्य यंत्रों से युक्त आसाम के बिहू , झारखंड का छाऊ , छत्तीसगढ़ के कर्मा लोक नृत्यों की प्रस्तुति से सम्पूर्ण भारतवर्ष की साझा-संस्कृति मुखरित हुई।
पारंपरिक ज्ञान को लेकर प्रकाशित लेख पड़कर ध्यान में आया कि कैसे जड़ी-बूटी, फल-बीज आदि प्राकृतिक संसाधनों के सहारे जनजाति समाज ने स्वास्थ और उपचार की ऐसी रसायन रहित, पर्यावरण अनुकूल चिकित्सा-पद्धति विकसित करी जो कि बतलाती है प्रकृति ही औषधालय है। और कैसे आयुर्वेद की ही तरह ये भी शरीर-मन-बुद्धि और आत्मा के समग्र स्वास्थ के विचार पर आधारित है।
जनजाति समाज में एक सख्त नियम है कि जीवन साथी का चयन आदिवासी समुदाय में ही हो। निश्चित रिश्तेदार के साथ कभी-कभी विवाह अनिवार्य भी माना जाता है। लड़के के पिता लड़की के घर जाते हैं, और दुल्हन के समक्ष शादी का प्रस्ताव रखते हैं। वसावा जनजाति में अपने बच्चों की शादी
माता-पिता निर्णायक होते हैं।
व्यक्तित्व निर्माण के साथ समाजिक-राष्ट्रीय आत्म बोध जागरण को लेकर शुरू किये गए निर्माण-प्रकल्प की अवधारणा ये दिखाता है कि वनवासी कल्याण आश्रम बदलते वक्त के साथ पूरे कदम ताल मिलते हुए आगे बढ़ते जाने में कभी कोई कसर न छोड़ेगा। सूदूर ग्रामीण क्षेत्र से आने वाले जनजाति छात्र-छात्राओं के लिए आगे नौकरी प्राप्त करने के लिए आवश्यक कोचिंग को वहन कर पाना आर्थिक कारणों से कठिन होता है । इसी को लेकर कोचिंग की सुविधा के विचार ने आकार लिया।
न केवल जल, जंगल, जमीन पर अधिकार बल्कि जनजाति-संस्कृति की सुरक्षा का भी पूरा प्रावधान पेसा एक्ट में है। लेकिन शिक्षा के अभाव में लोग इस लाभ से वंचित ही रह जाते है। लेकिन इस कमी को दूर करने के लिए शिक्षित युवाओं की टोली ने कैसे आगे बढ़ कर अपने योगदान दिया इस पर आधारित लेख बड़ा प्रेरक है।
