चीन के आधुनिक इतिहास में तीन-विरोधी और पाँच-विरोधी अभियान सत्ता के दमनकारी चरित्र के सबसे स्पष्ट उदाहरण रहे हैं। इन अभियानों ने न केवल चीनी समाज की नैतिक और आर्थिक संरचना को तोड़ा, बल्कि भय, अविश्वास और हिंसा को शासन का औजार बना दिया। चीनी कम्युनिस्ट पार्टी और उसके सर्वोच्च नेता माओ त्से तुंग ने इन अभियानों के माध्यम से सत्ता पर अपनी पकड़ मजबूत की और असहमति की हर आवाज को कुचलने का रास्ता चुना।
सबसे पहले तीन-विरोधी अभियान पर दृष्टि डालना आवश्यक है। वर्ष 1951 में माओ के नेतृत्व में इस अभियान की शुरुआत हुई। पार्टी ने भ्रष्टाचार, अपव्यय और नौकरशाही प्रवृत्तियों को निशाना बनाने का दावा किया। सुनने में यह सुधारवादी कदम लगा, लेकिन व्यवहार में पार्टी ने इसे आतंक के अभियान में बदल दिया। सरकार ने अधिकारियों और कर्मचारियों पर सार्वजनिक आरोप लगाए। उसने आत्मस्वीकृति के लिए दबाव बनाया और मानसिक उत्पीड़न को सामान्य प्रक्रिया का रूप दिया। परिणामस्वरूप, भय का वातावरण बना और हजारों लोगों ने अपमान और तनाव से आत्महत्या तक कर ली। पार्टी ने सुधार के नाम पर भय को शासन की नीति बनाया।
इसके तुरंत बाद पाँच-विरोधी अभियान ने स्थिति को और भयावह बना दिया। वर्ष 1952 में शुरू हुए इस अभियान ने व्यापारियों और उद्यमियों को सीधा निशाना बनाया। पार्टी ने रिश्वतखोरी, कर चोरी, सरकारी संपत्ति की चोरी, धोखाधड़ी और आर्थिक गड़बड़ियों के आरोप लगाए। उसने निजी क्षेत्र को शत्रु की तरह प्रस्तुत किया। माओ ने खुलेआम पूंजीपति वर्ग को वर्गशत्रु कहा और जनता को उनके विरुद्ध खड़ा किया। परिणामस्वरूप, चीन के शहरों में सार्वजनिक अपमान, भारी जुर्माने और संपत्ति की जब्ती आम दृश्य बन गए। सरकार ने व्यापारिक वर्ग की रीढ़ तोड़ दी और अर्थव्यवस्था को पार्टी नियंत्रण में धकेल दिया।

इन अभियानों ने सामाजिक विश्वास को नष्ट किया। पड़ोसी ने पड़ोसी पर आरोप लगाए। कर्मचारी ने अपने ही सहकर्मी को फंसाया। पार्टी ने इस माहौल को प्रोत्साहित किया क्योंकि उसे सत्ता की निरंतरता चाहिए थी। माओ ने वैचारिक शुद्धता के नाम पर संदेह को हथियार बनाया। उसने जनता को सिखाया कि पार्टी से अलग सोच देशद्रोह के समान है। इस मानसिकता ने चीनी समाज को भीतर से खोखला किया।
इसके अलावा, तीन-विरोधी और पाँच-विरोधी अभियानों ने कानून और नैतिकता को पार्टी के अधीन कर दिया। अदालतों ने स्वतंत्र भूमिका नहीं निभाई। पार्टी नेताओं ने फैसले तय किए और भीड़ ने उन्हें लागू किया। सार्वजनिक आलोचना सभाओं ने न्याय की जगह ले ली। लोग तख्तियों के साथ खड़े हुए और भीड़ ने उन्हें अपमानित किया। सत्ता ने न्याय की अवधारणा को नष्ट कर दिया और हिंसा को वैधता दी।
माओ त्से तुंग ने इन अभियानों के जरिए वैचारिक नियंत्रण को भी मजबूत किया। उसने प्रचार तंत्र को सक्रिय किया। अखबारों, पोस्टरों और भाषणों ने एक ही संदेश फैलाया कि पार्टी ही सत्य है। असहमति को अपराध के रूप में चित्रित किया गया। युवाओं को सिखाया गया कि वे अपने माता-पिता तक की शिकायत करें। इस रणनीति ने पारिवारिक और सामाजिक संबंधों को भी तोड़ दिया।
आर्थिक दृष्टि से भी इन अभियानों ने विनाशकारी प्रभाव डाला। व्यापारियों ने निवेश से हाथ खींच लिया। उत्पादन घटा और बाजारों में अस्थिरता फैली। पार्टी ने इसे वर्ग संघर्ष की जीत बताया, लेकिन वास्तविकता में चीन ने दीर्घकालिक आर्थिक क्षति झेली। निजी पहल के दमन ने नवाचार को कुचल दिया और भय ने उद्यमशीलता को समाप्त कर दिया।
समय के साथ, तीन-विरोधी और पाँच-विरोधी अभियानों ने आगे आने वाली सांस्कृतिक क्रांति का आधार तैयार किया। माओ ने देखा कि भय और जनउन्माद के सहारे वह समाज को नियंत्रित कर सकता है। उसने इसी मॉडल को और व्यापक रूप दिया। इसलिए इन अभियानों को केवल प्रशासनिक सुधार के प्रयास कहना इतिहास के साथ अन्याय होगा। वे सत्ता के केंद्रीकरण और दमन की योजनाबद्ध कवायद थे।
अंततः, इन अभियानों ने यह स्पष्ट किया कि चीनी कम्युनिस्ट पार्टी ने सत्ता के लिए मानव गरिमा को कुर्बान किया। माओ ने विचारधारा के नाम पर लाखों लोगों को मानसिक और आर्थिक तबाही की ओर धकेला। जब कोई सत्ता विचारधारा को मानवता से ऊपर रखती है, तब समाज भय और विनाश की राह पर चल पड़ता है। तीन-विरोधी और पाँच-विरोधी अभियान इसी कठोर सत्य की गवाही देते हैं।
