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Monday, February 2, 2026

सुप्रीम कोर्ट की रोक से बौखलाए JNU के वामपंथी, कैंपस में नफरत भरी नारेबाज़ी

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) एक बार फिर वामपंथी राजनीति के उग्र चेहरे का मंच बन गया। सुप्रीम कोर्ट द्वारा UGC के नए नियमों पर अंतरिम रोक लगाए जाने के बाद वामपंथी छात्र संगठनों ने कैंपस में ऐसा प्रदर्शन किया, जिसने लोकतांत्रिक असहमति की सीमाओं को लांघ दिया। साबरमती ढाबे पर जुटे इन संगठनों ने ढपली की ताल पर न केवल सरकार और संघ के खिलाफ नारे लगाए, बल्कि खुले तौर पर एक सामाजिक वर्ग को निशाना बनाते हुए आपत्तिजनक और विभाजनकारी शब्दों का प्रयोग किया।

प्रदर्शन के दौरान ‘ब्राह्मण मुर्दाबाद’, ‘मनुवाद जलेगा’ और ‘रोहित के हत्यारों को एक धक्का और दो’ जैसे नारे गूँजे। इतना ही नहीं, प्रदर्शनकारियों ने ‘ब्राह्मणवाद’ का पुतला फूँककर नफरत को प्रतीकात्मक रूप भी दे दिया। सामने आए वीडियो में छात्र ‘RSS मुर्दाबाद’ और ‘BJP बर्बाद’ के नारे लगाते साफ दिखाई दिए। यह दृश्य बताता है कि कैसे विचारधारा की आड़ में वामपंथी छात्र संगठन सामाजिक सौहार्द को चोट पहुँचाने से भी नहीं हिचकते।

दरअसल, यह पूरा हंगामा सुप्रीम कोर्ट के 29 जनवरी 2026 के उस आदेश के बाद हुआ, जिसमें अदालत ने UGC के नए नियमों पर अंतरिम रोक लगाई। अदालत ने यह स्पष्ट किया कि वह संघीय ढाँचे और राज्यों के अधिकारों से जुड़े पहलुओं पर विस्तार से विचार करना चाहती है। यह फैसला किसी विचारधारा के समर्थन या विरोध में नहीं था, बल्कि संवैधानिक संतुलन बनाए रखने की प्रक्रिया का हिस्सा था। इसके बावजूद वामपंथी संगठनों ने इस न्यायिक कदम को भी जातीय और वैचारिक चश्मे से देखने की कोशिश की।

इस रोक से नाराज होकर वामपंथी छात्र संगठनों ने सरकार के विरोध को ‘ब्राह्मणवाद विरोध’ में बदल दिया। यह रणनीति नई नहीं है। जब भी किसी संवैधानिक या नीतिगत फैसले से उनकी राजनीति को झटका लगता है, तब वे सीधे एक समुदाय को खलनायक के रूप में पेश करने लगते हैं। इससे न केवल बहस का स्तर गिरता है, बल्कि कैंपस का शैक्षणिक वातावरण भी जहरीला होता है।

गौर करने वाली बात यह है कि JNU में इस तरह की नारेबाजी पहली बार नहीं हुई। पिछले महीनों में ‘मोदी-शाह की कब्र खुदेगी‘ जैसे नारे भी इसी कैंपस से उठे थे, जिन्होंने पूरे देश में विवाद खड़ा किया। हर बार वामपंथी संगठन इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बताकर बच निकलने की कोशिश करते हैं, जबकि उनकी भाषा साफ तौर पर हिंसा और घृणा को उकसाती है।

साल 2022 में भी JNU में ब्राह्मण विरोधी नारे और दीवार लेखन सामने आए थे। उस समय कैंपस की दीवारों पर ‘ब्राह्मण-बनिया, हम तुम्हारे पीछे आ रहे हैं’, ‘हम बदला लेंगे’, ‘ब्राह्मण कैंपस छोड़ो’ और ‘अब खून बहेगा’ जैसे नारे लिखे गए। कुछ प्रोफेसरों के कक्षों के बाहर ‘शाखा में वापस जाओ’ जैसी धमकियाँ भी दी गईं। तब भी वामपंथी छात्र संगठनों ने आत्ममंथन करने के बजाय इसे व्यवस्था विरोध का नाम दिया।

आज का हालिया प्रदर्शन उसी मानसिकता की निरंतरता दिखाता है। वामपंथी छात्र संगठन न तो अदालत के फैसले की संवैधानिक भावना को समझना चाहते हैं और न ही अकादमिक विमर्श को प्राथमिकता देते हैं। वे हर मुद्दे को जातीय संघर्ष में बदलकर अपनी राजनीतिक जमीन बचाने की कोशिश करते हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या विश्वविद्यालय विचारों की प्रयोगशाला रहेगा या फिर वैचारिक उग्रता का अखाड़ा बनकर रह जाएगा। देश को अब इस सवाल का जवाब गंभीरता से तलाशना होगा।

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Shomen Chandra
Shomen Chandra
Shomen Chandra is a writer and columnist who contributes articles and opinion pieces to various media organisations. He previously served as the Editor of News4Fact and is currently pursuing a postgraduate degree in Journalism and Mass Communication.

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