स्टालिन के शासन में आतंक की बुनियाद व्यक्ति नहीं, बल्कि परिवार बना। सत्ता ने राजनीतिक शत्रुओं को अकेले नहीं देखा, बल्कि उन्हें रिश्तों के जाल में परिभाषित किया। राज्य ने अपराध को खून के रिश्तों से जोड़ा और दोष को परिवारों तक फैलाया। इसी सोच ने निजी संबंधों को राजनीतिक खतरे में बदल दिया। नतीजतन, किसी व्यक्ति की राजनीतिक पहचान उसके माता-पिता, पत्नी, बच्चों और यहां तक कि पूर्व पत्नी तक पर भारी पड़ी।
यह परंपरा स्टालिन ने शुरू नहीं की। रूस के इतिहास में सामूहिक दंड की जड़ें गहरी रहीं। पंद्रहवीं सदी में इवान द टेरिबल ने मॉस्कोवी के पुराने अभिजात वर्ग बोयारों को कबीलाई इकाइयों के रूप में खत्म किया। इसके बाद पीटर द ग्रेट ने भी ताकतवर परिवारों पर वार किया। इससे पहले मंगोल आक्रमण के समय चंगेज खान के शासन में भी कबीलाई जिम्मेदारी की अवधारणा चली, जहां एक सदस्य के अपराध की सजा पूरे परिवार को मिलती थी।
सोवियत शासन ने इस विरासत को वैचारिक रंग दिया। बोल्शेविक क्रांतिकारियों ने निजी जीवन और पारंपरिक परिवार को संदेह की नजर से देखा। वे परिवार को बुर्जुआ प्रवृत्तियों का अड्डा मानते थे। पार्टी नेताओं ने वर्ग शत्रुओं को ऐसे लोग कहा जो सामूहिक हित के बजाय परिवार को प्राथमिकता देते थे। कम्युनिस्ट विचारधारा ने निष्ठा का केंद्र मजदूर वर्ग और राज्य को बनाया। इस सोच में साथी भाई-बहन बने और पार्टी नेता पिता की भूमिका में आए।

स्टालिन के वर्षों में सत्ता ने कथित कुलकों, जनता के शत्रुओं और मातृभूमि के गद्दारों के रिश्तेदारों को बड़े पैमाने पर पकड़ा। पुलिस दस्तावेजों में पत्नी, बच्चे और बुजुर्ग माता-पिता को अक्सर आर्थिक आश्रित या सह-निवासी कहकर दर्ज किया गया। यह भाषा कोड की तरह काम करती रही और परिवार को सीधे निशाने पर ले आई।
स्टालिन ने वर्ग युद्ध के नाम पर दो बड़े अभियान चलाए। पहला अभियान मताधिकार से वंचित करने का रहा। कानून ने व्यापारियों, पादरियों, पूर्व जारशाही अधिकारियों, कुलीनों और श्वेत सेना के अफसरों को बुर्जुआ वर्ग बताकर अधिकार छीन लिए। ऐसे लोग समाज से बाहर कर दिए गए। लाखों लोगों को उत्तर और साइबेरिया के श्रम शिविरों में भेजा गया। दूसरा अभियान कुलक-विरोधी रहा, जो खेती के सामूहिकीकरण के साथ चला। इस दौरान फांसी, निर्वासन और भूख से लाखों किसानों ने जान गंवाई। दोनों अभियानों में राज्य ने परिवारों को एक इकाई के रूप में दंडित किया।
कृषक परिवार पर हमला सामूहिकीकरण का पर्याय बन गया। पोलितब्यूरो के आदेशों में कुलक घर और कुलक परिवार शब्दों का अदला-बदली के साथ प्रयोग हुआ। निर्वासन के समय पूरे परिवारों को एक साथ भेजा गया। मताधिकार छिनने के मामलों में भी आश्रितों को समान दंड झेलना पड़ा। इस नीति ने महिलाओं और बच्चों को भी अपराधी की तरह चिह्नित किया।

जातीय अल्पसंख्यकों के मामले में स्थिति और कठोर हुई। पार्टी अधिकारियों ने उनकी कबीलाई संरचनाओं को समाजवाद के रास्ते की बाधा बताया। जबकि परिवार इन समुदायों के लिए सामाजिक सहारा बने, सत्ता ने इन्हें विद्रोह की संभावना के रूप में देखा। गैर-रूसी आबादी के प्रति यह पूर्वाग्रह दमन को और तीखा बनाता गया।
सामूहिक दंड ने आतंक के प्रभाव को कई गुना बढ़ाया। 1930 के आदेश के बाद दो लाख कुलक परिवारों का दमन लगभग दस लाख लोगों को प्रभावित कर सका। 1929 में शहरी क्षेत्रों में मताधिकार से वंचित लोगों में 35 प्रतिशत आश्रित रहे, जबकि ग्रामीण इलाकों में यह संख्या लगभग आधी रही।
दिसंबर 1935 में स्टालिन ने कहा कि बेटा पिता के अपराध का जिम्मेदार नहीं होता। इस कथन से बच्चों को राहत का संकेत मिला। 1936 के संविधान ने वर्गहीन समाज की घोषणा की। इसके बावजूद व्यवहार में कलंक बना रहा।
1936 से 1938 के महा शुद्धिकरण में रिश्तेदारों पर दंड और बढ़ा। एनकेवीडी के आदेश ने गद्दार घोषित लोगों के परिवारों की पूरी जानकारी जुटाने को कहा। पंद्रह वर्ष से अधिक उम्र के बच्चों को खतरनाक माना गया। पत्नियों को पति के साथ गिरफ्तार कर श्रम शिविर भेजा गया। स्टालिन ने 1937 में खुले तौर पर परिवारों को खत्म करने की बात कही। पुरुष रिश्तेदारों को अक्सर मौत मिली, जबकि बच्चों और बेटियों को विशेष गृहों और शिविरों में रखा गया। बड़े शहरों में बसने पर भी रोक लगी।
अक्टूबर 1938 में पत्नियों को साथ दंडित करने का नियम बदला। इससे आतंक में कमी का संकेत मिला। फिर भी द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान गद्दारों के परिवारों पर गिरफ्तारी और निर्वासन जारी रहा। परिभाषा इतनी व्यापक रही कि लगभग हर नजदीकी रिश्तेदार इसकी जद में आया।
इस तरह स्टालिन के दौर में राजनीतिक हिंसा लगातार परिवार पर केंद्रित रही। हर अभियान ने रिश्तों के कलंक को और गहरा किया। सत्ता ने व्यक्ति नहीं, परिवार को शत्रु माना। सोवियत मार्क्सवाद में वर्ग से अधिक कबीले ने निर्णायक भूमिका निभाई।
