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Tuesday, February 10, 2026

दिल्ली दंगों में अर्बन नक्सल नेटवर्क की सुनियोजित भूमिका

उत्तर-पूर्वी दिल्ली में 23 से 26 फरवरी 2020 के बीच जो कुछ हुआ, वह स्वतःस्फूर्त नहीं था। मजहबी कट्टरपंथियों की हिंसा के साथ-साथ एक संगठित वैचारिक नेटवर्क ने जमीन तैयार की, माहौल बनाया और फिर पीड़ितों को ही कटघरे में खड़ा करने का अभियान चलाया। इन दंगों में दर्जनों हिंदुओं की जान गई, सैकड़ों घर और दुकानें जलीं, हजारों लोग पलायन को मजबूर हुए। छह वर्ष बाद भी पीड़ित परिवार डर और असुरक्षा के साये में जीवन जी रहे हैं। इन घटनाओं की जांच ने बार-बार संकेत दिया कि केवल सड़क पर पत्थर चलाने वाले ही जिम्मेदार नहीं थे, बल्कि अर्बन नक्सल विचारधारा से जुड़े चेहरे पर्दे के पीछे सक्रिय रहे।

Group discussion on urban Naxal activities and network in Delhi.

सबसे पहले 2019 के अंत में घटनाक्रम ने रफ्तार पकड़ी। 7 और 8 दिसंबर 2019 को हुई बैठकों ने आने वाले महीनों की दिशा तय की। इन्हीं बैठकों में चक्का जाम, सड़क अवरोध और विश्वविद्यालयों के माध्यम से भीड़ जुटाने की रणनीति बनी। छात्रों की आड़ में राजनीति को हिंसक मोड़ देने की योजना तैयार हुई। इसके बाद 14 दिसंबर को दिए गए भड़काऊ भाषण और 15 दिसंबर को जामिया क्षेत्र में भड़की हिंसा ने स्पष्ट कर दिया कि आंदोलन का लक्ष्य केवल विरोध नहीं रहा। यहां से राजधानी को ठप करने और साम्प्रदायिक टकराव बढ़ाने की कोशिश शुरू हुई।

फरवरी 2020 आते-आते साजिश और खुलकर सामने आई। जांच में सामने आए कथित कबूलनामों और डिजिटल साक्ष्यों ने बताया कि कैसे पत्थर, पेट्रोल और अन्य हथियार जमा कराने के निर्देश दिए गए। सरकार पर दबाव बनाने के नाम पर दंगों को ही रास्ता बताया गया। यही नहीं, विदेशी मेहमानों की यात्रा के दौरान सड़कों पर अराजकता फैलाने की बात भी कही गई। इस पूरे ताने-बाने में अर्बन नक्सल नेटवर्क ने वैचारिक समर्थन, संसाधन और प्रचार तीनों स्तरों पर भूमिका निभाई।

दंगों के दौरान और बाद में एक समानांतर कथा गढ़ी गई। हिंसा के वास्तविक पीड़ितों की आवाज दबाने की कोशिश हुई और आरोपों का रुख उलट दिया गया। मीडिया के कुछ हिस्सों ने अधूरी जानकारी और गलत पहचान के जरिए भ्रम फैलाया। एक आरोपी को दूसरे नाम से पेश किया गया और गिरफ्तारी की सच्चाई छिपाई गई। इसका उद्देश्य स्पष्ट था। हिंदुओं को हमलावर दिखाना और कट्टरपंथी भीड़ को पीड़ित के रूप में प्रस्तुत करना।

इसी कड़ी में फिल्मी दुनिया और सोशल मीडिया के कुछ चेहरे भी सक्रिय दिखे। चैट, पोस्ट और लिंक साझा कर एकतरफा रिपोर्टिंग को बढ़ावा दिया गया। कथित तौर पर निर्देशों के आधार पर खबरें वायरल की गईं, ताकि साजिश के समयक्रम पर सवाल न उठें। इससे जनमानस में यह धारणा बैठाने की कोशिश हुई कि हिंसा अचानक हुई और राज्य तंत्र ने पक्षपात किया।

अर्बन नक्सल नेटवर्क ने केवल मीडिया तक सीमित भूमिका नहीं निभाई। अकादमिक और साहित्यिक मंचों पर भी दबाव की राजनीति चली। दिल्ली दंगों में हिंदुओं पर हुए हमलों को दर्ज करने वाली एक पुस्तक को प्रतिबंधित कराने का अभियान शुरू हुआ। किताबों की दुकानों पर प्रदर्शन हुए और लेखकों को निशाना बनाया गया। उद्देश्य वही रहा। तथ्य सामने न आने पाएं और वैचारिक एकाधिकार बना रहे। जब यह प्रयास विफल हुआ, तब लेखकों और प्रकाशकों को बदनाम करने की कोशिश तेज हुई।

Image of books exposing Delhi riots and urban Naxal activities on a bookstore table.

न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने के लिए भी प्रचार किया गया। जमानत याचिकाओं को लेकर भ्रामक कहानियां गढ़ीं गईं। सुनवाई में हुए स्थगनों का दोष अदालत पर मढ़ा गया, जबकि रिकॉर्ड कुछ और बताते रहे। विशेष लोक अभियोजकों ने अदालत में स्पष्ट किया कि मीडिया के जरिए दबाव बनाने की रणनीति अपनाई जा रही है। इसके बावजूद प्रचार तंत्र रुका नहीं।

कुछ तथाकथित मानवाधिकार समूहों और विदेशी संस्थानों ने भी इसी कथा को आगे बढ़ाया। रिपोर्टों में एकतरफा आरोप लगाए गए और कट्टरपंथी हिंसा की अनदेखी की गई। जब कानून प्रवर्तन एजेंसियों ने वित्तीय अनियमितताओं पर कार्रवाई की, तब इन्हीं समूहों ने अभिव्यक्ति की आजादी का राग अलापा। यह भी सामने आया कि विदेशी फंडिंग के नियमों को दरकिनार करने के प्रयास हुए। ऐसे संगठनों ने दिल्ली दंगों को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत विरोधी एजेंडे के रूप में पेश किया।

किसान संगठनों के कुछ धड़ों ने भी दंगों के आरोपियों के समर्थन में आवाज उठाई। राजधानी में हुए खून-खराबे के बावजूद रिहाई की मांग की गई। नक्सलवाद को अधिकारों की लड़ाई बताने वाले बयान सामने आए। इससे साफ हुआ कि मुद्दे अलग दिखते हैं, लेकिन वैचारिक धारा एक ही दिशा में बहती है।

Man holding framed photos related to Delhi riots and Naxal activities.

इन सबके बीच असली पीड़ित हाशिये पर चले गए। जिन परिवारों ने अपनों को खोया, जिनकी आजीविका जली, उनकी पीड़ा पर चर्चा कम हुई। अर्बन नक्सल नेटवर्क ने शोर, शब्द और भ्रम के जरिए सच्चाई को ढकने की कोशिश की। लेकिन जांच, दस्तावेज और अदालतों में रखे तथ्य बार-बार इस नेटवर्क की भूमिका की ओर इशारा करते हैं।

दिल्ली दंगे हमें यह चेतावनी देते हैं कि हिंसा केवल सड़क पर नहीं जन्म लेती। वह विचारधारा, संगठन और प्रचार के मेल से आकार लेती है। अर्बन नक्सल सोच ने विरोध की आड़ में देश की सामाजिक एकता पर हमला किया। अब समय है कि समाज तथ्य और दुष्प्रचार में फर्क करे, पीड़ितों के साथ खड़ा हो और ऐसे नेटवर्क को बेनकाब करे, जो अराजकता को राजनीति का औजार बनाते हैं। केवल इसी रास्ते से न्याय, शांति और राष्ट्रीय एकता सुरक्षित रह सकती है।

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Shomen Chandra
Shomen Chandra
Shomen Chandra is a writer and columnist who contributes articles and opinion pieces to various media organisations. He previously served as the Editor of News4Fact and is currently pursuing a postgraduate degree in Journalism and Mass Communication.

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