कम्युनिस्ट गैर सैद्धांतिक भी होते हैं, गैर अहिंसक होते हैं, गैर लोकतांत्रिक तो जन्मजात होते हैं, पैंतरबाज़ी तो उनके खून में रचा बसा होता है, अपनी मानसिकता को तुष्ट करने के लिए ये हिंसा भी करते हैं, मानवता का भी खून करते हैं , इन्हें मानवता का बर्बर और लोमहर्षक संहार करने से भी परहेज नहीं हैं, रूसी क्रांति के दौरान जार के अहिंसक खानदान को संहार किया, जार महिलाओं और मंद बुद्धि के बच्चों की निर्मम हत्याएं की थी, चीन के थन मैन चौक पर अहिंसक और सत्याग्रही छात्रों पर मिसाइलें दागी, टैंको को दौड़ाया, रेलगाड़ियों दौड़ाई और पांच हजार से ज्यादा छात्रों को मौत का घाट उतार दिया, भारत में भी कम्युनिस्ट इतिहास बेईमानी का है, हिंसा का है, राष्ट्रद्रोह का है, हिंदूद्रोह का है, इस्लाम परस्ती का है, चीन और सोवियत रूस की दलाली और उनके हितों का संरक्षण का है, गरीबों के हाथों में हथियार और बारूद थमाकर कर स्वयं पांचसितारा संस्कृति के वाहक बन गए,सिगरेट बाजी, मुर्गा भक्षक बन गए, औरत खोर बन गए , देशज संस्कृति के विरोधी बन गए l देशज शख्सियत को लात मारकर कार्ल मार्क्स, लेनिन, स्टालिन, माओ त्से तुंग को आइकॉन मान लिया, इसी कड़ी में माओ त्से तुंग को आवर यानी भारत का प्रधानमंत्री कह डाले, इंदिरा गांधी की इमरजेंसी का समर्थन कर दिए, इमरजेंसी विरोधी लोकतांत्रिक सेनानियों का दमन और बर्बर उत्पीड़न में पुलिस और इंदिरा गांधी के सहयोगी और सारथी बन गए। यही कारण है कि कम्युनिस्ट भारत की केंद्रीय सत्ता के दावेदार और कांग्रेस का विकल्प नहीं बन सके, मोदी राज में कम्युनिस्ट सिर्फ केरल तक सीमित हो गए। वर्तमान मे कम्युनिस्टों के सामने केरल के अपने दुर्ग बचाने की चुनौती है, हिंदू इस बार कम्युनिस्ट गठबंधन एलडीएफ को अपना समर्थन देते हैं या नहीं, बीजेपी के पक्ष में गोलबंदी दिखाकर कांग्रेस गठबंधन वाले यूडीएफ का भविष्य चमकाएंगे क्या?
कम्युनिस्टों को गैर सैद्धांतिक क्यों कहा जाना चाहिए, क्या उन्होंने अपने स्थापित और स्वीकार तथा मान्य सिद्धांत से समझौता किया है, पैंतरेबाजी की है? कम्युनिस्टों का स्थापित और स्वीकार तथा मान्य सिद्धांत क्या है? कम्युनिस्टों का मान्य, स्वीकार और स्थापित सिद्धांत तानाशाही की है, हिंसा की है, गैर लोकतांत्रिक का है, जनता को बंधुआ मजदूर बना कर रखने का है, जनता की लोकतांत्रिक अधिकार से वंचित रखने का है, लोकतांत्रिक गणराज्य की मांग करने वाली जनता का संहार करने का है, जनता की कब्र खोदने का है। कार्ल मार्क्स ने तानाशाही का यही सिद्धांत दिया था, लेनिन, स्टालिन माओ त्से तुंग बर्बर और लोमहर्षक तानाशाह थे, माओ त्से तुंग ने सिद्धांत दिया था कि सत्ता जनता के मत पत्र से नहीं बल्कि सत्ता बंदूक की गोली से निकलती है, तानाशाही में ही कम्युनिस्ट फलते फूलते है और कुख्यात बनते हैं। इसी सनक में कम्युनिस्टों ने दुनिया भर में करोड़ों निर्दोष लोगों को मौत का घाट उतारा, उनकी खुशहाली को छीना, उनके विकास की कब्र खोदी।
भारत में भी कम्युनिस्टों ने तानाशाही और सत्ता बंदूक की गोली से निकलती है का सपना देखा था और भारत की आजादी के दौरान भारत छोड़ो आंदोलन का विरोध किया था, भारत विखंडन का समर्थन किया, जिन्ना के इस्लाम वाद पर सवार हो गए। पर गांधी और लोहिया के विराट व्यक्तित्व के सामने कम्युनिस्ट अपने लक्ष्य से पराजित हो गए। मजबूर होकर इन्हें भारत की लोकतांत्रिक गणराज्य की अवधारणा में हिस्सेदारी करने के लिए बाध्य होना पड़ा। 1957 के केरल विधानसभा में कम्युनिस्टों की भागीदारी होती है और दुनिया में पहली चुनावी कम्युनिस्ट सरकार बनती है, यानी कि मत पत्र से दुनिया में पहली चुनावी कम्युनिस्ट सरकार बन गई। केरल में जब कम्युनिस्ट सरकार पहली बार बनी थी तब दुनियां में तहलका मच गया था, दुनिया अचंभित हो गई थी। दुनिया यह मान चुकी थी कि सोवियत रूस और चीन की तरह भारत भी जल्द कम्युनिस्ट सरकार में तब्दील हो जायेगा और गांधी की विरासत का संहार हो जाएगा, कम्युनिस्ट भी इसी तरह का अहसास कराते थे।
नेहरू ने कम्युनिस्ट सरकार और कम्युनिस्टों को गद्दार मान लिया, उन्हें देश के लिए भस्मासुर मान लिया। आखिर क्यों? क्योंकि कम्युनिस्ट लोकतंत के खोल में हिंसक थे, क़ानून व्यवस्था के दुश्मन बन गए थे, संविधान की अवहेलना कर रहे थे, इनकी सहानुभूति और संप्रभुत्ता भारत के प्रति कतई नहीं थी। इनकी सहानुभूति और संप्रभुत्ता चीन और सोवियत रूस के साथ थी। सबसे बड़ी बात यह थी कि केरल में कम्युनिस्टों ने कांग्रेसियों का कत्लेआम शुरू कर दिए थे, सैकड़ों कांग्रेसियों को मौत का घाट उतार दिया गया था। इस कारण कांग्रेसियों में नाराजगी थी और आक्रोश भी था। इंदिरा गांधी खुद कम्युनिस्टों के प्रति आक्रोशित थी और कांग्रेस के लिए केरल की कम्युनिस्ट सरकार को खतरा मान लिया था। इंदिरा गांधी की सलाह पर नेहरू ने केरल कम्युनिस्ट सरकार का संविधान और कानून व्यवस्था के प्रति हिंसक मानसिकता का आधार बना कर बर्खास्त कर दिया था। इमरजेंसी के दौरान सीपीआई इंदिरा गांधी की पिछलग्गू बन गई जबकि सीपीएम जनता पार्टी के साथ खड़ी हो गई। जनता पार्टी के आधार और साथ होने का लाभ सीपीएम को मिला, सीपीएम ने अपना विस्तार केरल के साथ ही साथ पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा में कर लिया। पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा में कम्युनिस्टों की लम्बे समय तक सरकार रही थी।
पश्चिम बंगाल में कम्युनिस्टों की सरकार ममता बनर्जी ने छीनी थी, पश्चिम बंगाल में कम्युनिस्टों की स्थिति बद से बद्तर होती चली गई, ममता बनर्जी के सामने कम्युनिस्टों की एक नहीं चल रही है, पश्चिम बंगाल में कम्युनिस्टों की सत्ता वापसी असंभव है, पश्चिम बंगाल अब बीजेपी और ममता बनर्जी ही सत्ता के दावेदार और विकल्प हैं। पश्चिम बंगाल में कम्युनिस्टों के सफाए का कारण मुस्लिम गद्दारी है, मुस्लिम परस्ती दिखाकर और मुस्लिम घुसपैठिए को संरक्षण देकर जो कम्युनिस्टों ने अपना गिरोह बनाया था , वह गद्दारी पर उतर आया और कम्युनिस्टों के लिए भस्मासुर बन गया। ममता बनर्जी का सत्ता समीकरण मुस्लिम घुसपैठिए ही है। त्रिपुरा में बीजेपी ने कम्युनिस्टों को खदेड़ दिया। लगातार दो बार त्रिपुरा में बीजेपी की सरकार है और कम्युनिस्ट बेहद कमजोर हैं और वापसी के लायक भी नहीं रह गए हैं, आदिवासी और दलित जनाधार अब कम्युनिस्टों को फिर से स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है।
केरल में मुस्लिम जनाधार को अपनी ओर करने के लिए कम्युनिस्टों ने घिनौनी राजनीति की है। केरल कम्युनिस्ट सरकार के मुख्यमंत्री विजयन ने अपनी बेटी की शादी एक मुस्लिम से कराई। विजयन ने अपनी बेटी की शादी मुस्लिम से कराकर संदेश दिया कि हम ही मुस्लिम आबादी के हितैषी और संरक्षक हैं। जबकि मुस्लिम आबादी का समर्थन सीमित ही होता है, दस प्रतिशत से अधिक मुस्लिम आबादी कम्युनिस्ट सरकार का समर्थन नहीं करते हैं। अधिकतर मुस्लिम आबादी कांग्रेस नेतृत्व वाले गठबन्धन यूडीएफ को करते हैं। यही कारण है कि राहुल गांधी और प्रियंका गांधी लोकसभा में पहुंचने के लिए केरल का रास्ता चुनते हैं, वामपंथी पार्टियां राहुल गांधी और प्रियंका गांधी को लोकसभा पहुंचने से रोकने में असफल साबित होती है।
केरल के हिंदुओं की पसंद कम्युनिस्ट रहे हैं, आखिर क्यों? मजबूरी और बाध्यता है। विकल्प के अभाव में हिंदुओं को कुएं और खाई के बीच एक को चुनना पड़ता है। हिंदुओं के प्रति कम्युनिस्ट और कांग्रेस एक साथ दुश्मनी रखते हैं और हिंदू संहार की इनकी राजनीतिक प्रक्रिया चलती रहती है। लेकिन इधर बीजेपी के विकास ने कम्युनिस्टों की नींद उड़ा दी है। नगर निगम और नगर पालिका चुनावों में बीजेपी ने शानदार जीत हासिल की थी, तिरुवंतपुरम नगर निगम पर बीजेपी ने कम्युनिस्टों को पराजित कर कब्जा किया है, 2024 के लोकसभा चुनावों में बीजेपी को शानदार जीत मिली थी। ट्वेंटी ट्वेंटी नामक दल भी कम्युनिस्ट जनाधार में सेंध लगा रहा है। कांग्रेस पूरी शक्ति के साथ कम्यूनिस्टों को पराजित कर उनसे सत्ता लूटने की कोशिश कर है।
अगर कम्युनिस्ट केरल में भी सत्ता से बाहर हो गए तो फिर ये विलुप्त प्राणी मान लिए जाएंगे। इसके लिए दोषी और आत्मघाती भी ये खुद ही है। जिन हिंदुओं के बल पर ये केरल में सरकार बनाते हैं उन्ही हिंदुओं के संहार की राजनीति भी करते हैं। पश्चिम बंगाल में इनकी कांग्रेस के साथ दोस्ती और साझेदारी होती है, राष्टीय स्तर पर ये कांग्रेस के हित रक्षक बन जाते हैं। मुख में राम और बगल में छुरी जैसी लोकायुक्ति नहीं चलेगी, लोकतंत में बंदूक की गोली कोई काम नहीं करती है। जब तक ये कांग्रेस के लटकन बने रहेंगे और इन पर हिन्दुओं के संहार की नीति हावी रहेगी तब तक ये भारतीय राजनीति के स्थाई और अनिवार्य विकल्प नहीं बन पाएंगे। फिलहाल इन्हें केरल का अपना अंतिम दुर्ग बचाने की चुनौती है।
— आचार्य श्रीहरि
