नई दिल्ली में जारी सरकारी आंकड़ों के अनुसार भारत ने 2025 में जापान को पछाड़कर 4.18 ट्रिलियन डॉलर की GDP के साथ चौथा स्थान हासिल किया, तेज सुधारों, मजबूत मांग और 8.2 प्रतिशत वृद्धि दर ने यह मुकाम दिलाया।
भारत की यह उपलब्धि केवल रैंकिंग का बदलाव नहीं है। यह उस आर्थिक बदलाव का प्रमाण है, जिसे देश ने बीते एक दशक में सुसंगत नीतियों, बुनियादी ढांचे के विस्तार और डिजिटल क्रांति के सहारे हासिल किया। वैश्विक अर्थव्यवस्था की रफ्तार जहां कई बड़े देशों में धीमी पड़ी, वहीं भारत ने निवेश, उत्पादन और खपत के तीनों मोर्चों पर निरंतर बढ़त दर्ज की।
दशकों तक एशिया की आर्थिक धुरी रहे जापान ने हाल के वर्षों में जनसांख्यिकीय दबाव और कमजोर येन की चुनौती झेली। बढ़ती उम्र वाली आबादी ने श्रमबल को सीमित किया और घरेलू मांग पर असर डाला। इसके उलट भारत ने युवा आबादी, शहरीकरण और बढ़ती आय के बल पर घरेलू खपत को तेज किया। इसी अंतर ने दोनों देशों की राह अलग कर दी और रैंकिंग में स्थानांतरण हुआ।

विशेषज्ञ इस बदलाव को एशियन सेंचुरी के नए अध्याय के रूप में देखते हैं। तीसरे स्थान पर मौजूद जर्मनी के साथ अंतर तेजी से घट रहा है और अनुमान बताते हैं कि भारत 2027 तक तीसरे पायदान पर पहुंच सकता है।
भारत का यह उभार रातोंरात नहीं हुआ। 2014 से शुरू हुए संरचनात्मक सुधारों ने अर्थव्यवस्था की बुनियाद मजबूत की। उससे पहले महंगाई, नीति ठहराव और निवेश की कमी ने रफ्तार रोकी। सुधारों ने भरोसा लौटाया और पूंजी को दिशा दी।
जीएसटी ने एक देश एक कर के सिद्धांत पर बिखरे बाजार को जोड़ा। कर अनुपालन बढ़ा, लॉजिस्टिक्स सस्ता हुआ और राज्यों के बीच व्यापार आसान बना।

डिजिटल इंडिया और यूपीआई ने भुगतान प्रणाली को दुनिया की सबसे उन्नत श्रेणी में पहुंचाया। त्वरित और सुरक्षित लेनदेन ने औपचारिक अर्थव्यवस्था का दायरा बढ़ाया और छोटे कारोबारियों को मुख्यधारा से जोड़ा।
मेक इन इंडिया और पीएलआई योजनाओं ने विनिर्माण को प्रोत्साहन दिया। इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटो और सेमीकंडक्टर जैसे क्षेत्रों में वैश्विक कंपनियों ने निवेश बढ़ाया। निर्यात क्षमता मजबूत हुई और वैल्यू चेन में भारत की हिस्सेदारी बढ़ी।
बुनियादी ढांचे में अभूतपूर्व विस्तार हुआ। 2014 से 2025 के बीच राजमार्ग निर्माण की गति दोगुनी हुई। हवाई अड्डों की संख्या 74 से बढ़कर 150 से अधिक पहुंची। बंदरगाह, रेल और लॉजिस्टिक्स ने आपूर्ति श्रृंखला को सक्षम बनाया।
आंकड़े कहानी कहते हैं। 2014 में भारत करीब 2 ट्रिलियन डॉलर की जीडीपी के साथ दसवें स्थान पर था। ग्यारह वर्षों में अर्थव्यवस्था दोगुनी से अधिक हुई और रैंकिंग में छह पायदान की छलांग लगी।
इस उपलब्धि के साथ ही निगाहें भविष्य पर टिक गई हैं। 2035 तक 6 से 7 प्रतिशत की निरंतर वृद्धि भारत को 10 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बना सकती है। उस समय भारत तीसरी सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति के रूप में स्थापित होगा और किसी एक ध्रुव पर निर्भरता कम करेगा।
विनिर्माण को जीडीपी के 25 प्रतिशत तक ले जाने का लक्ष्य रखा गया है। वैश्विक कंपनियां आपूर्ति श्रृंखलाओं का विविधीकरण कर रही हैं और चीन के विकल्प तलाश रही हैं। भारत इस अवसर को कारखाना बनने की रणनीति से भुना रहा है।
स्वतंत्रता के शताब्दी वर्ष तक विकसित भारत का विजन अंतिम लक्ष्य है। सरकार 2047 तक 30 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था और यूरोपीय मानकों के समकक्ष प्रति व्यक्ति आय का लक्ष्य साध रही है। शिक्षा, कौशल, स्वास्थ्य और हरित ऊर्जा पर निवेश इस यात्रा की कुंजी बनेगा।
भारत ने जापान को पीछे छोड़ा यह शीर्षक एक शुरुआत है। सुधारों की निरंतरता, 1.4 अरब आकांक्षाओं की ऊर्जा और नीति स्थिरता ने देश को एकतरफा उभार की राह पर रखा है। दुनिया एक नए आर्थिक भारीभरकम खिलाड़ी का उदय देख रही है।
