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Monday, January 12, 2026

मंदिर के दीप जलाने के आदेश से उत्पन्न महाभियोग की राजनीति या न्यायपालिका पर हमला – एक संवैधानिक विश्लेषण 

भारत के संविधान ने संसद को अनेक शक्तियाँ दी हैं, पर उनमें सबसे गंभीर, सबसे असाधारण और सबसे संवेदनशील शक्ति है—किसी न्यायाधीश के विरुद्ध महाभियोग प्रस्ताव लाने की शक्ति। यह कोई सामान्य राजनीतिक हथियार नहीं है, न ही यह न्यायिक निर्णयों से असहमति दर्ज कराने का मंच है। यह शक्ति केवल एक ही उद्देश्य के लिए बनाई गई है—न्यायपालिका की शुचिता की रक्षा, और वह भी केवल तब, जब किसी न्यायाधीश के विरुद्ध सिद्ध कदाचार या असमर्थता का ठोस प्रामाणिक आधार उपलब्ध हो।

इसी पृष्ठभूमि में मद्रास उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति जस्टिस जी.आर. स्वामीनाथन के विरुद्ध लाया गया महाभियोग प्रस्ताव एक गंभीर संवैधानिक चिंता पैदा करता है। जस्टिस स्वामीनाथन का तथाकथित “अपराध” क्या है? उन्होंने—एक हिन्दू मंदिर के भक्तों की याचिका सुनी और राज्य सरकार की असहमति के बावजूद मंदिर स्तम्भ पर दीप जलाने का आदेश दे दिया जब तमिलनाडु सरकार ने धार्मिक सोहार्द तथा कानून व्यवस्था बिगड़ने के अपने तर्को के आधार पर आदेश का पालन नहीं किया तब जस्टिस स्वामीनाथन सीआईएसएफ़ की निगरानी मैं दीप जलाने का आदेश दे दिया था यही बात राजनेताओ को खटक गयी हालांकि प्रशासन ने सेना को भी उस क्षेत्र मैं घुसने नहीं दिया और मंदिर का दीप नहीं जल सका परंतु सरकार इस बात से इतनी विचलित और क्रोधित हो गयी कि जस्टिस स्वामीनाथन के विरुद्ध महाभियोग प्रस्ताव ले आयी !

यह बहस इस बात की नहीं है कि कोई उनके निर्णय से सहमत है या असहमत। असली प्रश्न यह है कि क्या संसद का सबसे कठोर दंडात्मक औज़ार केवल किसी निर्णय या न्यायिक व्याख्या से असहमति के आधार पर सक्रिय किया जा सकता है?

संविधान के अनुच्छेद 124(4) और 217 जानबूझकर कठोर भाषा में लिखे गए हैं। न्यायाधीश को हटाने की प्रक्रिया कठिन इसलिए रखी गई ताकि वह राजनीतिक दबाव, जनभावना या सत्तागत असंतोष से सुरक्षित रह सके। महाभियोग कोई राजनीतिक वक्तव्य नहीं, बल्कि एक प्रकार का संवैधानिक अभियोजन है। जस्टिस स्वामीनाथन पर भ्रष्टाचार का आरोप नहीं है वित्तीय अनियमितता नहीं है पद के दुरुपयोग का ठोस प्रमाण नहीं है और उनकी असमर्थता का कोई आधार नहीं तो ऐसे प्रस्ताव को राजीतिक उद्देश्य से प्रस्तुत करना न्यायिक तंत्र एवं जजो को डराने एवं धमकाने कि श्रेणी मैं आता है !

जो भी सांसद इस महाभियोग प्रस्ताव पर हस्ताक्षर करता है, वह यह आरोप लगाता है कि एक संवैधानिक पदाधिकारी ने इतना गंभीर कृत्य किया है कि उसे पद से हटाया ही जाना चाहिए। इस प्रस्ताव पर हस्ताक्षर करने वाले लगभग 120 सांसदो मैं प्रियंका गांधी, टी आर बालू, कनिमोझी, ओवेशी के अतिरिक्त अखिलेश यादव एवं डिंपल यादव भी शामिल है इन लोगो ने अभी तक प्रस्ताव पर हस्ताक्षर करने का कोई ठोस कारण नहीं बताया है इससे मात्र यह एक राजनीतिक विचारधारा का समर्थन करने जैसा प्रतीत होता है ऐसा आरोप, चाहे अंततः अस्वीकार हो जाए, संस्था की प्रतिष्ठा और न्यायिक स्वतंत्रता पर गहरा प्रभाव डालता है।

यह तर्क अक्सर दिया जाता है कि सांसदों को अनुच्छेद 105 और 194 के अंतर्गत विशेषाधिकार प्राप्त हैं। किंतु यह तर्क अधूरा है। संसदीय विशेषाधिकार निरंकुश नहीं होते; वे कार्यात्मक होते हैं। उनका उद्देश्य विधायिका को उसके संवैधानिक कर्तव्यों के निर्वहन में सक्षम बनाना है, न कि किसी अन्य संवैधानिक संस्था—विशेषकर न्यायपालिका—को डराना या भयभीत करना। जब विशेषाधिकार का प्रयोग दबाव के औज़ार के रूप में किया जाए, तब वह विशेषाधिकार नहीं, बल्कि संवैधानिक अतिक्रमण बन जाता है।

इस विवाद का सबसे खतरनाक पहलू यह नहीं है कि महाभियोग प्रस्ताव सफल होगा या नहीं, बल्कि यह है कि वह क्या संकेत देता है। यह संकेत कि यदि न्यायिक निर्णय राजनीतिक रूप से असुविधाजनक होंगे, तो दंडात्मक संवैधानिक प्रक्रियाएँ सक्रिय की जा सकती हैं। यह संकेत न्यायिक स्वतंत्रता को भीतर से कमजोर करता है और न्यायाधीशों को आत्म-संयम या आत्म-सेंसरशिप की ओर धकेलता है। लोकतंत्र में इससे अधिक घातक संकेत कोई नहीं हो सकता।

भारतीय संवैधानिक इतिहास इस खतरे की चेतावनी देता है। आज जस्टिस स्वामीनाथन के विरुद्ध प्रस्तावित महाभियोग उसी चिंताजनक परंपरा का आधुनिक रूप प्रतीत होता है—जहाँ न्यायिक निर्णयों को संवैधानिक तर्क के बजाय राजनीतिक स्वीकार्यता की कसौटी पर परखा जाने लगता है। यदि यह प्रवृत्ति सामान्य बन गई, तो हर संवेदनशील मामले में न्यायाधीश के सामने कानून नहीं, बल्कि संभावित राजनीतिक प्रतिक्रिया खड़ी होगी।

यहाँ लोकसभा अध्यक्ष की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। Judges (Inquiry) Act, 1968 उन्हें यह विवेकाधिकार देता है कि वे आवश्यक हस्ताक्षरों के बावजूद महाभियोग प्रस्ताव को स्वीकार या अस्वीकार कर सकते हैं। यह कोई औपचारिक मुहर नहीं, बल्कि संविधान द्वारा निर्मित एक अंतिम सुरक्षा-दीवार है। यदि प्रस्ताव में भ्रष्टाचार, वित्तीय अनियमितता, पद के दुरुपयोग या असमर्थता का कोई प्रथमदृष्टया आधार नहीं है, तो उसे प्रारंभिक स्तर पर ही रोका जाना चाहिए।

महाभियोग के इस राजनैतिक षड्यंत्र का विरोध करते हुये आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश सी. नरसिम्हा रेड्डी की के साथ साथ 56 सेवानिवृत्त न्यायाधीशों ने एक संयुक्त वक्तव्य जारी कर सभी सांसदों, बार सदस्यों और देश के हर नागरिक से अपील की है कि इस महाभियोग की स्पष्ट और कड़ी निंदा करें!

पत्र में आगे कहा गया है कि यह प्रस्ताव उन न्यायाधीशों को धमकाने का प्रयास है जो किसी विशेष वर्ग की वैचारिक अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं चलते। यदि ऐसे प्रयासों को बढ़ावा मिला, तो यह न्यायिक स्वतन्त्रता और लोकतंत्र की जड़ों को ही काट देगा। महाभियोग का उद्देश्य न्यायपालिका की अखंडता बनाए रखना है, न कि इसे प्रतिशोध का हथियार बनाना।

देश के न्यायाधीश अपनी शपथ और भारत के संविधान के प्रति उत्तरदायी है, न कि किसी पक्षपातपूर्ण राजनीतिक दबावों या वैचारिक धमकियों के प्रति। आज एक जज निशाने पर है कल पूरी न्यायपालिका इनके निशाने पर होगी

जजो ने यह भी बताया है किस प्रकार केशवानन्द भारती केस मैं सरकार की इच्छा के विरुद्ध निर्णय देने वाले तीनों जजो को पदावनत कर दिया गया था और आपातकाल के दौरान ADM Jabalpur v. Shivkant Shukla मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बहुमत से यह कहा कि नागरिक अवैध हिरासत को चुनौती देने के लिए हैबियस कॉर्पस याचिका भी दाखिल नहीं कर सकते। न्यायमूर्ति एच.आर. खन्ना का निर्णय के विरुद्ध एकमात्र असहमति-मत था —जिसमें उन्होंने कहा कि जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार किसी भी आपातकालीन घोषणा से समाप्त नहीं किया जा सकता—आज भारतीय न्यायिक विवेक का प्रतीक माना जाता है। किंतु उस असहमति की कीमत जस्टिस खन्ना को चुकानी पड़ी थी सबसे वरिष्ठ न्यायाधीश होते हुए भी उन्हें भारत का मुख्य न्यायाधीश नहीं बनाया गया था ! यह उदाहरण दिखाता है कि सत्ता के प्रतिकूल खड़े होकर अपनी असहमति व्यक्त करने की बड़ी कीमत न्यायपालिका ने पहले भी चुकाई है।

अंततः यह प्रश्न शक्ति का नहीं, संवैधानिक संयम का है। असहमति का स्थान अपील में है, बहस में है, आलोचना में है—महाभियोग में नहीं। यदि यह रेखा धुंधली हो गई, तो क्षति किसी एक न्यायाधीश की नहीं होगी, बल्कि उस संतुलन की होगी जो भारत को केवल बहुमत का शासन नहीं, बल्कि एक संवैधानिक गणराज्य बनाता है।

आज भारत को यह रेखा स्पष्ट रूप से खींचनी होगी—

महाभियोग को राजनीतिक प्रतिशोध का हथियार बनने से रोका जाए, और न्यायपालिका की स्वतंत्रता की रक्षा की जाए क्योंकि हमारे देश ने अनेकों वर्षों की गुलामी और हजारो वीरों के बलिदान के बाद देश की स्वतन्त्रता अपना संविधान और लोकतन्त्र प्राप्त किया !

अब समय आ गया है कि देश के नागरिक केवल न्यायाधीश पर लगाए जा रहे आरोपों तक सीमित न रहें, बल्कि उन नेताओं के आचरण और नीयत पर भी पैनी नज़र रखें जिन्होने महाभियोग प्रस्ताव पर हस्ताक्षर किए हैं। देश के नागरिकों को यह जानना बहुत आवश्यक है कि क्या ये नेता वास्तव में भारतीय न्याय व्यवस्था और संविधान की रक्षा के लिए आगे आए हैं, या फिर असुविधाजनक और मनपसंद न होने वाले न्यायिक निर्णयों से उपजे राजनीतिक असंतोष का प्रतिशोध लेने का प्रयास कर रहे हैं। न्याय के नाम पर महाभियोग की राजनीति लोकतंत्र के लिए सबसे खतरनाक छल बन जाती है, क्योंकि इसमें हमला न्यायाधीश पर नहीं, बल्कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर होता है। जो आज न्यायाधीश को कटघरे में खड़ा कर रहे हैं, वही कल न्यायालयों को अपने इशारों पर चलाने की आकांक्षा रखेंगे। यदि राजनीतिक प्रतिशोध को संवैधानिक प्रक्रिया का आवरण दे दिया गया, तो कटघरे में केवल एक न्यायाधीश नहीं, बल्कि लोकतंत्र और असहमति दर्शाने और अपने अधिकारों की मांग करने वाला देश का एक नागरिक स्वयं खड़ा होगा।

— आलोक तिवारी

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