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Wednesday, December 1, 2021

मेरी जन्मभूमि के दलित!

मेरे घर के सटे दलित बस्ती है…यह चमरटोली के नाम से जाना जाता है, मेरे मकान से तीन घर बाद खनुआ नाला है जिसके उपर दो सौ घर चर्मकारों के हैं। छपरा (जेपी से विख्यात और लालू से कुख्यात शहर) को बाढ़ से बचाने के लिए यहाँ अँग्रेजों के समय में ही कपाट बनाया गया था, साहेबगंज, सोनारपट्टी, कठिया बाबा के मंदिर के पास, जो बाढ के समय में शहर को रक्षित करता आया है,मेरे घर के तल से
यह करीब बीस फीट उपर है।

बाढ़ के दिनों में जब कपाट बंद रहता था तो नाला पानी से लबालब रहता था तब उस समय दलित मित्रों के साथ इस कपाट के छत पर चढ़ कर हम छलांगे लगाकर तैरते थे, किशोर वय था, पिता से मात्र इसी कारण डाँट खायी है।

असल बात यह है कि यह काम बेहद दुस्साहस का था, इस छलांग की बहादुरी में गिनती होती थी। लबालब पानी, गहरा तीस फीट चौड़ा और तीस ही फीट गहरा नाला था, तेज धार, यहीं आकर ठहरता था घाघरा नदी का पानी जो इसलिए खतरनाक समझा जाता था। बाढ़ के दिनों में ये घाघरा नदी गंगा से मिलकर एकरुप हो जाती थी,उसपार आरा जिले का एकावना गाँव पड़ता था।

छलांग की संख्या से बहादूरी का निर्धारण होता था। इस स्पर्धा में छै दलित,दो यादव और एक सवर्ण मैं था। बराबर दलित लड़के ही नंबर वन आते थे, एक एक बार मैं और मेरा यादव मित्र दुलारचंद जीते।बराबर मेरा दलित मित्र सीताराम बाजी मार लेता था।

हमारे मुहल्ले में पाँच सौ घर यादवों के भी हैं।

आप शायद यकीन ना करें वहां के दलित ब्राह्मणो से ज्यादा धार्मिक है… खनुआ नाला पर दलित स्थापित सातों मैया का एक मंदिर भी है, जहाँ सातों मैया सात माटी के पिंड के रूप में विराजती है, बचपन में माँ वहाँ लेकर जाती थी।

चमारटोली के लोग धर्म के हर काम में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेतेहैं। यहाँ के दलित उस दलित का गला काट लेंगे जो भारत बंद में हनुमानजी पर थूकते,जूते मारते दीखे थे।

हर साल सब मिल कर,दोनों नवरात्रों में जागरण भंडारे का आयोजन करते हैं ….सरस्वती पूजा, गणेश चतुर्थी, होली, वाल्मिकी जयंती , विश्वकर्मा पूजन में इनका उत्साह देखते ही बनता है…..दीवाली विशेष दर्शनीय होती थी जब दलित केले के थम गाड़ते थे, उसके पत्तों में बाँस की फट्टी कलाकारिता से बाँध कर उसपर दीप जलाते थे।पहला दीप एकमात्र शिवमंदिर की पंडिताइन से जलवाते थे, जो चमरटोली से 100 मीटर पर था।

पर वोटो मे ये बंटे हुए हैं, कोई RJD समर्थक है तो कोई BSP समर्थक तो कोई CONG समर्थक पर ज्यादातर BJP समर्थक हैं।

तो फिर मे सोचता हूं कि वो कौन से दलित है जिनको ब्राह्मणो, राजपूतो या पिछड़ो द्वारा सताया गया है ???

कुछ मामलो मे हो सकता है तो वो तो हर जगह है…क्या ब्राह्मण ब्राह्मणों का शोषण नही करते ? क्या राजपूत, राजपूतों का शोषण नही करते ? कायस्थ ज्यादेतर अपने जाति वाले को काटता है। क्या पिछड़े, पिछड़ो को शोषण नही करते??

शोषण हर जगह है, मजबूत लोग कमजोर लोगो को दबाना अपनी शान समझते हैं चाहे वो किसी जात के हों…..पर जातीय आधार का शोषण सामने आ जाता है और बाकि शोषण गौण हो जाते हैं।

दलित बेटी से भेंट

मैं बैंक में मैनेजर हो गया, रिटायरमेंट सुपौल जिले के प्रतापगंज से हुई। 2010 की घटना है, मेरे पास एक साँवला सलोना युवक लोन की पैरवी करने आता था, नाम सदानंद, बगल का गाँव दुअनियाँ, वह अत्यंत विनम्र था, ग्रेजुएट था। दुअनियाँ वह विख्यात गाँव था जहाँ के जूते लंदन जाते थे, पूँजी के अभाव में यहाँ चर्म उद्योग मृतप्रायः हो चुकी थी,पर जूते बनाने की कला जीवित थी।

सदानंद जिन लोगों की पैरवी लेकर आया था वे सुयोग्य लोग थे जबकि बैंक में बराबर दलाल पैसे के लोभी ही आते हैं। कुछ दिनों में मैं सदानंद की समाज सेवा और निर्लोभिता समझ गया। उससे प्रभावित हुआ। सदानंद चर्मकार था, मैंने उस गाँव में सुयोग्य करीब करीब तीस लोगों को अपेक्षित राशि दे दिया, सबने तुरंत हमें भगवान का दर्जा दे दिया।

एक दिन जऱा शरमाते हुए सदानंद ने कहा….सर मेरी वाइफ आप से मिलना चाहती है, इंटर पास है, आपको छुपे-छुपे देखा, देखकर बोली कि मैं इनको पहले से जानती हूँ…घर चलें सर!

जाने पर एक करीब 30 साल की महिला ने मेरे पैर झुक कर पकड़ लिये।मैं महिलाओं को पैर नहींं छूने देता, बेटियाँ मना करने पर भी नहीं मानती, छू ही लेती हैं।

मैंने उसे सस्नेह मना किया। वह बोली…मैं सीताराम की बेटी हूँ, विश्वेश्वर सेमीनरी में आपके साथ पढ़ते थे, आपके साथ खनुआ नाला में छलांग लगा कर तैरते थे….बाबुजी आपकी चर्चा करते रहते थे।

मुझे सीताराम की अच्छी याद थी। रेलवे में उसके पिता फोर्थग्रेड में कर्मचारी थे। मैं सीताराम के घर भी अक्सर जाता था, उनके पैर भी छूता था, वे गदगद हो जाते थे।

लौटते समय मैंनें अपनी पूरी की पूरी जेब खाली कर दी… जो कुछ भी उसमें था, बिना गिनें, सदानंद के हाथ में धर दिया….तुम तो दामाद निकले…….बेटी के घर गलती से खाली हाथ आ गया….भरा पॉकेट नहींं जा सकता। मेरी दलित बेटी खुशी से रोने लगी।

【इस में वर्णित स्थान,पात्र,नाम और घटना सब सत्यकथा है कुछ भी काल्पनिक नहीं है।】

(स्रोत: https://www.facebook.com/mahatapa.aks.3/posts/

 (चित्रित छविकेवल प्रतिनिधित्व)

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