भाषाई एकता का मोदीकरण
“उज्ज्वल जी, मी मराठीत बोलू की हिंदीत बोलू?”
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 13 जुलाई 2025 को वरिष्ठ अधिवक्ता उज्ज्वल निकम को फोन करते हुए यही आत्मीय सवाल मराठी में पूछा— “उज्ज्वल जी, मैं मराठी में बोलूं या हिंदी में?”
न कोई मंच था, न प्रचार टीम, न कैमरा—बस एक सादा-सा फोन कॉल। और उसमें भी मराठी में बोला गया ऐसा वाक्य जिसमें केवल भाषा का मामला नहीं था, बल्कि उज्ज्वल निकम जैसे महान देशभक्त के लिए सम्मान और अपनत्व का भाव छिपा था। उज्ज्वल निकम ने इस क्षण को बाद में भावुक होकर याद किया। वही निकम जिन्होंने 26/11 मुंबई हमलों के दौरान पाकिस्तान द्वारा पोषित आतंकियों—खासकर अजमल कसाब—के खिलाफ भारत की ओर से डटकर मुकदमा लड़ा और देश की प्रतिष्ठा को न्यायालय में मजबूती से संभाला।
प्रधानमंत्री मोदी का यह सरल, आत्मीय और मराठी में बोला गया वाक्य कोई औपचारिकता नहीं था। यह उस व्यक्ति को दिया गया सम्मान था, जिसने जीवनभर राष्ट्र की सेवा को ही अपना धर्म माना। यह किसी पद या प्रोटोकॉल की नहीं, बल्कि भारत की आत्मा की आवाज़ थी। यह केवल शिष्टाचार नहीं था—यह उस सांस्कृतिक परंपरा की झलक थी, जो दिखाती है कि राष्ट्रीय भावना कभी स्थानीय पहचान को दबाती नहीं, बल्कि उसे स्नेहपूर्वक अपना लेती है।
प्रधानमंत्री मोदी भारत की अनेक भाषाओं में दक्ष हैं। वे मराठी साहित्य का गुजराती में अनुवाद भी कर चुके हैं। उनके लिए भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि भारत की विविधता और गहराई को समझने और सम्मान देने का एक जीवंत तरीका है।
महाराष्ट्र की दो धाराएं: समाजवाद और शिवसेना
राम स्वरूप जी कहा करते थे—”विचारधाराएं अपने शिकार खुद चुनती हैं, और फिर उन्हें ही निगल जाती हैं।” महाराष्ट्र के 1960 और 70 के दशक में यह बात सजीव रूप में सामने आई। उस समय राज्य का बौद्धिक और राजनीतिक माहौल समाजवादी विचारों से गहराई से प्रभावित था। एस.एम. जोशी, नानासाहेब गोरे और नाथ पई जैसे नेताओं ने वर्ग संघर्ष, भाषाई पहचान और सत्ता के विकेंद्रीकरण को लेकर एक वैचारिक ढांचा खड़ा किया, जो ‘अधिकारी थिसिस’ जैसी अवधारणाओं पर आधारित था—जिसमें भारत को एक राष्ट्र नहीं, बल्कि अनेक राष्ट्रीयताओं का समूह माना गया। उन्होंने भले ही प्रत्यक्ष रूप से लेनिन या मार्क्स का नाम न लिया हो, लेकिन उनकी सोच में वामपंथी प्रभाव स्पष्ट था।
इसी वैचारिक आधार पर ‘संयुक्त महाराष्ट्र आंदोलन’ को आगे बढ़ाया गया। यह आंदोलन सामाजिक न्याय और भाषाई गौरव के नाम पर शुरू हुआ, लेकिन जल्द ही इसमें छुपा हुआ भाषाई अलगाववाद झलकने लगा। मराठी अस्मिता के नाम पर भाषाओं के बीच कृत्रिम दीवारें खड़ी की गईं—मराठी बनाम गुजराती, मराठी बनाम कन्नड़ जैसे विभाजन गढ़े गए। और ठीक इसी दौर में शिवसेना का उदय हुआ। पार्टी ने अपना नाम छत्रपति शिवाजी से जोड़ा—जिस महानायक की दृष्टि केवल मराठा स्वराज की नहीं, पूरे भारतवर्ष की थी। लेकिन शिवसेना की शुरुआत भी उस समय के समाजवादी असंतोष और स्थानीय नाराज़गी से प्रभावित थी।
‘मराठी मानुष’ की गरिमा के नाम पर शुरू हुआ आंदोलन धीरे-धीरे एक संकीर्ण राजनीति में बदलता चला गया। शिवाजी की प्रेरणा की जगह पार्टी ने अपने ही देशवासियों को निशाना बनाना शुरू कर दिया—खासतौर पर उत्तर भारतीयों और तमिलों को। मुंबई और शोलापुर जैसे शहरों में देश के अन्य हिस्सों से आए हिंदू नागरिकों पर हमले हुए। विडंबना यह थी कि जो पार्टी शिवाजी के नाम से राजनीति कर रही थी, वह उन्हीं आदर्शों के विरुद्ध काम करने लगी जिनके लिए शिवाजी लड़े थे।
शिवसेना ने जिन नारों और विचारों को अपनाया, वे दरअसल समाजवादी और वामपंथी चिंतन से ही लिए गए थे—लेकिन उन्हें मराठी रंग देकर पेश किया गया। यह राष्ट्रीय एकता की प्रेरणा नहीं, बल्कि क्षेत्रीय गुस्से को राजनीतिक लाभ में बदलने की रणनीति बन गई। और यह सब सिर्फ शिवसेना की रणनीति नहीं थी—कांग्रेस की भूमिका भी इसमें कम नहीं रही। 2019 में जयराम रमेश ने सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया कि 1960 के दशक में कांग्रेस ने शिवसेना को इसलिए समर्थन दिया ताकि वह कम्युनिस्ट ट्रेड यूनियनों के प्रभाव को संतुलित कर सके। पत्रकार सुजाता अनंदन और अन्य लेखकों ने इस साझेदारी को विस्तार से दर्ज किया है। यह कोई सैद्धांतिक या राष्ट्रवादी गठबंधन नहीं था—बल्कि एक राजनीतिक सौदा था। एक समस्या का इलाज दूसरी समस्या से करने की वह रणनीति, जिसमें विचारधारा की कोई जगह नहीं थी। लेकिन ऐसे जोड़-तोड़ का नतीजा यही हुआ कि राजनीति ने राष्ट्रीय एकता को पीछे छोड़, भाषाई टकरावों और क्षेत्रीय असंतोष को बढ़ावा दिया।
लेकिन ऐसे जोड़-तोड़ का नतीजा यही हुआ कि राजनीति ने राष्ट्रीय एकता को पीछे छोड़, भाषाई टकरावों और क्षेत्रीय असंतोष को बढ़ावा दिया। इस गठजोड़ का असर बाद की राजनीति में भी दिखा। चाहे ए.आर. अंतुले हों या प्रतिभा पाटिल—कांग्रेस के कई उम्मीदवारों को शिवसेना का समर्थन मिलता रहा। यह सिलसिला विचारधारात्मक मेल के कारण नहीं, बल्कि आपसी राजनीतिक लाभ के कारण चलता रहा। यह साफ़ दिखाता है कि शिवसेना का विरोध असली दुश्मनों से नहीं था, बल्कि पड़ोस में रहने वाले उन लोगों से था जो एक अलग भाषा बोलते थे लेकिन उसी संस्कृति और धर्म से जुड़े थे।
चेन्नई का ‘स्टालिनवाद’: वही नाटक, नई भाषा
तमिलनाडु में भी वही कहानी दोहराई गई—चेहरे और बोली बदल गई, पर विचारधारा वही रही। धोती की जगह वेष्टी आई, लेकिन मंच पर फिर से वही सोच लौट आई जो मार्क्सवाद और स्टालिनवाद की छाया में पली-बढ़ी थी। वहाँ के नेताओं ने हिंदी के ख़िलाफ़ प्रचार किया और यह दावा किया कि तमिल संस्कृति संकट में है—जैसे भारत की अन्य भाषाओं से सह-अस्तित्व कोई समरसता नहीं, बल्कि तमिल अस्मिता पर हमला हो। इसे ‘स्टालिनवाद’ कहना कोई उपहास नहीं है, बल्कि एक सटीक विश्लेषण है। यह विचारधारा वहाँ संकट गढ़ती है जहाँ कोई संकट नहीं होता, भाषा को दीवार बना देती है और गौरव को अलगाव में बदल देती है। यह सत्ता की लालसा को सांस्कृतिक चोट का रूप देती है और एक काल्पनिक शत्रु गढ़ लेती है—कभी हिंदी, कभी उत्तर भारत, तो कभी तथाकथित आर्य प्रभाव।
लेखक अलेक्ज़ेंडर सोल्झेनित्सिन ने कहा था, “समाज को बदलने के लिए ज़रूरी नहीं कि हिंसा हो—सच को तोड़-मरोड़ देना ही काफ़ी है।” तमिलनाडु में यही हुआ। चुपचाप, इस विचारधारा ने जनता के मन में यह बात बैठा दी कि भारत की मुख्यधारा में शामिल होना तमिल अस्मिता के लिए ख़तरा है। उसने तमिलनाडु को उसी सभ्यता से काटने की कोशिश की, जिसे वह सहस्राब्दियों से गढ़ने में सहभागी रहा है।
प्रधानमंत्री मोदी ने इस सोच का जवाब नारों या नाराज़गी से नहीं, बल्कि सभ्यतागत आत्मविश्वास से दिया। 28 मई 2023 को जब नया संसद भवन उद्घाटित हुआ, तब उन्होंने तमिलनाडु को केवल याद नहीं किया, बल्कि भारत की राजनीति के हृदयस्थल में उसका सम्मान स्थापित किया। लोकसभा अध्यक्ष की कुर्सी के पास रखा गया सेंगोल—वह राजदंड जो 1947 में तमिल अधीनमों ने सत्ता हस्तांतरण के प्रतीक रूप में भेंट किया था—सिर्फ़ एक सांस्कृतिक चिह्न नहीं था, बल्कि एक स्पष्ट और गूढ़ संदेश था। यह सेंगोल, जो दशकों से संग्रहालय में उपेक्षित पड़ा था, मोदी ने उसे केवल पुनः प्राप्त नहीं किया—बल्कि भारतीय धर्म, न्याय और धर्मराज्य के प्रतीक के रूप में संसद में प्रतिष्ठित किया।
यह कोई सांस्कृतिक अपहरण नहीं था—यह एक सांस्कृतिक वंदना थी। यह उस हर भारतीय के लिए संदेश था जो यह समझना चाहता है कि तमिलनाडु सिर्फ़ एक राज्य नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक आत्मा का एक मूल स्तंभ है। मोदी ने यह स्पष्ट किया कि सनातन धर्म के मूल्य—श्रद्धा, धर्मनिष्ठा और ऋषि परंपरा—तमिल भूमि में उतने ही गहरे बसे हैं जितने किसी और भाग में। तमिल संस्कृति का सम्मान करना भारत माता का सम्मान करना है।
कन्नड़ की लय में रामायण
कर्नाटक के गाँवों में, आज भी खुले आकाश के नीचे रामायण नाटक खेला जाता है। ग्रामीणजन शुद्ध कन्नड़ में संवाद बोलते हैं, गीत गाते हैं और भाव से अभिनय करते हैं—लेकिन वहाँ बैठा कोई सामान्य श्रोता, चाहे वह उत्तर भारत का कोई हिंदीभाषी ही क्यों न हो, जिसे थोड़ी-बहुत संस्कृत आती हो, वह भी उस अनुभूति को पूरी तरह पकड़ लेता है। भाषा अलग है, पर लय वही है। विचार, मूल्य और भाव वही हैं—एकदम भारतीय, गहरे, सौम्य और दार्शनिक।
यह दृश्य बताता है कि कन्नड़ भाषा कोई दीवार नहीं, एक खिड़की है—जो भारत की साझा आत्मा की ओर खुलती है। वहाँ जाकर आपको लगता नहीं कि आप किसी परायी जगह पर हैं; लगता है जैसे आप अपने ही घर लौट आए हों। भाषा भिन्न है, पर स्पंदन एक है। रंगमंच स्थानीय है, लेकिन उसकी धड़कन पूरे भारत की है।
यह संस्कृति संवाद की भाषा में नहीं, संवेदना की लय में जुड़ती है। जहाँ रामायण एक ही समय में तुलसीदास की अवधी, कम्बन की तमिळ, कन्नड़, तेलुगु, मलयालम और संस्कृत में जीवंत हो सकती है—वहाँ भारत एक राज्य नहीं, एक आत्मा बन जाता है। यह वही भारत है, जो शब्दों से नहीं, भावों से जुड़ता है—जहाँ भिन्नता में विरोध नहीं, अपनापन दिखता है। भारत केवल एक प्रशासनिक इकाई नहीं, बल्कि एक ऐसा आत्मस्वरूप है, जिसे उत्तर से दक्षिण और पूरब से पश्चिम तक एक जैसी अनुभूतियाँ, समान जीवन-दृष्टि और वह साझा चेतना जोड़ती है, जिसे सदियों से हमारे मनीषियों, ऋषियों और आचार्यों ने सींचा है।
जब भाषा असफल हुई: पंजाब, बंगाल और विभाजन का रक्त
भाषा से हम अक्सर उम्मीद करते हैं कि वह पुल बनाएगी, लोगों को जोड़ेगी, टकराव रोक पाएगी। लेकिन इतिहास में ऐसे क्षण भी आए हैं जब भाषा ने वह भूमिका नहीं निभाई—या निभा नहीं पाई। 1947 के विभाजन के समय, पंजाब में हिंदू, सिख और मुसलमान—तीनों पंजाबी बोलते थे। एक ही बोली, एक जैसी रोज़मर्रा की ज़िंदगी। फिर भी लाशें बिछ गईं। पड़ोसी ने पड़ोसी का गला काटा। साझा मुहावरे किसी की जान नहीं बचा सके।
बंगाल में भी यही त्रासदी दोहराई गई। 1946 में, जब ‘ग्रेट कलकत्ता किलिंग’ हुई, तब वहां के सभी लोग—चाहे हिंदू हों या मुसलमान—बांग्ला ही बोलते थे। लेकिन भाषा उस समय मौन थी, और गूंज रहे थे केवल नारे—राजनीतिक उन्माद और वैचारिक हिंसा के। वही बंगाल, जो चैतन्य से लेकर टैगोर तक, विवेकानंद से लेकर बंकिम तक भारत की आत्मा का रचनात्मक केंद्र था—वही बंगाल, उस एक साल में ऐसा टूट पड़ा कि विभाजन की रक्तधारा वहां से पूर्वी पाकिस्तान तक बह निकली।
और विभाजन के बाद, जिन लोगों ने सोचा कि पूर्वी पाकिस्तान में तो सब बांग्ला बोलते हैं—तो अब सब शांति से रहेंगे—वे भी जल्द ही ठगे गए। क्योंकि भाषा समान थी, लेकिन विचारधारा नहीं। 1950 के दशक से ही पूर्वी पाकिस्तान के बंगाली हिंदुओं पर जो अत्याचार शुरू हुए—वह न केवल लूटपाट या बलात्कार तक सीमित रहे, बल्कि सुनियोजित सांस्कृतिक और धार्मिक सफ़ाए में बदल गए। नोआखाली, बरिसाल, खुलना—हर जगह भाषा एक थी, लेकिन रक्त बहाने वाले हाथ अलग थे।
यह सब हमें एक गंभीर बात सिखाता है—कि भाषा अपने आप में सभ्यता की रक्षक नहीं होती, वह तो केवल माध्यम होती है। उसमें जो डाला जाए, वही निकलता है—प्रेम या घृणा, विवेक या उन्माद। विभाजन भाषाई विविधता के कारण नहीं हुआ, बल्कि उस सोच के कारण हुआ जो मानती है कि अलग पहचान रखने वालों के साथ रहना मना है। जब विचारधारा ज़हर बन जाए, तो सबसे मधुर भाषा भी हथियार बन जाती है।
तस्लीमा नसरीन: सीमाओं से परे एक स्वर
आज मंदिर तोड़े जाते हैं, शोभा यात्राओं को रोका जाता है, और धार्मिक आस्थाओं का मज़ाक उड़ाया जाता है—अक्सर ऐसा करने वाले कोई बाहरी नहीं, बल्कि भीतर के ही लोग होते हैं। वे वही भाषा बोलते हैं जो हम बोलते हैं, लेकिन उनके पास विचार होते हैं जो हिंसा को पवित्र मानते हैं, और वे दावा करते हैं कि सत्य पर उनका एकाधिकार है। वे वही जुबान बोलते हैं, लेकिन उनके नारों में आस्था नहीं, आक्रोश होता है—और श्रद्धा नहीं, संकीर्णता।
लेकिन ऐसे समय में एक और स्वर उभरता है—तस्लीमा नसरीन का। नास्तिक (atheist) होने के बावजूद, उन्होंने बांग्ला भाषा का उपयोग मंदिरों का अपमान करने या परंपराओं का उपहास उड़ाने के लिए नहीं किया। उन्होंने लज्जा जैसी किताबें लिखीं, ताकि उन हिंदुओं की पीड़ा को शब्द मिल सके, जिन्हें कोई और आवाज़ नहीं देता था। उनकी बांग्ला, वह भाषा नहीं थी जो हिंसा भड़काए—बल्कि वह वही बांग्ला थी जिसमें बंकिम ने वंदे मातरम् रचा, जिसमें टैगोर ने जन गण मन गाया, और जिसमें अरविंद घोष ने आत्मा की स्वतंत्रता को स्वर दिया।
तस्लीमा ने नदियों की पूजा का उपहास नहीं उड़ाया, मंदिरों को “अंधविश्वास के अड्डे” नहीं कहा, और मूर्तिपूजा पर लाठियां नहीं चलाईं। उनका संघर्ष किसी परंपरा से नहीं था, बल्कि उस सत्ता से था जो भय, कट्टरता और चुप्पी के सहारे चलती है। इसीलिए उनका स्वर उस पूरे भारत के लिए ज़्यादा प्रतिनिधिक है, जो टूटने की नहीं, जुड़ने की बात करता है—जो मतभेद के बावजूद सह-अस्तित्व में विश्वास रखता है।
उनकी भाषा में तर्क था, पर तिरस्कार नहीं। वे नास्तिक थीं, लेकिन असंवेदनशील नहीं। इसीलिए उनकी बांग्ला हमारे उस साझा भारत की स्मृति है, जिसमें धर्म हो या न हो, लेकिन न्याय ज़रूर हो।
भाषाओं का भारत: मोदी की दृष्टि
प्रधानमंत्री मोदी का भाषाओं के प्रति दृष्टिकोण हमें एक सीधा लेकिन गहरा संदेश देता है—भारत की विविधता कोई बोझ नहीं, बल्कि उसका तेज है। असली ख़तरा भाषाई बहुलता में नहीं, बल्कि उस राजनीति में है जो भाषाओं को तोड़ने का औज़ार बना देती है। तमिल को हिंदी के ख़िलाफ़, मराठी को गुजराती के विरुद्ध, कन्नड़ को उत्तर भारतीयों से काटने की जो रणनीति चली है, वह किसी भाषा की रक्षा नहीं करती—वह सिर्फ़ भारत को कमज़ोर करती है।
लेकिन मोदी का उत्तर किसी टकराव में नहीं है। उनका उत्तर है — संस्कृति की स्पष्टता और सभ्यता की स्थिरता। उन्होंने संसद में सेंगोल को स्थापित करके यह बताया कि तमिल गौरव भारत के गर्व से अलग नहीं है। उन्होंने छत्रपति शिवाजी को एक क्षेत्रीय नेता नहीं, पूरे भारतवर्ष के प्रेरणा स्रोत के रूप में प्रस्तुत किया। मोदी की सोच में हिन्दू राष्ट्रवाद किसी एक भाषा, एक नस्ल या एक क्षेत्र की बात नहीं करता—वह उन सब स्वरूपों को एक सूत्र में पिरोता है, जो अलग-अलग बोलियों में एक ही भाव बोलते हैं।
यह कोई नारेबाज़ी वाला राष्ट्रवाद नहीं है। यह वह भारत है जो हर बोली में भगवान देखता है, और हर उच्चारण में स्वतंत्रता का स्पंदन महसूस करता है। यह वह भारत है जो तमिल में भी अपना है, मराठी में भी, बांग्ला, कन्नड़ और हिंदी—हर भाषा में उसकी आत्मा बोलती है। प्रधानमंत्री मोदी इसी आत्मा को सहेजने की कोशिश कर रहे हैं—शब्दों से नहीं, संकेतों से; चिल्लाकर नहीं, मौन गरिमा से।
आज जब कुछ ताक़तें भाषाओं को हथियार बना रही हैं, तब भारत को यह समझना होगा कि हमारी एकता हमारी आवाज़ों में नहीं, हमारी भावना में है। भारत को बाँटने के लिए भाषा का इस्तेमाल कोई नई बात नहीं—लेकिन भारत को जोड़ने के लिए भाषा को अपनाना, यही हमारी सभ्यता की परंपरा है।
मोदी का राष्ट्रवाद किसी को छोटा दिखाकर नहीं, सबको साथ लेकर चलता है। यही कारण है कि उन्होंने तमिलनाडु और महाराष्ट्र, दोनों में वह दीप जलाया है, जो अब पूरे भारत में एक नयी रोशनी के साथ फैलना चाहिए—बिना बाँटे, बिना झगड़े, सिर्फ़ जोड़ते हुए।

Great PM 🙏