spot_img

HinduPost is the voice of Hindus. Support us. Protect Dharma

Will you help us hit our goal?

spot_img
Hindu Post is the voice of Hindus. Support us. Protect Dharma
17.5 C
Sringeri
Friday, January 16, 2026

क्या ‘गांधीवाद’ आज भी प्रासंगिक है??

यह बात तो ठीक है कि राजे- रजवाड़ों, नवाबों, रियासतों में बंटे इस देश के लोगों में अंग्रेजों के विरुद्ध आजादी की अलख जगाने और उन्हें एकजुट करने में मोहनदास करमचंद गांधी की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। उनके इस प्रयास की भी सराहना होनी चाहिए कि उन्होंने समाज के सभी वर्गों, मजहबों को एक साथ रखने की कोशिश की। हालांकि सफल नहीं हो पाये, यह अलग बात है।

 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के पश्चात भारत में ऐसा कोई आंदोलन या क्रांति नहीं हुई जिसके परिणाम स्वरूप अंग्रेजों को भारत छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा हो। द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात इंग्लैंड की लगातार खराब होती आर्थिक स्थिति के मद्देनजर उन्होंने लगभग सभी उपनिवेशों को स्वतंत्र कर दिया था। भारतवर्ष भी उनमें से एक था। शायद इसीलिए ब्रिटेन के तत्कालीन प्रधानमंत्री एक इंटरव्यू में कहते हैं कि -” भारत की आजादी में गांधी का योगदान ‘नगण्य’ था । “

लेकिन मैं किसी आक्रांता- व्यापारी का विश्वास क्यों करूं ?? मेरा तो यह मानना है कि गांधी ने इस देश को अंग्रेजों के विरुद्ध एकजुट करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और उनका आजादी दिलाने में भी महत्वपूर्ण योगदान रहा है। अपने इन्हीं अहिंसक प्रयासों के लिए गांधी को बापू,  महात्मा, यहां तक कि ‘राष्ट्रपिता??’ भी कह दिया गया।

 ‘गांधीवाद’ से मोहनदास को नाम मिला, शोहरत मिली। लेकिन सत्य यह है कि इस देश ने ‘गांधीवाद’ की भारी कीमत चुकाई है। 1948 के कश्मीर युद्ध के दौरान जब भारतीय सेना हरे टिड्डों को रौंदती हुई पूरे कश्मीर पर कब्जा करने की ओर बढ़ रही थी, तब ‘गांधीवाद’ के रोग से ताज़ा- ताज़ा पीड़ित उनके सबसे दुलारे चेले जवाहरलाल नेहरू इस मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र संघ में लेकर चले गए। यह विश्व के इतिहास में पहला और अनूठा मामला था जब जीतने वाली सेना न्याय के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ में गई हो। उनके उस ‘गांधीवादी’ कृत्य का नासूर हम जम्मू और कश्मीर समस्या के रूप में आज तक भुगत रहे हैं। 

1962 का युद्ध भी हम इसी गफलत में हारे कि ‘गांधीवाद’ से ही देश और विश्व का कल्याण हो सकता है। चीन की चालबाज़ियों का जवाब गांधीगीरी से कतई संभव न था। वह लात के देवता थे, बातों से कैसे मान जाते। 1965 के युद्ध में भारतीय सेना लाहौर तक तिरंगा फहरा चुकी थी। पाकिस्तान घुटनों पर आ चुका था, तभी पता नहीं कैसे गुदड़ी के लाल,  लाल बहादुर शास्त्री भी ‘गांधीवाद’ वायरस की चपेट में आ गये (या लाये गए?) और भारतीय सेना के समस्त बलिदानों और पराक्रम के बदले, हमें सिर्फ ताशकंद समझौता नामक एक झुनझुना और लाल बहादुर शास्त्री की  संदेहास्पद परिस्थितियों में लाश मिली। 

1971 के ऐतिहासिक युद्ध में भारतीय सेना ने पाकिस्तान के 90,000 सैनिकों को बिना शर्त आत्मसमर्पण करने पर मजबूर कर दिया था। यह विजय विश्व इतिहास की सबसे बड़ी सैन्य विजयों में से एक थी।  तब आधुनिक दुर्गा कही जाने वाली मजबूत नेता इंदिरा फिरोज खान भी ‘गांधीवाद’ के इसी रोग से ग्रसित हो गई और पूरे कश्मीर को भारत में मिलाने के एक स्वर्णिम अवसर को इंदिरा के ‘गांधीवाद’ ने आपदा बनाकर रख दिया। जो कुछ भी हम हज़ारों सैनिकों के बलिदान से युद्ध में जीते, वार्ता की टेबल पर गांधीगीरी के कारण हार गए।

1999 के कारगिल युद्ध के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री और धुर दक्षिणपंथी अटल बिहारी बाजपेई  भी पता नहीं कैसे ‘गांधीवाद’ के ज्वर से पीड़ित हो गए थे। उन्होंने  एलओसी  पार न करने की एकतरफा, आत्मघाती घोषणा करके न सिर्फ सेना के हाथ बांध दिए बल्कि एक तरफ से  विश्व के समक्ष एलओसी को ही अंतरराष्ट्रीय सीमा भी स्वीकार कर लिया।

वर्तमान समय मे देखें तो दलाई लामा दशकों से गांधीवादी तरीके से तिब्बत को चीन के चंगुल से आजाद कराने की कोशिश कर रहे हैं ।  परिणाम यह प्राप्त हुआ है कि वह भारत में एक शरणार्थी की निर्वासित जिंदगी जी रहे हैं। निकट भविष्य में भी उनकी गांधीगीरी का कोई सकारात्मक परिणाम आने की संभावना दूर- दूर तक नज़र नहीं आती है। पड़ोसी देश बांग्लादेश में कार्यवाहक गांधीवादी नेता के सत्ता संभालने के बाद क्या हो रहा है, दुनिया देख ही रही है।

 वहीं दूसरी ओर इजरायल नेताजी सुभाष  की राह पर चलकर तमाम दुश्मनों के बीच गर्व से सीना ताने खड़ा है। हमास से लेकर हू

हिजबुल्ला तक और लेबनान से लेकर ईराक तक अपनी दहशत कायम किये हुए है। अमेरिका भी अभी तक विश्वनेता इसलिए है क्योंकि वह अपने दुश्मनों के सामने चरखा नहीं चलाता बल्कि उनके घर में घुसकर मारता है, दुश्मनों को जल समाधि दे देता है। चीन भी इसलिए विश्वशक्ति है क्योंकि वह अपने दुश्मनों पर कोई रहम नहीं करता, चाहे वह बाहर के शत्रु हों या देश के अंदर के। अपनी इसी दबंगई के बल पर शान्तिप्रिय समुदाय का भी उसने स्थायी इलाज कर रखा है।

निष्कर्ष यह कि ‘गांधी-वाद” भाषणों में, किताबों  में अच्छा लगता है और “सुभाष- वाद”  रियल वर्ल्ड ,  व्यवहारिकता का सिद्धांत है। गांधी -वाद सुनने और कहने की चीज़  है और सुभाष -वाद करने की ।

#गाँधीजयंती

-आशा विनय सिंह बैस

Subscribe to our channels on WhatsAppTelegram &  YouTube. Follow us on Twitter and Facebook

Related Articles

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Latest Articles

Sign up to receive HinduPost content in your inbox
Select list(s):

We don’t spam! Read our privacy policy for more info.

Thanks for Visiting Hindupost

Dear valued reader,
HinduPost.in has been your reliable source for news and perspectives vital to the Hindu community. We strive to amplify diverse voices and broaden understanding, but we can't do it alone. Keeping our platform free and high-quality requires resources. As a non-profit, we rely on reader contributions. Please consider donating to HinduPost.in. Any amount you give can make a real difference. It's simple - click on this button:
By supporting us, you invest in a platform dedicated to truth, understanding, and the voices of the Hindu community. Thank you for standing with us.