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Thursday, May 26, 2022

हिन्दुओं की लिंचिंग की बात क्यों नहीं होती?

कल राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रमुख श्री मोहन भागवत के एक बयान को लेकर समर्थकों में जहाँ गुस्सा हैं तो वहीं विपक्षी उन्हें घेर रहे हैं। कल उन्होंने लिंचिंग को लेकर कहा था कि “भारत हिंदू राष्ट्र है, गौमाता पूज्य है लेकिन लिंचिंग करने वाले हिंदुत्व के खिलाफ जा रहे है, वो अताताई है। कानून के जरिए उनका निपटारा होना चाहिए। क्योंकि ऐसे केसेज बनाए भी जाते है तो बोल नहीं सकते आज कल कि कहां सही है कहां गलत है।”

वैसे तो उनके भाषण की कई बातों पर लोग प्रश्न उठा रहे हैं, परन्तु सबसे महत्वपूर्ण यही शब्द है “लिंचिंग।” क्योंकि अभी तक ऐसा शायद ही हुआ हो कि हिन्दुओं ने एकजुट होकर, इकट्ठे होकर गाय के नाम पर लिंचिंग की हो। यदि ऐसा हुआ होता, तो आज गौ वध पर प्रतिबंध होने के बावजूद गौ माता की तस्करी नहीं हो रही होती। मगर फिर भी मोहन भागवत जी ने यह बयान दिया। मगर एक भी उदाहरण नहीं दिया कि कहाँ पर हिन्दुओं ने मुस्लिमों की लिंचिंग की?

क्या मात्र इस एक वाक्य ने हिन्दुओं को ‘लिंचर’ की श्रेणी में नहीं ला दिया? और आप यह क्यों भूल रहे हैं कि आप का ही कैडर केरल में लिंचिंग से मारा जा रहा है, पर आपने एक भी शब्द नहीं कहा। आपके ही विचार माने चूंकि आप भारत को हिन्दू राष्ट्र कहते हैं, तो हिन्दू लोग ही तो पश्चिम बंगाल में मारे जा रहे हैं, और उन्हें कौन मार रहा है? क्या जो मारे जा रहे हैं, उन्होंने एक बार भी यह कहा होगा कि हम समान डीएनए वालों के साथ नहीं रहेंगे? नहीं, वह तो सर्व धर्म समभाव में ही विश्वास करते हैं, तभी छले जा रहे हैं!

नहीं, भागवत जी, नहीं! यह एक सामान्य हिन्दू की पीड़ा है, कि कल आपके एक वक्तव्य ने उसे उस झूठे धरातल पर ला दिया है, जहाँ पर वह अपनी लिंचिंग की कहानी भी नहीं सुना पाएगा क्योंकि वह तो खुद ही लिंचिंग करता है और कहा किसने? कहा विश्व के सबसे बड़े संगठन आरएसएस प्रमुख ने!

लिंचिंग हुई थी, पालघर में दो साधुओं की! क्या दोष था उनका? सिवाय भगवा वस्त्रों के? उनकी लिंचिंग हुए एक वर्ष से अधिक हो गया है, और धीरे धीरे लोगों को जमानत मिलती जा रही है, मगर उनका उल्लेख कहीं नहीं होता?

गाय के नाम पर आपको लिंचिंग याद रही, मगर एकतरफा लिंचिंग! वैसे तो कई घटनाएं गिनाई जा सकती हैं, परन्तु फिर भी यदि गाय के नाम पर लिंचिंग हो रही होती तो इटावा में वर्ष 2018 में औरैया जिले की बिधूना कोतवाली में तीन साधुओं को अपनी जान से हाथ नहीं धोना पड़ता, क्योंकि गौ तस्करों को भय होता कि उनकी लिंचिंग हो जाएगी। मगर उलटे उनका विरोध करने वाले साधुओं को ऐसी क्रूर मृत्यु मिली जिसे सुनकर आज तक वहां के लोग रो पड़ते हैं।

उन्होंने गौ तस्करों को गौ वध करने से मना किया था, तो इस कारण उनकी जीभ ही काट ली गयी थी, और उनकी जीभ इसलिए काट ली गयी थी क्योंकि उन्होंने गौ तस्करों को गौकशी करने से रोका था। मगर 2018 के साधुओं पर भी आपने कुछ नहीं कहा और न ही पालघर के साधुओं पर?

क्या यह लिंचिंग नहीं है? इसके अलावा भी कई हिन्दुओं की लिंचिंग हुई है और उन्हीं के द्वारा हुई है, जिन्हें यहाँ पर कथित रूप से रहने में डर लगता है। पर आपने कल कह दिया कि हिन्दू लिंचिंग करते हैं? क्या यह गौ तस्करों को एक प्रकार से क्लीन चिट नहीं है? अवैध गौ वध केवल क़ानून की समस्या नहीं है। यह एक प्रकार से यहाँ के बहुसंख्यकों की आत्मा पर प्रहार है। यह जैसे बार बार उन्हें अपमानित करना है कि क्योंकि गाय हिन्दुओं की माता समान है तो हम अपने ही पड़ोसी की गाय काटकर उस पर प्रहार करेंगे? उसकी आत्मा को छलनी करेंगे, उसके अस्तित्व पर प्रहार करेंगे!

कल जब आप उनके मंच पर थे तो आप यह भी कह सकते थे कि गौवध न किया करें वह! पर वह आपने नहीं कहा। आपने यह क्यों नहीं कहा, बस यही कई लोगों का प्रश्न है? जब लिंचिंग की बात हुई तो उन हिन्दुओं के क्षत विक्षत शव आपको क्यों नहीं दिखे? यही लोग जानना चाह रहे हैं!

आप से लोग अपनी शिकायत नहीं कहेंगे तो किससे कहेंगे? और आपके एक वक्तव्य ने उन सभी के शवों को संदेह के घेरे में ला दिया, जिन्होनें अपनी गौमाता को बचाने के लिए अपने प्राण दे दिए और ओवैसी एवं दिग्विजय जैसे लोगों के निशाने पर हिन्दुओं को ला दिया।

और बेचारा युवा चंदन गुप्ता, जिसका मात्र इतना दोष था कि वह 26 जनवरी को निकाली जाने वाली तिरंगा यात्रा में शामिल था, उस पर तो केवल तिरंगा ही लिए जाने के कारण गोली चला दी गयी थी। और उसमें कौन पकड़ा गया था? पर उसके इस बलिदान का उल्लेख किसी मंच पर नहीं होता!

हिन्दू दरअसल इन सब शवों के साथ स्वयं को छला अनुभव कर रहा है, और पूछ रहा है कि वह अपनों के एक वक्तव्य के कारण उस अपराध के लिए दोषी ठहरा दिया गया है, जो उसने किया ही नहीं और जैसे गौमाता की रक्षा का अधिकार भी उससे उसके अपने ही छीने ले रहे हैं! भारत का बहुसंख्यक मात्र इतना चाहता है कि उसका दर्द मंचों से उठाया तो जाए? उसके कन्धों पर शवों का बहुत बोझ है, कम से कम उसके अपने तो उसका दर्द साझा करें!


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