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Thursday, December 2, 2021

राज्यपाल जैसे पद पर रहते हुए यह क्या बोल गए सत्यपाल मलिक?

मूल रूप से समाजवादी विचारों वाले एवं समाजवादी पार्टी के टिकट पर अलीगढ़ से वर्ष 1996 में चुनाव लड़ने वाले सत्यपाल मलिक वर्ष 2004 में भारतीय जनता पार्टी में सम्मिलित हुए थे। हालांकि वह वर्ष 1984 में कांग्रेस में शामिल हुए थे और तीन वर्ष तक पार्टी की ओर से राज्यसभा सांसद रहे और फिर 1988 में जनता दल में शामिल हुए। उसके बाद वर्ष 2004 में भाजपा में सम्मिलित हुए।

इसका अर्थ यह है कि सत्यपाल मलिक हर दल की यात्रा के बाद भाजपा में आए और भाजपा में आने के बाद यहीं के हो गए, एवं अब तो वह मेघालय के राज्यपाल हैं।

हाल ही में सत्यपाल मलिक बहुत चर्चा में हैं। यहाँ तक कि आज तो उन्हें पदमुक्त करने का आह्वान करने वाला एक हैशटैग भी चल रहा है। #SackSatyapalMalik। और आम लोग बहुत गुस्सा व्यक्त कर रहे हैं। पर ऐसा हो क्यों रहा है? सत्यपाल मलिक तो ऐसे पद पर हैं, जिसे लोग केवल केंद्र सरकार का ही प्रतिनिधि मानते हैं।

दरअसल उन्होंने एक वीडियो में धमकी जैसे स्वर में प्रधानमंत्री मोदी से मुलाक़ात के साथ उल्लेख का दावा करते हुए कहा है कि  “उनसे मिलने गया तो मैंने उन्हें कहा कि आप गलतफहमी में हैं। न तो इन सिक्खों को हराया जा सकता है, इनके गुरु के चारों बच्चे उनकी मौजूदगी में खत्म हुए थे, लेकिन उन्होंने सरेंडर नहीं किया। इन जाटों को भी नहीं भगाया जा सकता है। आप यह सोचते हों कि ये ऐसे ही चले जाएंगे, इन्हें कुछ ले-देकर भेज दो। मैंने उनसे कहा कि दो काम तो बिल्कुल भी मत करना, एक तो इनपर बल प्रयोग मत करना और दूसरा इन्हें खाली हाथ मत भेजना, क्योंकि यह भूलते भी नहीं हैं। 300 साल तक नहीं भूला। मिसेज गांधी ने जब अकाल तख्त तोड़ा था तो उन्होंने अपने फार्म हाउस पर महामृत्युंजय का यज्ञ करवाया था। और जब मैंने उनसे पूछा कि आप तो यह सब मानती नहीं हैं तो उन्होंने कहा कि तुम जानते नहीं हो, यह लोग तीन सौ साल तक नहीं भूलते हैं। मैं श्योर हूँ कि यह लोग मुझे मारेंगे। मने, इंदिरा गांधी जी को यह अंदाजा था कि यह लोग उन्हें मारेंगे। और उन्होंने मारा। जनरल वैद्या को उन्होंने पुणे में जाकर मारा, और जनरल डायर को लंदन जाकर मारा। इसलिए इनके पेशेंस का इम्तिहान न लें, और परसों मीटिंग में दो जनरल भी थे, जिन्होनें यह कहा कि इस किसान आन्दोलन से सेना पर भी प्रभाव पड़ रहा है!”

सत्यपाल मलिक हालांकि कई दिनों से ऐसे ही बयान दे रहे हैं। पर वह ऐसा क्यों कर रहे हैं? इस विषय में जो अनुमान लगाए जा रहे हैं वह यही हैं कि अब शायद राज्यपाल के रूप में यह इनकी अंतिम पारी है और अब आगे उन्हें कुछ मिलना नहीं है, इसलिए वह “राजनीतिक शहादत” देने के लिए ऐसे उल जलूल बयान दे रहे हैं, जिससे सरकार उन्हें हटा दे और वह राजनीतिक शहादत का फायदा उठा सकें। वैसे राजनीतिक गलियारों में समाजवादी और भाजपाई सत्यपाल मलिक के विषय में कई चर्चाएँ होती रहती हैं, कि कैसे वह आपातकाल में जेल जाने से बचे थे।

इस विषय में वरिष्ठ पत्रकार एवं आपका अख़बार के सम्पादक प्रदीप सिंह का यह वीडियो काफी परतें खोलता है। वह बताते हैं कि सत्यपाल मलिक अपनी सेटिंग से आपातकाल में जेल जाने से बच ही नहीं गए थे बल्कि साथ ही उन्होंने अपने साथियों को भी गिरफ्तार करा दिया था।

वह कहते हैं, कि आपातकाल के बाद चौधरी चरण सिंह को सुधीर गोयल द्वारा इस बात का पता चला था तो उन्होंने उन्हें पार्टी से निकाल दिया और फिर 1984 में उन्होंने कांग्रेस ज्वाइन कर ली थी। और उसके बाद अटल जी की सरकार के समय भारतीय जनता पार्टी में आ गए थे।

प्रदीप सिंह के अनुसार उन्हें भारतीय जनता पार्टी ने उनकी क्षमता से अधिक दे दिया है और उन्हें यह पता है कि अब भारतीय जनता पार्टी उन्हें कुछ दे नहीं सकती है।

राजनीति से परे कुछ प्रश्न:

यह तो राजनीति थी कि वह चाहते हैं कि किसानों के नाम पर ही सही और जाट नेता के नाम पर ही सही, उन्हें कुछ मिल जाए। परन्तु राजनीति के चक्कर में कुछ प्रश्न उठते हैं। जैसे:

  1. क्या वह इंदिरा गांधी के हत्यारों का महिमामंडन कर रहे हैं?
  2. क्या वह वर्तमान प्रधानमंत्री और सेनाध्यक्ष को धमकी दे रहे हैं?
  3. क्या वह सेना में विद्रोह करके जाटों की तालियाँ बटोर रहे हैं?
  4. क्या वह इन कथित किसानों और स्वतंत्रता सेनानियों को एक ही तराजू में तौलते हैं?

इन सभी प्रश्नों के उत्तर मिलने आवश्यक हैं। क्योंकि यह जानना आवश्यक है कि यह सब बातें उन्होंने राज्यपाल होते हुए कहीं हैं या फिर जाटनेता के रूप में? क्योंकि यह देखना और सुनना अत्यंत निराशाजनक है कि जब वह यह सब बोल रहे थे तो तालियाँ बज रही थीं।

क्या कोई भी विषय ऐसा हो सकता है कि वह प्रधानमंत्री की हत्या को ही उचित ठहरा दे? क्या एक राज्यपाल ऐसा बोल सकता है?

क्या एक संवैधानिक पद पर बैठा व्यक्ति ऐसा कह सकता है? क्या इसके लिए उन्हें अपने पद से त्यागपत्र नहीं देना चाहिए?

जब यह प्रश्न उनसे सुशांत सिन्हा ने पूछा तो वह शो छोड़कर चले गए।

कल इस वीडियो को ट्वीट करते हुए फिल्म निर्माता अशोक पंडित ने कहा कि उनसे इस गैर जिम्मेदाराना वक्तव्य के लिए इस्तीफा माँगा जाना चाहिए।

अब इस वीडियो को लेकर लोगों में गुस्सा बढ़ गया है और लोग सत्यपाल मलिक को हटाए जाने की बात कर रहे हैं।

यह भी दुर्भाग्य है कि वर्ष 1984 में कांग्रेस के टिकट पर राज्यसभा जाने वाले सत्यपाल मलिक कांग्रेस की नेता और भारत की पूर्व प्रधानमंत्री की हत्या को उचित ठहरा ही नहीं रहे हैं बल्कि ह्त्या का महिमामंडन भी कर रहे हैं।

इसी बात को लेकर आनन्द रंगनाथन भी कह रहे हैं:

यह देखना अत्यंत दुखद है, परन्तु इसके अतिरिक्त एक और बात है जिस पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है, कि इस पूरे वक्तव्य में महामृत्युंजय जप का भी अपमान है! सत्यपाल क्या प्रमाणित करना चाहते हैं कि महामृत्युंजय मन्त्र निष्फल है?

बाहर से भाजपा में आए सभी नेताओं की यह प्रवृत्ति दिखेगी कि जैसे ही उन्हें यह पता लगने लगता है कि अब भारतीय जनता पार्टी उन्हें पूछेगी नहीं, वैसे ही वह अपना असली रंग दिखाने लगते हैं, फिर चाहे वह सत्यपाल मलिक हों या पूर्व में यश्वंस सिन्हा!

देखना यह होगा कि इस सरकार से प्राप्त संवैधानिक पद पर बैठे सत्यपाल मलिक इसी प्रकार विखंडनकारी बातें करना चालू रखेंगे या रुकेंगे? जिसमें रुकने की संभावना नगण्य दिखती है, क्योंकि वह जो भी कह रहे हैं, वह जानते बूझते कह रहे हैं और राजनीतिक उद्देश्य से कह रहे हैं।

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