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Wednesday, December 8, 2021

हिन्दू लड़कियों के धर्म विमुख होने के कारण: हिन्दू स्त्रियों के इतिहास को उनसे छिपाना

हिन्दू लड़कियों के इस्लाम की तरफ आकर्षित होने का एक जो सबसे बड़ा कारण है, वह है अपनी हिन्दू धर्म की स्त्रियों की गौरवपूर्ण परम्पराओं से दूर रहना और साथ ही उस गौरवशाली इतिहास के विषय में जानकारी न होना, जो उनकी ही स्त्रियों का है, और यदि वह उनके सामने आया भी तो बेहद खंडित होकर और एक दूसरे ही रूप में। कुछ एक उदाहरणों से समझते हैं। वामपंथियों ने सदा कहा कि हिन्दू स्त्रियों का स्थान नीचे था, निम्न था, उनका अपना इतिहास नहीं था, उनका अपना साहित्य नहीं था, परन्तु क्या यही सत्य है?

दरअसल हिन्दू स्त्रियों की लड़ाई दो तरफ़ा रही है। एक तरफ तो उन्हें उस पूरी मानसिकता से लड़ना पड़ा है  जो उन्हें दोयम दर्जे का मानती थी और दूसरा षड्यंत्र था वामपंथियों द्वारा उनकी कहानियों को जानबूझ कर दबाए रखना ताकि स्त्रियाँ इसी अबला मानसिकता का शिकार बनी रहें एवं इस प्रकार पूरी भारतीय संस्कृति को बदनाम किया जा सके।

यदि वैदिक युग की स्त्रियों पर नज़र डालते हैं तो हम पाते हैं कि वेदों में कई ऋषिकाओं ने कई सूक्तों की रचना की है, जिनमें अदिति से लेकर विश्ववारा एवं रोमशा, सूर्या सावित्री आदि ऋषिकाएं हैं जिनके नाम से आज की लडकियां वंचित हैं, उनके लिए भारतीय स्त्रियों में केवल सीता और द्रौपदी हैं और सीता को वह बेचारा और अबला मानती हैं। जब से राम पर कथित रूप से प्रश्न उठने आरम्भ हुए तब से सीता का चरित्र और निर्बल होता चला गया। लड़कियों की नज़र में माता सीता एक निर्बल स्त्री थी जिसे उनके पति ने निकाल दिया एवं उसने अंतत: आत्महत्या कर ली!

जबकि माता सीता से बढ़कर आज तक पूरे विश्व के इतिहास में कोई भी मजबूत स्त्री नहीं हुई, जिन्होनें विश्वविजेता पति तथा न्यायप्रिय पिता के घर न जाकर ऋषि के आश्रम में शरण ली एवं अपने पुत्रों को तत्कालीन सर्वोत्तन शिक्षा देने के साथ ही स्वाभिमान की शिक्षा दी।  परन्तु तथाकथित स्त्री वादियों के लिए इसलिए सीता स्वतंत्र स्त्री नहीं हैं क्योंकि उन्होंने अपने पुत्रों को अपने पिता के विरुद्ध खड़ा नहीं होना सिखाया।  यदि माता सीता ने अपने पुत्रों के मन में उनके पिता अर्थात श्री राम के प्रति विषवमन किया होता एवं समाज की व्यवस्था से इतर जाने की शिक्षा दी होती तो माता सीता आज की स्त्री वादियों की आदर्श होतीं, पंरतु ऐसा नहीं है।

यदि सावित्री सत्यवान को बीमार छोड़कर चली गयी होतीं और अपने निजी जीवन को दाम्पत्त्य पर प्राथमिकता दी होती तो सावित्री आज आधुनिक स्त्रियों के लिए आदर्श होतीं।

समस्या यह नहीं कि सावित्री को उनके विमर्श ने पिछड़ा घोषित किया, समस्या यह है कि एक आधुनिक, अपने आप प्रेम और विवाह और फिर अपने पति की बीमारी को ठीक करने वाली मजबूत स्त्री को आपने वट सावित्री तक ही क्यों समेट दिया? हर स्त्री सावित्री चाहिए, मगर पति का साथ केवल वट सावित्री की पूजा करके नहीं मिलता? जो दाम्पत्त्य का सबसे आदर्श रूप था, उसे आडम्बर क्यों बना दिया गया और आज जिस भूमि पर सावित्री और कैकई जैसी स्वतंत्र निर्णय लेने वाली स्त्रियों ने जन्म लिया, वही धरती प्यार के आदर्श के रूप में सोहनी महिवाल का नाम सुनती है।

सीता और सावित्री का देश कहने वालों से शिकायत नहीं है, शिकायत है सीता और सावित्री को आडम्बर में समेट देने वाले अपने लेखकों से,।

मानवीय रूप में सावित्री का प्रेम क्यों नहीं आया, क्यों हिंदी में हमें इस तरह से सावित्री पर कोई कविता नहीं मिलती जो 21 वर्षीय तोरू दत्ता ने अंग्रेजी में लिख दी थी,

She saw some youths on sport intent,

Sons of the hermits, and their peers,

And one among them tall and lithe

Royal in port,—on whom the years

Consenting, shed a grace so blithe,

So frank and noble, that the eye

Was loth to quit that sun-browned face;

She looked and looked,—then gave a sigh,

And slackened suddenly her pace

What was the meaning—was it love?

Love at first sight, as poets sing,

तोरू दत्ता की अंग्रेजी कविताएँ भारतीयता की भावना से ओतप्रोत हैं, और उस बच्ची ने हर चरित्र को मानवीय बनाकर प्रस्तुत किया, आडम्बर के साथ नहीं!

आज हमारी नन्ही लडकियां सीता और सावित्री या फिर उर्मिला का रोता हुआ रूप पढ़ रही हैं! कलपती हुई स्त्रियाँ, जबकि यह सभी स्वतंत्र निर्णय लेने वाली स्त्रियाँ थीं। क्या होगा यदि स्त्रियों के सामने मजबूत स्त्रियों का रोता हुआ रूप ही हमेशा प्रस्तुत किया जाएगा!  वह भारतीय स्त्रियों के प्रति हमेशा ही ऐसी दृष्टि रखेंगी जिनके पास जरा भी अधिकार नहीं थे।

इसी प्रकार एक षड्यंत्र और खेला जा रहा है सीता और सावित्री जैसी मजबूत स्त्रियों को कमज़ोर साबित कर द्रौपदी को मजबूत स्त्री साबित कर इन चरित्रों में आपस में संघर्ष कराना, जैसे कबीरदास और तुलसी दास के साथ किया जा चुका है एवं सफल भी रहा है। स्त्री चरित्रों में यह अभी अपने प्रयासों में सफल नहीं हो पाए हैं।

वामपंथियों का मूल चरित्र है विवाद उत्पन्न करना एवं फिर उस विवाद का हल अपने अनुसार खोजना। पहले उन्होंने विवाद खोजा, वेदों को झूठ साबित किया, और जब वेदों को ही मिथ्या साबित कर दिया तो उसमें लिखने वाली स्त्रियाँ कैसे वास्तविक हो सकती है। अब इस पर विवाद कि क्या वह स्त्रियाँ हैं भी या नहीं?

विवादों को लच्छों में पकाकर खाना वामपंथियों की आदत है। मनुस्मृति के कुछ श्लोकों से आपत्ति हो सकती है, एवं कई घोर आपत्तिजनक हैं भी, परन्तु यह भी बात सत्य है कि यह संहिताएँ और स्मृतियां एक निश्चित समय के लिए होती थीं, एवं काल तथा परिस्थिति के अनुसार उनमें पर्याप्त परिवर्तन हो सकता था। यह बात वामपंथी बहुत ही शातिरता से छिपा जाते हैं तथा मनुस्मृति को आधार बनाकर देश तोड़ने की चाल चल जाते हैं।  यह बात वह नहीं बताते कि मनु स्मृति के अतिरिक्त और भी कई स्मृतियाँ हैं जिन्होनें अपने अपने काल खंड के अनुसार नियम बनाए।

*कल हम वेदों में उपस्थित ऋषिकाओं के विषय में पढेंगे!


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