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Thursday, December 2, 2021

झांसी की रानी लक्ष्मीबाई: गुलाम फेमिनिस्ट के झूठ के लिए सबसे बड़ी चुनौती

भारत में गुलाम फेमिनिज्म हर हिन्दू स्त्री को उस विचार का गुलाम बनाना चाहता है, जो स्वतंत्र है, जो निर्णय ले सकती है, जो अन्याय का विरोध कर सकती है और जो यह समझती है कि उसके लिए क्या सही है और क्या गलत। स्वतंत्रता के बाद से ही हिन्दू स्त्रियों के मन में उनके प्रति हीनता का बोध उत्पन्न करने का एक बहुत बड़ा षड्यंत्र चला है, परन्तु उस षड्यंत्र को तोड़ने के लिए कई ऐसी नायिकाएं हैं, जो हिन्दू स्त्रियों की चेतना को आकार देती हैं, प्रेरणा देती हैं,

ऐसी ही नायिका हैं, झांसी की रानी लक्ष्मी बाई। वाराणसी में जन्मी 19 नवम्बर 1828 को जन्मी मणिकर्णिका को यह आभास भी नहीं हुआ होगा कि एक दिन उनका नाम ऐसा होगा कि हिन्दू ही नहीं,बल्कि समूची स्त्रियों के लिए प्रेरणा बन जाएगा। मणिकर्णिका के जीवन के विषय में बच्चा जानता है। और सुनकर उत्साहित होता है एवं उसके हृदय में अन्याय से लड़ने की प्रेरणा स्वत: ही आ जाती है।

उनका जीवन इस जहर बुझे फेमिनिज्म की कई धारणाओं को तोड़ता है। सबसे पहली धारणा कि हिन्दू परिवारों की स्त्रियों को दबाकर रखा जाता था। उनके पास पढने लिखने का अधिकार नहीं था। उनका शोषण होता था।

और कथित पितृसत्ता ही थी जो उन्हें अध्ययन या सैन्य गतिविधियों में सम्मिलित होने से रोकती थी।

आज मणिकर्णिका के जीवन पर एक दृष्टि डालते हैं तो पाते हैं कि मनु के जीवन में उनकी माँ के स्नेह की छाँव नहीं थी। अर्थात वह उस कथित पितृसत्ता के साए में पली बढीं, जिस पितृसत्ता ने फेमिनिज्म के अनुसार लड़की को आगे नहीं बढ़ने दिया। (हिन्दू लड़कियों को)। पर मनु के पिता ने हाथियों और घोड़ों की सवारी के साथ हथियारों का प्रभावी ढंग से उपयोग करना सिखाया था। झाँसी की रानी लक्ष्मी बाई नाना साहिब और तात्या टोपे के साथ पली बढ़ी थी।

अर्थात हिन्दू पुरुषों पर जो यह आरोप लगाती हैं कि वह अपनी पुत्रियों को आगे नहीं बढ़ने देते थे, इस झूठ को यह तथ्य काटता है।

मनु का विवाह झांसी के महाराज गंगाधर राव के साथ हुआ। उसके उपरान्त उन्हें लक्ष्मीबाई के नाम से जाना जाने लगा।

विवाह के उपरान्त उनके एक पुत्र हुआ, परन्तु वह असमय काल कलवित हो गया। इस शोक से वह उबर भी नहीं पाई थीं कि उनके पति का भी स्वास्थ्य गिरने लगा। गंगाधर राव निसंस्तान नहीं इस धरा से जाना चाहते थे। अत: उन्होंने हिन्दू धर्म के अनुसार पुत्र गोद लेने की इच्छा व्यक्त की।

यह किसी भी व्यक्ति का धार्मिक अधिकार है कि वह अपना वंश आगे बढ़ाने के लिए, अपने राज्य की रक्षा के लिए पुत्र गोद ले सकता है। हिन्दुओं में यह अधिकार आदिकाल से चला आ रहा है। परन्तु धार्मिक नीति में हस्तक्षेप की बात न करने वाले दुष्ट अंग्रेजों ने हिन्दुओं के हर धार्मिक अधिकार पर अतिक्रमण किया, जिससे उनका राज्य बढ़ सके।

“दत्तक पुत्र” का अधिकार धर्म का अधिकार है, जिसे लार्ड डलहौजी की राज्य हड़प नीति के अंतर्गत यह नियम बनाया कि यदि उत्तराधिकारी नहीं है, तो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से ब्रिटिश सरकार के सहयोग से चलने वाले राज्य अपने आप ही राजा की मृत्यु के बाद अंग्रेजों के अधीन हो जाएंगे,। झांसी ऐसा ही राज्य था।

जो भी लोग यह कहते हैं कि अंग्रेजों ने अपने आप को धार्मिक अधिकारों से दूर रखा, वह सबसे बड़ा झूठ और छल करते हैं। वंश चलाने के लिए पुत्र न गोद लेने देना और उसे गोद लेने वाले पिता का वैध पुत्र न मानना, क्या धर्म में हस्तक्षेप नहीं था?

इस नीति के चलते, गंगाधर राव की मृत्यु के उपरान्त अंग्रेजों ने झांसी पर अधिकार कर लिया। वर्ष 1825 में कंपनी ने यह स्वीकार किया था कि वह सभी हिन्दू मान्यताओं को अधिकार देते हुए कार्य करेगी। और राज्य चलाने के लिए पुत्र गोद लेना ऐसी ही एक परम्परा थी, जिसे अंग्रेजों ने नहीं माना और झांसी पर अधिकार कर लिया।

यही समय था जब हर जगह असंतोष था और फिर आया वर्ष 1857! जो विद्रोह हुआ था, वह पूरी तरह से धार्मिक स्वतंत्रता के लिए था, क्योंकि हिन्दू दर्शन में धर्म, अर्थ और काम-मोक्ष की मान्यता है।

अपने पति की मृत्यु के उपरांत उन्होंने शासन सम्हाला और सेना बनाई। उनकी सेना में महिलाएं भी सम्मिलित थीं।  और जब स्वतंत्रता का संग्राम हुआ तो वह पीछे नहीं हटीं। उन्होंने नेतृत्व के गुणों का परिचय दिया। उन्होंने अपनी झांसी को बचाने के लिए हर संभव प्रयास किया। परन्तु अंग्रेजी सेना बहुत विशाल थी और किसी न किसी तरह इस संग्राम को वह दबाने में सफल रहे। रानी ने लड़ते लड़ते अपने जीवन का बलिदान दे दिया, परन्तु हार नहीं मानी। यहाँ तक कि जनरल ह्यूरोज़ ने रानी लक्ष्मी बाई की तारीफ में कहा कि रानी लक्ष्मीबाई ने अपनी चालाकी और दृढ़ता के लिए बहुत खास तो थी लेकिन विद्रोही नेताओं में सबसे ज्यादा ताकतवर और भारतीय सैनिको में सबसे खतरनाक भी थी।

आज के दिन हम अपने पाठकों के साथ सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता के कुछ अंश साझा कर रहे हैं, जो आपको लक्ष्मी बाई के प्रति सम्मान के भाव से भर देंगी और आपको स्वयं ही टुकड़े टुकड़े फेमिनिज्म से घृणा हो जाएगी:

तो भी रानी मार काट कर चलती बनी सैन्य के पार,

किन्तु सामने नाला आया, था वह संकट विषम अपार,

घोड़ा अड़ा, नया घोड़ा था, इतने में आ गये अवार,

रानी एक, शत्रु बहुतेरे, होने लगे वार-पर-वार।

घायल होकर गिरी सिंहनी उसे वीर गति पानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

रानी गई सिधार चिता अब उसकी दिव्य सवारी थी,

मिला तेज से तेज, तेज की वह सच्ची अधिकारी थी,

अभी उम्र कुल तेइस की थी, मनुज नहीं अवतारी थी,

हमको जीवित करने आयी बन स्वतंत्रता-नारी थी,

दिखा गई पथ, सिखा गई हमको जो सीख सिखानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

जाओ रानी याद रखेंगे ये कृतज्ञ भारतवासी,

यह तेरा बलिदान जगावेगा स्वतंत्रता अविनासी,

होवे चुप इतिहास, लगे सच्चाई को चाहे फाँसी,

हो मदमाती विजय, मिटा दे गोलों से चाहे झाँसी।

तेरा स्मारक तू ही होगी, तू खुद अमिट निशानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

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