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Thursday, October 6, 2022

हिन्दी साहित्य में श्री कृष्ण: सूरदास एवं मीराबाई की भक्ति से लेकर वामपंथी कवियों तक

हिन्दी साहित्य में प्रभु श्री कृष्ण पर बहुत कविताएँ लिखी गयी हैं। वह मुग्ध है, वह मोहित है, वह श्री कृष्ण की लीलाओं को रचता है, उनके साथ गाता है, वह कृष्ण के साथ हंसी ठिठोली करता है। सूरदास के पद तो जैसे श्री कृष्ण भक्ति के पर्याय ही हो गए हैं। नेत्रहीन सूरदास ने श्री कृष्ण की लीलाएं ऐसी रच दीं कि श्री कृष्ण के साथ सूरदास का नाम सदा के लिए जुड़ गया। श्री कृष्ण के बचपन का वर्णन जब सूरदास करते हैं, तो लोग जैसे वहीं पहुँच जाते हैं

जैसे जब भगवान को पालने में झुलाने को लेकर सूरदास लिखते हैं:

हरि पालनैं झुलावै

जसोदा हरि पालनैं झुलावै।

हलरावै दुलरावै मल्हावै जोइ सोइ कछु गावै॥

मेरे लाल को आउ निंदरिया काहें न आनि सुवावै।

तू काहै नहिं बेगहिं आवै तोकौं कान्ह बुलावै॥

कबहुं पलक हरि मूंदि लेत हैं कबहुं अधर फरकावैं।

सोवत जानि मौन ह्वै कै रहि करि करि सैन बतावै॥

इहि अंतर अकुलाइ उठे हरि जसुमति मधुरैं गावै।

जो सुख सूर अमर मुनि दुरलभ सो नंद भामिनि पावै॥

और यह पढ़िए जब इस सृष्टि के कर्ताधर्ता प्रभु श्री कृष्ण अपनी चोटी न बढ़ने को लेकर प्रश्न कर रहे हैं:

कबहुं बढ़ैगी चोटी

मैया कबहुं बढ़ैगी चोटी।

किती बेर मोहि दूध पियत भइ यह अजहूं है छोटी॥

तू जो कहति बल की बेनी ज्यों ह्वै है लांबी मोटी।

काढ़त गुहत न्हवावत जैहै नागिन-सी भुई लोटी॥

काचो दूध पियावति पचि पचि देति न माखन रोटी।

सूरदास त्रिभुवन मनमोहन हरि हलधर की जोटी॥

सूरदास ने प्रभु श्री कृष्ण का बचपन ऐसे रच दिया है कि भक्त बस खो जाते हैं, भक्तों के सम्मुख उनके प्रभु का बचपन आ जाता है। द्वापर युग में पाठक का मन बरबस पहुँच जाता है और वह भी दो भाइयों की नोंक झोंक के बीच जब सूरदास लिखते हैं कि

दाऊ बहुत खिझायो

मैया मोहिं दाऊ बहुत खिझायो।

मो सों कहत मोल को लीन्हों तू जसुमति कब जायो॥

कहा करौं इहि रिस के मारें खेलन हौं नहिं जात।

पुनि पुनि कहत कौन है माता को है तेरो तात॥

गोरे नंद जसोदा गोरी तू कत स्यामल गात।

चुटकी दै दै ग्वाल नचावत हंसत सबै मुसुकात॥

तू मोहीं को मारन सीखी दाउहिं कबहुं न खीझै।

मोहन मुख रिस की ये बातैं जसुमति सुनि सुनि रीझै॥

सुनहु कान बलभद्र चबाई जनमत ही को धूत।

सूर स्याम मोहिं गोधन की सौं हौं माता तू पूत॥

सूरदास जहाँ प्रभु के प्रति वात्सल्य भाव से भरते हैं तो वहीं मीराबाई आकर प्रभु को ऐसे रूप में पाठकों के सम्मुख प्रस्तुत करती हैं, जहाँ पर मात्र भक्ति है, और भक्ति के अतिरिक्त और कुछ नहीं हैं। वह भक्ति में डूबी हुई हैं, वह स्वयं को दासी बना चुकी हैं। वह भगवान को ही अपना पति मान चुकी हैं और उनके लिए सब कुछ छोड़ने के लिए तैयार हैं, बस किसी प्रकार उनके प्रभु मिल जाएं!

वह गाती हैं

पग घूँघरू बाँध मीरा नाची रे।

मैं तो मेरे नारायण की आपहि हो गई दासी रे।

लोग कहै मीरा भई बावरी न्यात कहै कुलनासी रे॥

विष का प्याला राणाजी भेज्या पीवत मीरा हाँसी रे।

‘मीरा’ के प्रभु गिरिधर नागर सहज मिले अविनासी रे॥

परन्तु दुर्भाग्य यह है कि उनका यह निश्छल भक्ति का भजन आज बॉलीवुड की अश्लीलता की भेंट चढ़ चुका है और मेरी तरह लाखों करोड़ों हिन्दुओं ने बचपन में वह भजन गाने का पाप किया था। यही सांस्कृतिक जीनोसाइड है।

जहाँ हमारे आराध्यों से सम्बंधित पहचान को ही छीनकर विकृत कर दिया जाता है। जैसे कृष्ण एवं राधा के साथ हुआ। और अब कृष्ण एवं मीरा के साथ किया जाने का षड्यंत्र रचा जा रहा है।

उन्हें क्या पता होगा कि आगे जाकर उनके भजनों के साथ ऐसा षड्यंत्र होगा, वह तो भक्ति में ही गा रही हैं और कह रही हैं कि

पायो जी म्हें तो राम रतन धन पायो।

वस्तु अमोलक दी म्हारे सतगुरू, किरपा कर अपनायो॥

जनम-जनम की पूँजी पाई, जग में सभी खोवायो।

खरच न खूटै चोर न लूटै, दिन-दिन बढ़त सवायो॥

सत की नाँव खेवटिया सतगुरू, भवसागर तर आयो।

‘मीरा’ के प्रभु गिरिधर नागर, हरख-हरख जस पायो॥

न जाने कितने संत आए और न जाने कितने लिखते गए, उन्हें भज भज कर स्वयं अमर होते गए। वह भजन इस देश की चेतना में बस गए। और चेतना में बसकर न जाने कितने जन्मों की यात्रा के बाद भी वह गाए जा रहे हैं।

परन्तु दुःख की बात यह है कि विष्णु के अवतार को प्रभु श्री कृष्ण को भी वामपंथी लेखकों ने अपनी कुंठा में लपेट लिया और उन्हें लेकर विकृत कविताएँ लिखी जाने लगीं, जिनमें कभी द्रौपदी और कृष्ण के बीच सम्बन्धों की कविताएँ होने लगीं तो कभी राधा एवं कृष्ण में दैहिक सम्बन्ध दिखाए जाने लगे। जैसे बुढ़ापे में हिन्दू धर्म त्यागने वाली कमला दास की यह कविता:

इस्लाम अपनाने के बद कमलादास अर्थात सुरैया

कीड़े

सूर्यास्त की बेला, नदी किनारे, कृष्ण ने

उससे अंतिम बार प्रेम किया और चले गए

उस रात अपने पति की बाहों में राधा

इतनी निस्पंद थी कि उसके पति ने पूछा क्या बात है?

तुम्हें मेरे चुम्बन बुरे लग रहे हैं, प्रिये ? और उसने कहा

नहीं, बिलकुल नहीं, पर सोचा, मृत देह को

क्या फर्क पड़ता है अगर कीड़े मुंह मारे तो !    

वामपंथी कुंठा मात्र साहित्य तक ही सीमित नहीं रही है बल्कि वह हिन्दी फिल्मों एवं धारावाहिकों तक आई है। जो विष्णु के अवतार हैं, जिनके भीतर इस सृष्टि को नष्ट करने की शक्ति है, जिन्होंने गीता जैसा ज्ञान दिया, उन्हें मात्र रासलीला तक सीमित कर दिया गया। यह सांस्कृतिक पतन था और जो लगातार चल रहा है। परन्तु आज जब पूरा देश श्री कृष्ण जन्माष्टमी मना रहा है तब यही संयोग है कि हिन्दू विरोधी बॉलीवुड की फ़िल्में फ्लॉप हो रही हैं एवं भगवान श्री कृष्ण पर बनी फिल्म दक्षिण भारत की फिल्म कार्तिकेय 2 सुपरहिट हो रही है!

यही श्री कृष्ण की शक्ति है, यही धर्म की शक्ति है, जो वह अनेक उदाहरणों से बार बार प्रदर्शित करते हैं, परन्तु हिन्दू घृणा से भरे प्रगतिशीलों का वर्ग उसे देख नहीं पाता है! भक्ति के कारण सूरदास एवं मीराबाई चेतना में बसे हुए हैं, क्योंकि तर्क से परे होती है भक्ति, उन्होंने यह समझा और समझाया, तभी वह जन जन के हृदय में है!

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