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Saturday, August 20, 2022

गुजरात दंगे – 20 वर्षो के बाद अंततः प्रधानमंत्री मोदी को मिला न्याय, वामपंथी और इस्लामिक इकोसिस्टम का षड़यंत्र हुआ ध्वस्त

उच्चतम न्यायालय ने 2002 के गुजरात दंगा विषय में तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी और 63 अन्य लोगों को विशेष जांच दल (एसआईटी) द्वारा क्लीन चिट दिए जाने को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज कर दिया। इसी के साथ इस हिंसा के लिए तत्कालीन गुजरात पर दोषारोपण करने के दो दशक लम्बे षड्यंत्र का भी पटाक्षेप हो गया है। यह याचिका गुजरात दंगों में मारे गए कांग्रेस सांसद एहसान जाफरी की पत्नी जकिया जाफरी ने दायर की थी। याचिका में शीर्ष अदालत की तरफ से नियुक्त विशेष जांच दल की ओर से 2002 के गुजरात दंगा मामले में मोदी और 63 अन्य अन्य लोगों को क्लीन चिट दिए जाने को चुनौती दी गई थी।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में क्या कहा?

न्यायमूर्ति दिनेश माहेश्वरी, न्यायमूर्ति सी. टी. रविकुमार, और न्यायमूर्ति ए. एम. खानविलकर की पीठ ने मामले को दोबारा शुरू करने के सभी रास्ते बंद कर दिए हैं। पीठ ने कहा कि जांच के दौरान एकत्रित की गई सामग्री और साक्ष्यों से मुसलमानों के विरुद्ध सामूहिक हिंसा भड़काने के लिए सर्वोच्च स्तर पर आपराधिक षड्यंत्र रचने संबंधी कोई संदेह उत्पन्न नहीं होता है। पीठ ने कहा कि जकिया जाफरी की याचिका सुनवाई के योग्य नहीं है, और किसी गुप्त उद्देश्य के लिए मामले को जारी रखा गया है, ऐसे लोगो को कटघरे में खड़ा कर उन पर कानूनी कार्यवाही करनी चाहिए, जो कानून का ऐसे दुरूपयोग करते हैं।

न्यायालय ने 2002 गुजरात दंगा मामले में एसआईटी द्वारा पूर्व में नरेंद्र मोदी को दी गई क्‍लीन चिट को यथास्तिति रखा है। न्यायलय ने एसआईटी कि कार्यशैली कि भूरी भूरी प्रशसा की और कहा कि राज्य प्रशासन के कुछ अधिकारियों की लापरवाही का मतलब यह नहीं कि यह राज्य प्रशासन का षड़यंत्र था। न्यायलय ने मोदी और अन्‍य अधिकारीयों को फंसाने के लिए झूठी गवाही देने वाले आईपीएस अधिकारियों- आरबी श्रीकुमार और संजीव भट्ट को भी जमकर फटकार लगाई, और यह कहा कि उन लोगो ने मिथ्या प्रचार किया कि वह उस गोष्ठी में थे जहाँ कथित रूप से नरेंद्र मोदी ने हिंसा फ़ैलाने के आदेश दिए।

न्यायालय ने कड़े शब्दों में कहा कि “हमें ऐसा लगता है कि गुजरात सरकार के असंतुष्ट अधिकारियों के साथ-साथ अन्य लोगों का एक साझा प्रयास इस तरह के खुलासे करके सनसनी पैदा करना था, जबकि उनकी जानकारी झूठ पर आधारित थी।” न्यायालय ने अपना निर्णय 452 पन्‍नों में सुनाया, और एक तरह से इतने वर्षो से चले आ रहे वामपंथी और इस्लामिक तत्वों के मिथ्या प्रचार को नष्ट कर दिया है। इन तत्वों का एक ही लक्ष्य था, येन केन प्रकारेण नरेंद्र मोदी और अन्य को लक्षित हिंसा का दोषी ठहराया जाए और दुनिया भर में हिन्दुओ कि छवि को नुकसान पहुंचाया जाए।

क्या था यह मामला?

कांग्रेस के पूर्व सांसद एहसान जाफरी (जकिया जाफरी के शौहर) 28 फरवरी, 2002 को अहमदाबाद की गुलबर्ग सोसाइटी में मारे गए 68 लोगों में सम्मिलित थे। एक दिन पहले गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस के एक डिब्बे में आग लगा दी गई थी, जिसमें 59 हिन्दू मारे गए थे। इसके बाद गुजरात में बड़े पैमाने पर दंगे भड़क गए थे, जिनमे 1,044 लोग मारे गए थे, जिसमें से अधिकतर मुसलमान थे। केंद्र सरकार ने मई 2005 में राज्यसभा को बताया कि गोधरा कांड के बाद के दंगों में 254 हिंदू और 790 मुस्लिम मारे गए थे।

ऐसा बताया गया था कि एहसान जाफरी ने दंगाइयों पर गोली चलाई, जिससे स्थिति बिगड़ गयी और उन पर हमला कर दिया गया। वामपंथी और इस्लामिक पत्रकारों ने यह बताया कि एहसान जाफरी ने सरकार से सहायता मांगी, लेकिन सरकार ने उनका साथ नहीं दिया। हालाँकि ऐसे कोई साक्ष्य न्यायालय को नहीं दिए गए , और यह तत्कालीन सरकार को मुस्लिम विरोधी बताने के लिए एक कदम था।

‘वामपंथी और इस्लामिक इकोसिस्टम’ को लगा बहुत बड़ा झटका

उच्चतम न्यायालय के निर्णय बाद भाजपा के नेता रविशंकर प्रसाद ने कहा कि दरअसल नरेंद्र मोदी के विरुद्ध दुष्प्रचार किया गया और उस काम में वामपंथी, लिबरल और कांग्रेस सब सम्मिलित थे। आप खुद समझ कांग्रेस के मानसिक दिवालियेपन को समझ सकते हैं जिस कमेटी का गठन उन्होंने किया था उसकी जांच रिपोर्ट पर उन्हें भरोसा नहीं हुआ, देश के उच्चतम न्यायालय पर उन्हें भरोसा नहीं हुआ।

यह स्पष्ट हो रहा है कि कांग्रेस, वामपंथी-इस्लामिक इकोसिस्टम के अतिरिक्त सरकारी कर्मचारी जैसे संजीव भट्ट, एनजीओ चलाने वाली तीस्ता सीतलवाड़ और कथित पत्रकार और लेखक राणा अय्यूब, मीडिया चैनल्स, राजदीप सरदेसाई और बरखा दत्त जैसे पत्रकार, कारवां और ऑल्ट न्यूज़ जैसे पोर्टल ने मिलकर एक छद्म प्रचार चलाया, और झूठी कहानियां गढ़ कर प्रधानमंत्री मोदी की छवि पर दाग लगाने का कुत्सित प्रयास किया। उच्चतम न्यायालय के निर्णय से इस इकोसिस्टम को बहुत बड़ा झटका लगा है, और संभव है इन सब पर विधिक कार्यवाही जल्दी ही होगी।

कुछ मिथ्याप्रचार जो बाद में झूठ निकले

वामपंथी और इस्लामिक इकोसिस्टम ने कुछ अत्यंत ही झूठे प्रचार किये, जिससे हिन्दुओ को दोषी साबित किया जाए, और तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद मोदी पर आरोप लगाया जाए । लेकिन सौभाग्य की बात है यह सारे प्रचार झूठे निकले

  • साबरमती एक्सप्रेस में एक स्टोव फटने से आग लगी थी, और इसमें मुसलमानो का कोई दोष नहीं था।
  • ट्रैन में एक शार्ट सर्किट होने से आग लगी
  • अयोध्या से वापस आ रहे कारसेवकों ने एक मुस्लिम लड़की के साथ अभद्रता की, जिसके बाद हिन्दू मुसलमानों के बीच हिंसा हुई और ट्रैन में आग लगाई गयी।
  • गर्भवती कौसर बानो की हत्या हिन्दुओं ने की, उससे पहले उसका पेट काट कर बच्चा बाहर निकाल लिया था।
  • पुलिस अधिकारी संजीव भट्ट ने कहा था कि मुख्यमंत्री मोदी ने स्वयं दंगे भड़काने के आदेश दिए थे।

हालांकि साक्ष्यों की जांच के बाद यह सभी आरोप झूठे निकले, और न्यायालय ने अपने निर्णय में भी इन सभी मिथ्याप्रचार के बारे में कहा है, और इन सभी पर कड़ी कार्यवाही करने का निर्देश दिया है।

तीस्ता सीतलवाड़ और पूर्व आईपीएस आरबी श्रीकुमार गिरफ्तार

मुंबई में कथित मानवाधिकार कार्यकर्ता तीस्ता सीतलवाड़ को गुजरात क्राइम ब्रांच ने गिरफ्तार कर लिया है। सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के बाद एटीएस ने तीस्ता सीतलवाड़ को हिरासत में लिया था और फिर बाद में गिरफ्तार कर लिया गया। तीस्ता के अलावा पूर्व आईपीएस आरबी श्रीकुमार भी गिफ्तार हुए हैं। मुंबई के सांताक्रूज थाने में तीस्ता सीतलवाड़ को रखा गया है।

उच्चतम न्यायालय ने सीतलवाड़ की और जांच की आवश्यकता बताई थी। कल सुप्रीम कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में कहा था कि गुजरात मुख्यमंत्री के विरुद्ध छद्म प्रचार करने वालो पर भी न्यायायिक कार्यवाही होनी चाहिए।

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