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Thursday, December 1, 2022

दिल्ली में पुजारियों की दुर्दशा: कहाँ है समान मानवाधिकार? डॉक्यूमेंट्री में दिखाई गयी पीड़ा

भारत में कहने के लिए समानता की बातें की जाती हैं, परन्तु क्या वास्तव में समानता का सिद्धांत लागू है? यह प्रश्न इसलिए उभर कर आया क्योंकि जहां मस्जिदों के मौलानाओं आदि को सरकार से वेतन मिलता है तो वहीं हिन्दू पुजारियों के लिए ऐसी व्यवस्था नहीं दिखाई देती है। हाल ही में दिल्ली में पुजारियों ने यह बोर्ड भी लगाया था कि मंदिरों के पुजारियों को भी वेतन दिया जाए एवं जब तक मांग पूरी नहीं होती है, तब तक मंदिरों में आम आदमी पार्टी के नेताओं का प्रवेश प्रतिबंधित है।

प्रश्न यही उठता है कि आखिर हिन्दुओं के मंदिरों एवं पुजारियों के साथ इस प्रकार सौतेला व्यवहार क्यों किया जा रहा है और किसलिए होता है? आखिर इस वर्ग से किसी को इतनी घृणा या चिढ कैसे हो सकती है? परन्तु यह भी बात सत्य है कि यह घृणा है, यह चिढ है!

पिछले दिनों दिल्ली में इक्वल राइट्स फॉर हिंदूज़ नामक संस्था ने एक कार्यक्रम का आयोजन किया था। और इसमें उन्होंने “दिल्ली में हिन्दू पुजारियों की दुर्दशा” नामक डॉक्यूमेंट्री दिखाई थी। इस में सविस्तार बताया गया था कि कैसे अंग्रेजों ने हिन्दू पुजारियों के प्रति विषवमन किया और उन पर बौद्धिक प्रहार किए। इस फिल्म में दिखाया गया कि कैसे स्वतंत्रता के उपरान्त भी यह वर्ग प्रताड़ित रहा।

कैसे अकादमिक जगत में ब्राह्मणों को खलनायक बनाकर प्रस्तुत किया जाता रहा है और जाता रहेगा और यही विमर्श बनाया गया कि भारत में बाहरी शक्तियाँ इसीलिए सफल होती रहीं, क्योंकि ब्राह्मण वर्ग ने शेष वर्ग का सबसे अधिक शोषण किया।

इस फिल्म को इस लिंक पर देखा जा सकता है

सबसे अधिक दुर्भाग्य की बात यही है कि केवल साहित्य ही नहीं बल्कि मनोरंजन के हर माध्यम ने ब्राह्मणों को ही जैसे निशाने पर लिया। ब्राह्मणवाद, पुरोहितवाद जैसे शब्द गढ़कर विषैली मानसिकता का प्रचार इस वर्ग के विरुद्ध किया गया। साहित्य तो जैसे ब्राह्मणवाद के विरुद्ध लिखना एवं ब्राह्मणों को कोसना ही हो गया था। तमाम कविताएँ लिखी गईं और तमाम ऐसे विमर्श बनाए गए जो अंग्रेजों द्वारा फैलाए गए उसी हिन्दू विरोधी विमर्श का विस्तार थे, जिसकी जड़ों में हिन्दुओं को गुलाम बनाकर रखना था।

ब्राह्मणों को ऐसा वर्ग बना दिया, जो दरअसल समस्त समस्याओं का कारण था। एकदम से मूल निवासियों की अवधारणा को विकसित किया जाने लगा।  धार्मिक ग्रंथों की व्याख्याएं विमर्श में इस प्रकार की गईं कि उनमें मंदिरों को शोषण का अड्डा बनाकर प्रस्तुत कर दिया गया।

जो मंदिर ज्ञान, संस्कृति एवं सभ्यता का केंद्र हुआ करते थे, उन्हें अंग्रेजों के लाए हुए विमर्श के अनुसार ऐसा केंद्र बना दिया जिसमें शोषण ही शोषण था और शोषण करने वाला कौन था? अमीर ब्राह्मण! ब्राह्मण वर्ग, जिन्होनें मुगलों के आक्रमण के समय मंदिरों की रक्षा करते हुए अपने प्राणों का बलिदान करने में भी हिचक नहीं दिखाई थी, उस पूरे के पूरे वर्ग को इतिहास के सबसे बड़े खलनायक के रूप में परिवर्तित कर दिया गया कि उसे अवसरों पर भी भुगतान करने पर लोगों को समस्या होने लगी।

यह माना जाने लगा कि पंडितों को उनकी सेवा के लिए क्या भुगतान करना? मंदिरों में चढ़ावा उनकी जेब में तो जा रहा है आदि आदि? परन्तु क्या यही सत्य है? पंडितों को लेकर तमाम तरह के चुटकुले बनाए गए, संस्कृत बोलने वाले पंडित जी की छवि को ऐसा विकृत कर दिया गया कि आम जन को उनकी पीड़ा का अहसास ही होना बंद हो गया।

साधुओं की हत्याओं पर चुप्पी साध ली जाती रही। पालघर में साधुओं को घेरकर मार डाला गया, और लोगों ने प्रतिक्रिया भी देनी उचित नहीं समझी। जैसे चेतना को सुप्त कर दिया गया। हिन्दुओं के प्रति घृणा का यह चरम था कि आप एक वर्ग के प्रति विमर्श को इतना विषैला कर दें कि उनके साथ हुई हिंसा भी आम जन को मामूली, साधारण बात लगे।

पालघर में मारे गए साधु

जब पंडितों को शोषण करने वाला विमर्श चलन में आ गया तो कश्मीरी पंडितों की पीड़ा भी जैसे चेतना से विलुप्त होती गई। यह धारणा ही मन में बैठ गयी कि पंडित तो होते ही हैं, ऐसे कि उनके साथ कुछ भी कर दिया जाए!

इस डॉक्यूमेंट्री में इस वर्ग की पीड़ा को इतने विस्तार से दिखाया है कि बारम्बार आँखें ही भर जाती हैं। यह प्रश्न उठता ही है कि क्या सरकार का यह कर्तव्य नहीं है कि वह इस विशाल वर्ग की देखभाल करती जो हमारी प्राचीन सभ्यता को अपने आचरण, अपने विचारों में सहेजे हुए हैं।

दिल्ली के कांस्टीट्यूशनल क्लब में दिनांक 11 नवम्बर 2022 को आयोजित इस कार्यक्रम में कई गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे। एम नागेश्वर राव नी इस आयोजन में वह आंकड़े प्रस्तुत किए जो लोगों की आँखें खोलने के लिए पर्याप्त थे। उन्होंने हिन्दू छात्रों एवं अल्पसंख्यक छात्रों को दी जाने वाली छात्रवृत्तियों पर भी बात की, उन्होंने तमाम तरह की उन असमानताओं पर भी बात की, जो सरकारी तौर पर हिन्दू छात्रों के साथ हो रही है।

इस आयोजन में स्वामी विज्ञानानन्द जी ने समाज के स्तर पर भी उन विडम्बनाओं पर बात की, जो वास्तव में इन दिनों हिन्दू समाज को घेरे हुए हैं। उन्होंने अपने साथ घटा एक अनुभव साझा करते हुए कहा कि ह्यूस्टन में एक हिन्दू कांफ्रेंस था। उन्होंने कहा कि आजकल ब्राह्मणों को गाली देना फैशन है। उन्होंने कहा जो लोग समाज और पूजा पाठ में शुद्धता की चिंता करते हैं, वही लोग अपने बच्चों को इस क्षेत्र में नहीं भेजना चाहते हैं।

उन्होंने उस समय वहां पर कहा था कि एक अच्छा पुजारी बनने के लिए बारह वर्षों तक पढ़ना होता है, उसकी बारह वर्षों की निरंतर साधना होती है और चार साल की इंजीनियरिंग के बाद लाखों का पॅकेज लेने वाले बारह वर्षों के प्रशिक्षण वाले पुजारी को कितना पैसा देते हैं। उन्होंने कहा कि उस समय एक हजार डॉलर देते थे।

इस आयोजन में उस विकृत विमर्श के परिणाम को दिखाया गया जो अंग्रेजों ने आरम्भ किया और उसे लगातार वामपंथियों ने अकादमिक जगत और साहित्य में जीवित रखा तो वहीं सरकार ने अपने राजनीतिक फायदों के लिए राजनीति में!

और इससे खंडित कौन हुआ? विखंडन किसका हुआ? किसका विमर्श विकृत हुआ? किसकी हानि हुई? स्पष्ट है कि हिन्दू धर्म की!

यह फिल्म इसलिए देखी जानी आवश्यक है जिससे आम भारतीयों को यह भान हो सके कि कितना अन्याय दरअसल हो रहा है! वह भी उनके साथ जो सदियों का संचित ज्ञान अपनी चेतना में सहेजे हुए हैं!

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