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Friday, September 30, 2022

डिंगल कवयित्री पद्मा की कहानी! क्यों सामने नहीं आती हिन्दू कवयित्रियों की कहानियाँ?

हमने मध्यकाल की कथित मुस्लिम कवयित्रियों की कहानियां सुनीं, कि कैसे वह कृष्ण की दीवानी थीं, कैसे उन्होंने इश्क और मुहब्बत की शायरी की! परन्तु हिन्दू स्त्रियों की चेतना को सुप्त दिखाने के लिए तमाम जतन किये, उन्होंने सब कुछ छिपा ही दिया, और हिन्दू स्त्रियों पर दोहरी मार पड़ी कि एक तो उन्हें वामपंथियों ने इतिहास में स्थान नहीं दिया और वामपंथी औरतों की नजर में प्रशंसा पाने के लिए कथित राष्ट्रवादी लेखकों ने तो बिलकुल भी उन पर ध्यान नहीं दिया!

आज कहानी ऐसी चारणियों की जिन्होनें युद्ध (आत्मगौरव) के लिए लिखा,

पद्मा चारणी का जन्म सन 1597 के लगभग माना जाता है। यह चारण माला जी साहू की पुत्री थी एवं बारहट शंकर के साथ उनकी सगाई हुई थी। कुछ कारण से विवाह नहीं हो पाया था परन्तु पद्मा के जीवन में बारहट शंकर का ही नाम रहा। जब बीकानेर के राजकुमार अमर सिंह के कानों में उनकी प्रतिभा एवं सगाई वाली बात पड़ी तो चूंकि राजपूत का चारण की बेटी के साथ बहन का सम्बन्ध होता है तो वह अपने साथ ले आए थे!

लोगों ने चारणों का नाम इसलिए बदनाम कर दिया क्योंकि यदि चारणों का नाम गौरव से भरा रहता तो वह कभी भी अपने झूठ नहीं फैला पाते, जबकि चारण एवं चारणी जहाँ रहते थे, वहां के इतिहास, घटनाओं आदि की व्याख्या करते हुए रचनाएँ करते थे! यह हो सकता है कि कुछ अतिश्योक्ति हो, परन्तु उनके लिखे को और प्रतिभा को नकारा नहीं जा सकता था, फिर भी वामपंथियों और मिशनरी हिन्दी साहित्य ने उन्हें नकारा!

वह गर्व एवं भव्यता का निर्माण करते हुए रचना करते थे, अत: वामपंथी लेखकों को यह सहन नहीं हुआ कि उनके एजेंडा लेखन के आगे कोई हिन्दू भव्यता एवं वीरता की बातें करे! यही कारण है कि पद्मा के नाम को उपेक्षित छोड़ दिया गया है!

जानते है पद्मा की कहानी क्या थी?

बीकानेर नरेश अमर सिंह और अकबर की तनातनी चल रही थी। यह तो तय था कि अकबर की विशाल सेना के सामने यह कहाँ टिकेंगे, मगर पराजय स्वीकारने के लिए तैयार न थे। बीकानेर राज्य में स्त्रियों के अंत:पुर में जीविका निर्वाह के लिए एक चारणी रहा करती थी। पद्मा, जिन्हें माँ शारदा का वरदान प्राप्त था। त्वरित रचना ही पद्मा का कार्य था। वह वहां की स्त्रियों के मध्य जो परस्पर हास्य विनोद वाली प्रतिस्पर्धाएं होती थीं, उन्हें अपने सुर में सजा देती थी। डिंगल में कविता और गीत लिखा करती थीं।

अकबर की विशाल सेना के सामने बीकानेर जैसे एक परिणाम की ओर बढ़ रहा था। सब कुछ जैसे उसी दिन नियत हो गया था जिस दिन अमर सिंह ने अकबर के विरुद्ध तलवार उठाई थी। आत्माभिमान को जिस दिन दासता से ऊपर माना था, उसी दिन उनका और उनके महल की स्त्रियों का भाग्य तय हो गया था। जिस प्रकार मुगलों की सेना स्त्रियों पर अत्याचार करती थी और स्त्रियों को उठा ले जाती थी, उसके कारण ही स्वयं को अग्नि के हवाले कर देती थीं।

फिर एक दिन वह दिन आया ही जब मुग़ल सेना ने बीकानेर को घेर लिया। उस समय अमर सिंह गहरी निद्रा में थे।

अमर सिंह को कैसे जगाया जाए, क्योंकि उन्हें सोते से जगाना जैसे सिंह को छेड़ने के समान होता था। ऐसे में पद्मा ने यह उत्तरदायित्व स्वयं पर लिया और गाना आरंभ किया

जाग जाग कल्याण जाया

डिंगल काव्य में इस गीत की मात्र एक ही पंक्ति प्राप्त है। हाँ भाई, क्यों उन स्त्रियों का गीत या स्वर अभिलेखों में सम्मिलित करना, जो आपके एजेंडे के अनुसार नहीं थीं। वह चारणी थी, परन्तु गीत संगीत से भरपूर!

उसके गीत से राजा की निद्रा टूटी और निर्णय कर वह निकल पड़े, और जैसा उन्हें भी उम्मीद थी वह शत्रु सेना का पर्याप्त संहार कर स्वयं भी उस लोक को गए।

राजा की रानियों एवं उन पर आश्रित स्त्रियों ने आत्मदाह कर जीवन लीला समाप्त की!

पद्मा ने उन सतियों की वीरता पर भी कई दोहे कहे थे, परन्तु अब वह प्राप्त नहीं होते हैं। परन्तु राठौड़ों के प्रशस्ति गीतों के एक संग्रह में एक गीत इस आशय का अवश्य मिलता है, जो इसकी सत्यता का प्रमाण देता है-

गगने गाज आवाज़ रणतूर पारवर गरर

सालू लै सिन्धु ओ राग साथै

दुरित धनराज रो बैर जल डोलतो,

झलकियों मूंगली फ़ौज माथे,

धी खे, कमंघ खगवार और धूलिये

*********************

सारवल सामुर्ही हंस पावासारी,

झौलियो नारियण लोहू जाझे

सती पुहपा अने अछर अग्न सिवा रणै

जाह नह नाम संसार जमी यो

हरि सहर को चले हंस अविहड़ हरो

कवध नारायणी सरोग क्रमियो

अर्थात आकाश में रणतूर का कठोर गर्जन गूँज रहा है। सिन्धु का भयानक स्वर लेकर सेना झुकी आ रही है, वीर राजा के वैर रूपी जल को मथता हुआ मुग़ल सेना का अग्रणी आगे बढ़ रहा है। उसकी तलवार की धार राजा के धड पर पड़ती है और उसे उड़ा देती है। राजा अपनी रक्षा का  भरसक प्रयास करता है। पाबासर में इस प्रकार खड्ग युद्ध चल रहा है। राजा वीरतापूर्वक लड़ने के बाद नाड़ियों से निकले हुए रक्त से नहाया पड़ा है। सती पुष्पा तथा दूसरी अप्सरावत रूपवती स्त्रियाँ उसके सम्मुख आती हैं। हरि की नगरी से आये हुए विमान पर उसके झूलते हुए प्राण आसीन होते हैं और राठौरराय इस प्रकार स्वर्ग को प्रयाण करते हैं! (मध्यकालीन हिंदी कवयित्रियाँ- सावित्री सिन्हा)

*स्रोत: मध्यकालीन हिंदी कवयित्रियाँ- सावित्री सिन्हा

एक और स्थान पर उनके अमर सिंह की वीरता पर दोहे मिलते हैं:

आरब मारयो अमरसी,बड़ हत्थे वरियाम,

हठ कर खेड़े हांरणी,कमधज आयो काम |

कमर कटे उड़कै कमध, भमर हूएली भार,

आरब हण हौदे अमर, समर बजाई सार ||

इस बात को अपने दिल से निकालना ही होगा, कि स्त्रियों में चेतना नहीं थी या फिर उन्हें लिखना पढ़ना, या कहना नहीं आता था।  वामपंथी जाल से मुक्त होना ही होगा

इस आत्महीनता से मुक्त होना ही होगा कि हिन्दू स्त्रियों का इतिहास ही नहीं था

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