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Friday, September 24, 2021

गौमांस खाना मूल अधिकार नहीं है: इलाहाबाद उच्च न्यायालय

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कल एक बहुत ही महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि गाय भारत की संस्कृति का एक अभिन्न अंग है और उसे राष्ट्रीय पशु घोषित किया जाना चाहिए। उच्च न्यायालय ने यह टिप्पणी एक आरोपी जावेद की जमानत अस्वीकार करते हुए दी, जिस पर उत्तर प्रदेश मने गौ वध रोकथाम अधिनियम के अंतर्गत गौ वध का आरोप है। उच्च न्यायालय ने कहा कि आरोपी जावेद ने यह अपराध पहली बार नहीं किया है और उसकी आदत है बार बार यह अपराध करने की।

उच्च न्यायालय की जस्टिस शेखर कुमार यादव की सिंगल जज की बेंच ने यह निर्णय सुनाते हुए कहा कि केंद्र सरकार को संसद में ऐसा नियम लाना चाहिए जो गाय को मूलभूत अधिकार दें और गाय को नुकसान पहुंचाने वालों को दंड देने के लिए कड़े से कड़े क़ानून बनाए जाएं।

जस्टिस यादव ने यह भी कहा कि गाय की रक्षा किसी एक धर्म की जिम्मेदारी न होकर पूरे समाज की है। उन्होंने यह भी कहा कि केवल गौ मांस खाने वालों के ही मूलभूत अधिकार नहीं होते हैं, बल्कि उनके भी मूलभूत अधिकार हैं, जो गौ को पूजते हैं और जो गाय पर ही आर्थिक रूप से निर्भर हैं और उनके पास भी यह मूलभूत अधिकार है कि वह एक सार्थक जीवन जी सकें।

न्यायालय ने एक और महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि “कई ऐसे उदाहरण हैं कि जब भी हमने अपनी संस्कृति भूली है, तब तब विदेशी आक्रमणकारियों ने हम पर आक्रमण किया है और हमें गुलाम बनाया है। और आज भी अगर हम नहीं जगे तो हमें देखना होगा कि अफगानिस्तान में तालिबान का आक्रमण कैसे हुआ है?”

और न्यायालय के मुख्य अवलोकन थे:

1- जीवन का अधिकार मारे जाने के अधिकार से कहीं ऊपर है और गौ मांस खाना कभी भी मूल अधिकार नहीं माना जा सकता है।

2- जब गाय बूढ़ी और बीमार हो जाती हैं, तब भी उनका गोबर और मूत्र कृषि, दवाइयों के निर्माण में काम आता है और सबसे बढ़कर जो लोग गाय को माता मानते हैं, वह माता को वृद्ध होने पर फेंकते नहीं हैं। और किसी को भी उसे मारने का अधिकार नहीं है।

3- ऐसा नहीं है कि हिन्दुओं को ही गाय की महत्ता समझ में आती है। मुस्लिमों ने भी गाय को भारतीय संस्कृति का हिस्सा माना था और 5 मुस्लिम शासकों ने उस पर प्रतिबन्ध लगाया था।

4- समय समय पर कई उच्च न्यायालयों और साथ ही देश के सर्वोच्च न्यायालय ने गाय की महत्ता को संज्ञान में रखते हुए, कई निर्णय दिए हैं, जिनमें गाय की रक्षा तो मुख्य थी ही, मगर देश के नागरिकों के विश्वास को भी ध्यान में रखते हुए निर्णय दिए थे।

5- कई ऐसे उदाहरण हैं, जिनमें गाय गौशाला में भूख और बीमारी से मर जाती हैं, उन्हें गन्दगी में रखा जाता है। और खाने के अभाव में गाय पोलीथीन खाती हैं, और खाकर बीमार होकर मर जाती हैं।

6- किसी के जीवन का अधिकार केवल इसलिए नहीं छीना जा सकता है क्योंकि कोई उसे खाना चाहता है और जीवन का अधिकार हमेशा मारने के अधिकार से अधिक होता है।

इन सभी टिप्पणियों के साथ न्यायालय ने आरोपी जावेद को जमानत नहीं दी और कहा कि यदि आरोपी को जमानत दी जाती है तो वह फिर से वही अपराध करेगा और समाज के सौहार्द को बिगाड़ेगा।

इस निर्णय के आते ही सोशल मीडिया पर इसके विषय में चर्चाएँ आरम्भ हो गईं, और स्पष्ट है कि कथित सेक्युलर लोग एक तरफ आ गए और इस निर्णय की आलोचना करने लगे। वरिष्ठ पत्रकार पुष्पेश पन्त ने ट्वीट करते हुए लिखा कि

“जब उच्च न्यायालय का जज यह लिखे कि गाय एकमात्र प्राणी है जो ऑक्सीजन छोडती है तो क्या उस पर प्रश्न उठाना न्यायालय की अवहेलना में आएगा?”

इसी के साथ एक यूजर ने लिखा

एक यूजर ने लिखा कि अल्पसंख्यकों को अधिकार नहीं मिलते और गाय को अधिकार मिलें:

मगर वहीं पी मुरलीधर राव ने इस निर्णय का स्वागत करते हुए कहा

जहां एक ओर वामपंथी इस निर्णय का विरोध कर रहे हैं और आलोचना कर रहे हैं, वहीं भाजपा और हिंदूवादी संगठनों ने इस निर्णय का स्वागत किया है। और यह भी नहीं भूलना चाहिए कि भारत का प्रथम संगठित स्वतंत्रता संग्राम गाय के प्रति हिन्दुओं के प्रेम के कारण ही हुआ था और अंग्रेजों के मन में यह भय व्याप्त हुआ था कि उन्हें यह देश छोड़ना पड़ सकता है।

मंगल पाण्डेय ने गौ माता की चर्बी से बने हुए कारतूस मुंह से खोलने से इंकार कर दिया था। और गाय की चर्बी से बने कारतूस के कारण हिन्दू वर्ग बहुत ही क्रोधित था। गाय हिन्दुओं के लिए उनके कृष्ण से सम्बन्धित है, जिसके साथ वह बैठकर बांसुरी बजाते थे। यह भी याद रखा जाए कि गौ आधारित अर्थव्यवस्था जब तक देश की थी, तब तक भारत सोने की चिड़िया बना रहा था।

वहीं यह भी याद रखना चाहिए कि हिन्दू साधु-संतों ने गौ रक्षा के लिए आत्म बलिदान तक किए हैं और वर्ष 1966 में इंदिरा गांधी द्वारा निशस्त्र साधुओं पर, जो मात्र गौ वध पर प्रतिबन्ध की मांग रख रहे थे। यह भी सत्य है कि भारत के प्रथम प्रधानमंत्री गौ वध पर प्रतिबन्ध लगाने के लिए किसी भी कदम के विरोध में थे। पंडित नेहरू की मृत्यु के उपरान्त वर्ष 1966 में आन्दोलन हुआ और उसमें लाखों लोगों ने भाग लिया था और जिसमें कई साधुओं की जान भी गयी थी क्योंकि इंदिरा गांधी की सरकार ने संसद की ओर आते साधुओं पर गोली चलवा दी थीं।

तब से लेकर अब तक सरकारें बदलीं हैं, परन्तु हिन्दुओं के लिए गौ – रक्षा मूलभूत अधिकार नहीं बन पाया, पर दुर्भाग्य की बात है कि वाम और इस्लाम गठजोड़ वाले नेताओं और बुद्धिजीवियों के कारण गौ-मांस भक्षण अवश्य मूलभूत अधिकार के रूप मेप्रचारित हो गया है। और कथित संवेदनशील साहित्यकार जो दीपावली पर कुत्ते के डरने के कारण फुलझड़ी जलाने पर भी प्रतिबन्ध लगाते हैं, वह गाय को काटकर खाने के लिए प्लेट लिए खड़े रहते हैं।


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