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Wednesday, August 10, 2022

मैं हिन्दू कैसे बना: सीता राम गोयल: अध्याय 2: गांधीवाद से साम्यवाद

उसी दौरान जैन धर्म के स्थानकवासी श्वेतांबर संप्रदाय के साथ भी मेरी संक्षिप्त मुलाकात हुई थी, जिस स्कूल में मैं छात्र था वह भी एक श्वेतांबर जैन विद्यालय था। जिस रिश्तेदार के साथ में रहता था वह भी एक था जैन ही थे। हमारे विद्यालय में दैनिक आधार पर ही धर्म तत्वों को पढ़ाया जाता था, परन्तु जैन समुदाय, जिसे मैंने बहुत करीब से देखा था वह मेरी अभिरुचि के अनुसार बहुत क्षयोन्मुख, आत्म केंद्रित और विषादग्रस्त था। कुछ जैन साधु के व्याख्यान जो मैंने स्थानीय चणक में सुने थे वे काफी संकुचित और सांप्रदायिक थे, जिनका मेरे लिए कोई मतलब नहीं था। जिस चीज़ ने मुझे सबसे ज्यादा नाराज किया वह था श्री कृष्ण का जैन संस्करण/प्रारूप। उन्हें एक छलिया और धोखेबाज के रूप में चित्रित किया गया था। मुझे बताया गया था कि श्रीकृष्ण उन हत्याओं के लिए, जिसमें वे लिप्त थे, पंच नर्क में गए थे और अभी भी वहीं थे। मुझे बुद्ध और बौद्ध धर्म के बारे में भी अपनी समझ के माध्यम से भगवान महावीर और जैन धर्म को समझने से पहले वर्षों तक इंतजार करना पड़ा। मैंने पाया कि दोनों ने ही आत्मा की ऊंचाइयों को छुआ था।

एक मित्र और सहपाठी ने एक दिन मुझे रोमन रोलैंड द्वारा लिखित श्री रामकृष्ण परमहंस और स्वामी विवेकानंद की जीवनी दी। मैं पढ़कर मंत्रमुग्ध हो गया और वेदांत की ओर आकर्षित होने लगा। दिल्ली के पुस्तकालय मैं जहां मैं हमेशा  जाता था, वहां  विवेकानंद और रामकृष्ण की संपूर्ण रचनाएं थीं, प्रत्येक के आठ खंड थे । मैंने उन सभी को पढ़ा लेकिन मुझे उससे कुछ खास फायदा नहीं हुआ।

मेरी गलती यह थी कि मैं यह कल्पना कर रहा था कि वो रहस्यवादी चेतना, जो वेदांत के सत्य को देख सकती थी, वह मानसिक रूप से सर्वश्रेष्ठ, बौद्धिक और व्यवहारिक थी। रामकृष्ण और विवेकानंद दोनों  कुछ वर्षों बाद हमारे महान आध्यात्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं के अवतार के रूप में मुझे समझ में आने वाले थे।

उन दिनों के पांच पैसे मेरे लिए कोई छोटी रकम नहीं थी लेकिन मैंने खुशी-खुशी खुशी उसे नए विधान की एक छोटी प्रतिलिपि खरीदने के लिए खर्च कर दिया, जो एक फुटपाथ पर पुरानी पुस्तकों के विक्रेता के पास मुझे मिली।  तब मुझे पता नहीं था कि मैं अगर ईसाई चर्च या मिशन से संपर्क करता तो उससे बेहतर संस्करण प्राप्त कर सकता था। मैं उस समय कुछ नहीं जानता था। मैंने नई विधान का धर्म सिद्धांत वाला भाग तुरंत पढ़ा। बाकी किताब में मुझे कोई दिलचस्पी नहीं थी। लेकिन क्रॉस पर मसीहा के व्यक्तित्व ने मुझे इतना मोहित किया कि मैंने मसीह की एक तस्वीर खरीदी और इसे महात्मा गांधी, श्री रामकृष्ण स्वामी, विवेकानंद, स्वामी रामतीर्थ के चित्रों के साथ अपने छोटे कक्ष की दीवार पर रख दिया। पहाड़ी पर दिया धर्मोंपदेश अंतर मिश्रित होकर महात्मा गांधी के संदेश के साथ एक हो गया।

इसी दौरान मैं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ आरएसएस के संपर्क में आया। मेरे कुछ सहपाठी इस संगठन के सदस्य थे। इस संगठन के बारे में मैंने अब तक कभी नहीं सुना था। उन्होंने मुझे विजयादशमी के अवसर पर गांधी मैदान में आयोजित एक समारोह में आमंत्रित किया।मैं उनके मशाल जुलूस से बहुत प्रभावित हुआ। लेकिन श्री वसंतराव द्वारा दिए गए भाषण ने मुझे आश्चर्यचकित कर दिया। अपने दिए गए भाषण में उन्होंने अन्य चीजों के अलावा यह भी कहा कि कमजोर होना एक पाप है, एक अपराध है। वेदों ने निर्धारित किया था कि बलिदान में एक शेर का वध किया जाना चाहिए लेकिन एक शेर को कौन पकड़ सकता है इसलिए गरीब बकरी को इसके स्थान पर बलि किया  गया। क्यों? बस इसलिए कि बकरी कमजोर थी। मैं सूरदास के प्रसिद्ध गीत “निर्बल के बल राम” कमजोर की ताकत राम है, गाने में कई बार शामिल हुआ था। यीशु ने हमें बताया था कि विनीत और नम्र व्यक्ति ही पृथ्वी को विरासत में पाएगा।

कमजोर की अवमानना और शक्तिशाली के महिमामंडन ने उस समय मुझे डरा दिया मुझे इतिहास, अतीत और वर्तमान से बहुत कुछ सीखना था, इससे पहले कि मुझे एहसास हो जाता कि श्री वसंतराव एक महान सत्य बता रहे हैं। वास्तव में कमजोर होना पाप और अपराध है। जो धर्म के लिए लड़ सकता है और क्षमा को आचरण में उतार सकता है, सही मायने में वही शक्तिशाली है।

लेकिन जब मेरा नैतिक और बौद्धिक जीवन महात्मा गांधी द्वारा प्रदान किए गए दृढ़ विश्वास के एक नए ब्रम्हांड में बसने की तैयारी कर रहा था, उसी समय मेरा भावनात्मक जीवन एक उथल पुथल की ओर बढ़ रहा था, जिसका मुझे अनुमान भी नहीं था। मैं यह स्पष्ट करना चाहता हूं कि इस उथल-पुथल का प्यार या रोमांस से कोई लेना-देना नहीं था। इस गड़बड़ी के आयाम काफी अलग थे। मुझे संदेह होने लगा, पहले धीरे-धीरे और फिर जोरदार तरीके से, कि बड़े पैमाने पर ब्रह्मांड में और मानव समाज में, जिसमें हम रहते हैं, कोई नीति उपनियम है या नहीं। जिन संतो और विचारकों का मैं अब तक सम्मान करता था  वे निश्चित थे कि दुनिया एक ऐसे भगवान द्वारा बनाई गई और शासित है जो सत्यम (सत्य) शिवम (अच्छाई) सुंदरम (सौंदर्य) था। लेकिन मैंने चारों ओर बहुत कुछ देखा जो असत्य अशुभ और बदसूरत था। ईश्वर और उसकी रचना में सामंजस्य नहीं हो सका।

बुराई की यह समस्या आंशिक रुप से जीवन में मेरी व्यक्तिगत स्थिति के कारण उत्पन्न हुई और मेरे दिमाग को  जकड़ लिया। महात्मा गांधी से सीखी मेरी विनम्रता के बावजूद मेरे मन में आत्मसम्मान की भावना थी। मैं एक अच्छा छात्र था जिसने हर चरण पर विभेदन/पार्थक्य और छात्रवृत्ति जीती थी। मैंने बहुत सी किताबें पढ़ी थी इसलिए मैं बुद्धिमान और  विवेकी था। मैं नैतिक जीवन जीने का प्रयास कर रहा था जो मुझे लगा कि मुझे बाकी लोगों से बेहतर बनाता है।

आत्म सम्मान की कई धाराओं के संगम पर खड़े होकर मुझे विश्वास हो गया था कि मैं एक विशेष व्यक्ति हूं और जिस समाज में मैं रहता था उस पर मुझे कुछ विशेष विशेषाधिकार प्राप्त थे। यह सब हास्य पद लगता होगा लेकिन जो लोग खुद को बहुत गंभीरता से लेते हैं वे शायद ही कभी हास्य की भावना के लिए जाने जाते हैं।

हालांकि मेरी वस्तुनिष्ठ स्थिति व्यक्तिपरक दुनिया के विपरीत थी  जिसमें मैं जीना पसंद करता था। मैं बहुत गरीब था और कठिन जीवन व्यतीत करता था। मेरी शिक्षा की जो भी मान्यता थी वह मेरे शिक्षकों को और कुछ सहपाठियों को छोड़कर किसी को प्रभावित नहीं करती थी। मेरे आस-पास के अधिकांश लोगों ने सोचा कि मैं किताबी कीड़ा और एक सनकी था। आर्य समाज, स्वतंत्रता आंदोलन, और हरिजन उत्थान में मेरी दिलचस्पी ने,  गाँव के लोगों को मेरे परिवार के बुजुर्गों से विमुख कर दिया था। उन लोगों में से एक ने मुझ पर शारीरिक हमला भी किया लेकिन इन सब में सबसे द्वेषपूर्ण यह हुआ कि जब भी मैं किसी शहर के सहपाठी के घर जाता था, जो मुझे पसंद करता था, तो उसके परिवार के लोग मुझे गाँव के गवांर समझ कर अपनी बिरादरी के बाहर के रूप में अनदेखा करने का मुद्दा बना लेते थे। मैं हमेशा ऐसे सादे कपड़े पहनता था कि मुझे उनका नौकर समझ लिया जाता था। मुझे अपने एक करीबी दोस्त के पिता को माफ करने और उनको भूलने में बहुत ज्यादा वक़्त लगा जिन्होंने एक बार मेरे सामने अपने बेटे को बुरी संगत में पड़ने के लिए बहुत फटकार लगाई थी। मुझे पता नहीं था कि हमारे उच्च वर्ग आमतौर से बहुत ऊपर वाले हैं और उनकी संस्कृति और शिष्टाचार आमतौर पर उनके वरिष्ठ अधिकारियों के लिए आरक्षित हैं।

समय के साथ मुझे यह महसूस हुआ कि मैं अकेलेपन और आत्मा दया की भावना से अभिप्लुत हो रहा था। यह उदास मनोदशा पश्चिमी साहित्य के महान शोकान्त नाटकों के वाकपटु कथन से और तीव्र हो गयी। थॉमस हार्डी मेरे सबसे पसंदीदा उपन्यासकारों में से एक थे। मैंने उनकी लगभग सभी रचनाओं को पढ़ा। शेक्सपियर की कॉमेडी मैंने हमेशा बीच में ही छोड़ दी। लेकिन उनके  दुखांत नाटक का मैने एक एक शब्द पढा था। मुझे वे कंठस्थ थे और मुझे लगा कि मेरी स्थिति को  में निम्नलिखित पदों द्वारा संक्षेपित किया गया था

फूल के शुद्ध मणि का एक मणि 

महासागरों की अंधेरी अनगढ़ गुफाएं 

कई फूल अनदेखे रहने के लिए ही पैदा होते हैं 

और रेगिस्तानी हवा पर अपनी मिठास बर्बाद करते हैं

मुझे यकीन था कि मैं उन रत्नों और फूलों में से एक हूँ  जिन्हें उनकी दीप्ती और सुगंध के आधार पर कभी भी सराहना नहीं मिलेगी। मैंने पूरी कविता का हिंदी में अनुवाद किया

लेकिन बड़े पैमाने पर बुराई की समस्या क्रूरता, उत्पीड़न, ज्यादति और अन्याय के कारण हुई जिसे मैंने अपने आसपास की दुनिया में देखा। मैं कई उदाहरणों में से केवल एक का वर्णन करूंगा जिसने मुझे विद्रोह करने पर मजबूर कर दिया। हमारे गांव में हरिजनों की एक बड़ी आबादी थी जो अन्य व्यवस्थाओं के अलावा खेतिहर मजदूरों के रूप में भी काम करते थे। हमारे पड़ोस के कई अन्य गांव में कटाई के समय कृषि श्रमिक कम थे इसलिए इन लोगों ने हमारे गांव में मिल रहे भुगतान की रकम से बेहतर मजदूरी का वादा किया। हमारे गांव के हरिजन स्वाभाविक रूप से आसपास के गांव में जाने लगे जो हमारे गांव के किसान मालिकों को पसंद नहीं आया। इन बाहुबलियों का एक जत्था एक दिन हरिजनों के इलाके मे और उनके कई घरों को ध्वस्त कर दिया और हरिजन महिलाओं से छेड़छाड़ करने की भी धमकी दी यदि उनके पुरुष, प्रधान ग्राम पंचायत, जिसमें हरि जनों का  कोई प्रतिनिधित्व नहीं था, द्वारा निर्धारित मजदूरी के लिए सिर्फ़ हमारे गांव में काम करने के लिए सहमत नहीं हुए। इत्तेफाक से मैं उस दिन गांव में था और हरिजन आश्रम के लड़कों के साथ बस्ती के दौरे पर गया था। मैं अपने आंसुओं को दबा नहीं पाया जब मैंने देखा कि एक नवविवाहिता हरिजन दुल्हन इस आतंकी हमले को देखकर बिल्कुल चेतनाशून्य और निस्तब्ध गई थी।

अपने जीवन के इस महत्वपूर्ण मोड़ पर मेरी अपने एक सहपाठी के साथ बहुत अच्छी दोस्ती हो गई, जो कि दर्शनशास्त्र का छात्र था, जो मेरा विषय नहीं था। वह काफी पढ़ा लिखा था। पर उसमें व्यर्थ बकवाद की विशेष प्रतिभा थी। उस समय उसका साथ मेरे लिए एक भगवान के आशीर्वाद से कम नहीं था जबकि उसकी मुझे सबसे ज्यादा आवश्यकता थी। यमुना के किनारे या दिल्ली की बाहरी सड़कों पर लंबे समय तक चलना हमारी दिनचर्या बन गई, जो कि उस समय काफ़ी छोटा शहर था। इन यात्राओं के दौरान उसने मुझे आगमनात्मक और निगमनात्मक तर्क, नैतिकता, मनोविज्ञान और पश्चिमी दर्शन के विभिन्न प्रणालियों के बारे में बताया। यह सब बहुत आकर्षक था और मेरे सामने विचार और धारणा की एक नई दुनिया खुल गई। मैं अभी भी उन्हें अपने दो महान गुरुओं में से एक मानता हूं।

हालांकि बीच-बीच में वह उन विषयों पर अपने विचार और निर्णय व्यक्त करता था जिनके बारे में मुझे लगता था कि मैं पहले ही अंतिम निष्कर्ष पर पहुंच चुका हूं। एक दिन हम दोनों के बीच बहुत उग्र बहस छिड़ गई जब उसने विवाह संस्थान की निंदा की और कहा कि एक स्त्री और पुरुष, जब तक एक दूसरे को पसंद करते हैं, उन्हें साथ रहने की स्वतंत्रता होनी चाहिए। एक दिन  सुबह जब उसने ये घोषणा की, कि गांधी ही सभी प्रतिक्रिया के मूर्तरूप हैं, तो अहिंसा के प्रति धर्मनिष्ठ होने के बावजूद मुझे यह बहुत प्राणघातक लगा। यह मेरे लिए एक नया शब्द था। उन्होंने यशपाल की “गांधीवाद का सवपरीक्षण” पढ़ने और खुद से इस बात को समझने के लिए कहा। मैंने कभी यशपाल के बारे में नहीं सुना था और ना ही मुझे परवाह थी।  कई साल बाद जब तक मैं साम्यवादी नहीं बना तब तक मैंने वो किताब नहीं पढ़ी। मेरा मित्र उस समय तक साम्यवादी नहीं था और ना ही कभी अपने जीवन में मार्क्सवादी ही बना। लेकिन वह  क्रांतिकारियों के प्रशंसक थे, जिन्हें उनके मुताबिक, कुछ लोगों ने गलत तरीके से आतंकवादियों के रूप में वर्णित किया था। मैं भगत सिंह को छोड़कर किसी भी क्रांतिकारी या आतंकवादी के बारे में कुछ नहीं जानता था, जिन्हें महात्मा गांधी ने गुमराह देशभक्त बताया था।

गांधीवाद के समर्थन में मेरी मानसिक मोर्चाबंदी इस दार्शनिक मित्र द्वारा किए गए हमले से एक के बाद एक ध्वस्त हो रही थी, जिसे मैं एक उत्कृष्ट और विलक्षण मानव के रूप में प्यार करता था और जिनकी बुद्धि और ज्ञान की श्रेष्ठता और उत्कृष्टता को स्वीकार कर लिया था। लेकिन मैंने उनके इस अभिशंसा को साझा करने से इंकार कर दिया कि इस दुनिया को शैतान द्वारा बनाया और नियंत्रित किया जाता है, जो असहाय मनुष्य को फंसाने के लिए समय समय पर उनके लिए खुशी के कुछ दाने डालता रहता है। मैं पूरी तरह से सभी आशाओं को छोड़ने के लिए तैयार नहीं था। लेकिन दुनिया के विकासवादी स्पष्टीकरण निर्जीव और चेतन, जो मैंने एक या दो साल पहले इतिहास में एच जी वेल्स की “इतिहास की रूपरेखा” में पढ़ा था, अचानक मेरी चेतना में जीवित होना शुरू हो गए। अब तक मुझे केवल इस पुस्तक में की गई कुछ अनभ्यस्त पर्यवेक्षकण याद थे जैसे कि मानस वंश के वर्षक्रमिक इतिहास में अशोक सबसे महान राजा थे, सिकंदर और नेपोलियन अपराधशील थे और यह कि मुहम्मद किसी तरह के उठाईगीरे थे। अब मुझे ये कौतुहल हुआ कि कहीं वास्तव में यह संसार अणुकणों का सांयोगिक सम्मिलन तो नहीं जिसका कोई  सोद्देश्य चैतन्य उसे ईश्वरीय लक्ष्य की ओर ले जाए, और जिसके आव्यूह के केंद्र में कोई नैतिक प्रणाली नहीं।

ताबूत में एक और कील जो गांधीवाद अब मेरे लिए बनने लगी थी, “गांधीवाद वर्सेस सोशलिज्म” नाम की किताब से प्रेरित थी जिसने संस्था साहित्य मंडल की किताबों की दुकान पर मेरा ध्यान आकर्षित किया था। इस समय तक मुझे समाजवाद के बारे में कुछ पता नहीं था। गांधीजी और सुभाष चंद्र बोस के बीच के विवाद में दो साल पहले पहली बार ये शब्द मेरे संज्ञान में आया।मैंने हरिजन आश्रम में रह रहे अपने एक मित्र के पास यह मामला भेजा। उन्होंने मुझे बताया कि समाजवादी बम पार्टी से संबंधित थे और हिंसा में विश्वास करते थे। इसने मेरे लिए मामला सुलझा दिया। लेकिन जब मैंने इस पुस्तक को पढ़ना शुरू किया तो मेरी नज़र में समाजवाद का अतिबृहत कायापलट हुआ। कई प्रमुख गांधीवादी और समाजवादियों के बीच की बहस में गांधीवादी प्रतियोगिता हार गए। मैं इस तथ्य से प्रभावित हो रहा था कि गांधीवादी पूरी बहस के दौरान रक्षात्मक अंदाज़ से यह साबित करने की कोशिश कर रहे थे कि गांधीवादी भी समाजवादी ही हैं जबकि समाजवादी आक्रामक ढंग से बहुत से शब्दों में यह कह रहे थे कि गांधीवादी समाजवाद नहीं थे, बल्कि कुछ प्रतिक्रियात्मक और पुनरुज्जीववादी थे।

अब मैं समाजवाद के सिद्धांत का अच्छा ज्ञान प्राप्त करने के लिए बहुत जल्दबाजी में था। यह मेरे अगले साल के पाठ्यक्रम “पश्चिमी राजनीतिक विचार” का निर्धारित पठन का हिस्सा भी था। लेकिन मैं अगले साल तक इंतजार नहीं करना चाहता था। बीए ऑनर्स के पाठ्यक्रम में हैरोल्ड लास्की का समाजवाद उच्चतर पठन के लिए अनुशंसित पुस्तकों में शीर्ष पर था।  मैंने विश्वविद्यालय के पुस्तकालय से इस पुस्तक की एक प्रति उधार ली और इसे पढ़ने के लिए बाहर बगीचे में बैठ गया। मेरे जीवन में इससे पहले कभी किसी किताब ने मुझे इतना मोहित नहीं किया था। अंधेरा होने तक इसे पढ़ता रहा।फिर मैं उसे घर ले आया और उसे खत्म करते करते रात हो गई। हालांकि यह तुलनात्मक रूप से एक छोटी पुस्तक थी लेकिन जब मैं अगली सुबह उठा तो गांधीवाद मानो मेरे चारों तरफ ध्वस्त पड़ा हुआ था।

त्वरित अनुक्रमण में लास्की ने मुझे सीधे दो और पुस्तकों तक पहुंचाया। उन दोनों को उस समय ब्रिटिश सरकार ने निषिद्ध कर दिया था।  लेकिन हमारे राजनीति विज्ञान के प्रोफ़ेसर के पास ये दोनों पुस्तकें थीं और वे मुझे उन्हें उधार देने के लिए सहमत हो गए, इस शर्त पर कि मैं उन्हें एक अखबार में लपेट कर ले जाऊं और अपने कमरे पर पहुंच कर ही निकालूं। इनमें से एक किताब जॉन स्ट्रेटची द्वारा लिखित “थ्योरी एंड प्रैक्टिस ऑफ सोशलिज्म” थी। दूसरी पुस्तक थी ऐडगर स्नो द्वारा लिखित “रेड स्टार ओवर चाइना”। मुझे ये दोनों भी लास्की की ” साम्यवाद” की तरह ही दिलचस्प लगी। बाद में स्ट्रेटची साम्यवाद छोड़कर ब्रिटिश मजदूर दल से जुड़ने वाले थे। चीनी कम्यूनिस्टों द्वारा एडगर स्नो पर सीआईए एजेंट होने का अभियोग लगने वाला था। लेकिन इन दो पुस्तकों ने, जब तक इन लेखकों की प्रतिष्ठा बरकरार रही, भारत में किसी भी अन्य साहित्य की तुलना में अधिक साम्यवादी बनाए।

अब कार्ल मार्क्स को पढ़ने की इच्छा अति तीव्र हो गई थी । सबसे पहले मैंने साम्यवादी घोषणापत्र पढ़ा। यह मानव इतिहास के विस्तृत परिदृश्य के परिसीमा और गहराई का एक असाधारण प्रभावक्षेत्र था। साथ ही यह दुनिया को बदलने और आने वाले समय में शोषण और सामाजिक अन्याय को समाप्त करने के कार्यवाही करने के लिए एक पुकार थी। सबसे ज्यादा आश्वस्त करने वाली बात यह थी कि क्रांतिकारी कार्यवाही सामाजिक शक्तियों के विकासपरक चक्राकार का मात्र एक उपादान था जो कि हर वर्ग के विरोधाभास को ख़त्म कर रहा था, हर प्रतिरोध के बावजूद। मुझे मार्क्सिस्ट बनने के लिए अब और मार्क्स को पढ़ने की जरूरत नहीं थी पर मैंने दास कैपिटल के दोनों खंड का हर पृष्ठ पढ़ा। पुराने और सच्चे जर्मन परंपरा में सूक्ष्मावधायी और श्रमसाध्य छात्रवृत्ति ने मेरी मानसिक क्षमताओं की परिसीमा पर बहुत जोर दिया। लेकिन मुझे इसमें कोई संदेह नहीं था कि उन्होंने पूंजीवाद और “लेबर थ्योरी ऑफ वैल्यू” के खिलाफ अपना अभियोग, दर्ज तथ्यों और आंकड़ों की एक ठोस नींव और तीखे तर्कों की कवायद पर  बनाया था जिसमें किसी तरह की गलती की कोई गुंजाइश नहीं होगी।

मुझे याद नहीं कि मैंने इस दौरान कोई साम्यवादी श्रेण्य ग्रंथ या कोई और साम्यवादी साहित्य पढ़ा हो। पर हाँ मैंने निश्चित रूप से लेनिन या स्टालिन को नहीं पढ़ा था। माओ अभी तक साम्यवादी सिद्धांतकार के रूप में नहीं उतरे थे। ना ही मुझे भारत में किसी साम्यवादी या समाजवादी आंदोलन के अस्तित्व के बारे में कुछ पता था। दिन प्रतिदिन के या व्यावहारिक राजनीति में मेरी कोई दिलचस्पी नहीं थी। मैं शायद ही कभी किसी भी दल की साप्ताहिकि पढ़ता था ना ही कोई दैनिक पत्रिका। महात्मा गांधी का साप्ताहिक “हरिजन” एकमात्र पत्रिका थी जिसे मैंने अब तक नियमित रूप से पढ़ा था, पर किसी राजनीतिक अभिरूचि के कारण नहीं। नैतिक समस्याओं से महात्मा की अन्यमनस्कता उनके साप्ताहिकि के प्रति मेरे आकर्षण का प्रमुख स्त्रोत्र था। मार्क्स ने मुझे उन नैतिक  समस्याओं का एक गहरा समाधान प्रदान किया था। अनैतिक समाज के बीच एक व्यक्ति नैतिक नहीं हो सकता।

फिर एक बहुत बड़ा भ्रम आया जो मुझे लगता है कई अन्य मामलों में भी हुआ होगा। मार्क्सवादी होने से मैं एक साम्यवादी बन गया जो कि सोवियत संघ का प्रशंसक था। ंमैंने सोवियत रूस में जीवन की स्थितियों के बारे में एक भी किताब नहीं पढ़ी थी फिर भी मैंने यह निष्कर्ष निकाला कि श्रमजीवी क्रांति के बाद मार्क्स ने जिस सहस्राब्दी का वादा किया था वह उस देश में अंकुरित होना शुरू हो गया होगा, जिसे साम्यवादी कहा जाता था।जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूं तो मैं ठोस तथ्यों के संबंध में अपने मन की मूर्खता पर चकित होता हूं जो कि सैद्धांतिक सवालों के संबंध में इतना सतर्क था। लेकिन वैचारिक ठगी, मेरी बुद्धि के किसी भी हिस्से से बिना किसी प्रतिरोध के, आसानी से हो गई। इसलिए जब भारत छोड़ो आंदोलन महात्मा गांधी द्वारा शुरू किया गया तो मैंने खुद को बाड़ के दूसरी तरफ पाया। मुझे उन स्वतंत्रता सेनानियों के प्रति कोई सहानुभूति नहीं थी जो ब्रिटिश गोलियों से मारे जा रहे थे या ब्रिटिश कारागारों में बंद थे। मेरी नज़र सोवियत संघ के विशाल विस्तृत क्षेत्रों में लड़ी जा रही लड़ाई पर टिकी थी। मैंने दैनिक समाचार पत्र पढ़ना शुरू कर दिया था

उसी समय मैंने यह निष्कर्ष निकाला कि इस संसार के निर्माता के रूप में ईश्वर की कल्पना केवल तीन तरीकों से की जा सकती है, या तो एक दुष्ट के रूप में जो अपनी दुनिया में प्रचलित दुष्टता को स्वीकृति भी देता है और उसमें सम्मिलित भी है, या फ़िर एक अल्पबुद्धि के रूप में जिसे अपनी सृष्टि पर कोई नियंत्रण नहीं या फिर एक सन्यासी के रूप में जिसे अपने प्राणियों के साथ क्या हो रहा है इसकी कोई परवाह ही नहीं। अगर भगवान एक दुष्ट हैं तो हमें उनकी दुष्टता के विरोध में खड़ा होना होगा, अगर वह एक अल्प बुद्धि है तो हमें उन्हें भूल कर संसार का नियंत्रण अपने हाथों में लेना होगा और अगर वह एक सन्यासी हैं तो वह अपने काम से मतलब रखें और हम अपने काम से। हालांकि हमारे शास्त्रों ने भगवान और उनकी भूमिका के बारे में एक अलग ही संस्करण दिया है। वह संस्करण ना तो अनुभव से और ना ही किसी तर्क से समर्थित था। इसलिए शास्त्रों को एक अलाव में जला देना चाहिए, अधिमानतः सर्दियों के दौरान जब यह कुछ गर्मी प्रदान कर सके।

अब मेरे इस सिद्धांत की परिणिति एक हास्यास्पद उत्तरकथा में होनी वाली थी । मैं अपने गाँव में अपने जैसे ही विचारों वाले व्यक्तियों के साथ कुछ चर्चा कर रहा था । जैसे मैने अपनी नई परिकल्पना प्रकट की तो किसी ने बताया कि आर्य समाज के अध्यक्ष हाथ में मजबूत छड़ी लेकर घर से निकल पड़े हैं। वह यह भी कहते हुए आ रहे थे कि मैं प्रचार का भूखा हूँ और जैसे ही मेरे सर पर उनका डंडा पडे़गा मैं एक नई रोशनी में ईश्वर को देखने और दुनिया में ईश्वर की भूमिका के बारे में अपनी राय बदलने के लिए बाध्य हो जाऊंगा ।

मैं मानता हूं कि मैं इस परीक्षा के लिए तैयार नहीं था इसलिए मैं गांव छोड़कर चला गया। मुझे विश्वास था और उम्मीद थी कि सरपंच का क्रोध कुछ ही दिनों में शांत हो जाएगा और ऐसा हुआ भी। पर फिर मैं गांव के लोगों के सामने अपने उग्रवादी नास्तिकता को अभिव्यक्ति देने में अधिक सावधान हो गया।

(रागिनी विवेक कुमार द्वारा अनूदित)


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