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Sunday, April 14, 2024

उर्दू दिवस पर फिर वही प्रश्न: भारत में जन्म और आकार लेने वाली उर्दू का दिन अल्लामा इकबाल के जन्मदिन पर क्यों, जिन्हें पाकिस्तान अपना वैचारिक संस्थापक मानता है?

9 नवम्बर को अल्लामा इकबाल के जन्मदिन के अवसर पर भारत में उर्दू दिवस मनाया गया. एक प्रश्न यह उठ खड़ा होता है कि आर्खिर जिस भाषा ने भारत में आकार लिया और जिस भाषा में संस्कृत, ब्रज, अवधी आदि के शब्द हुआ करते थे उसे पूरी तरह से एक मजहब विशेष की भाषा बना दिया गया और इतना ही नहीं जिस इंसान को पाकिस्तान अपना वैचारिक संस्थापक मानता है, उसके जन्मदिन पर उर्दू-दिवस मनाना कहाँ तक उचित है?

अल्लामा इकबाल का जन्मदिन पाकिस्तान में धूम धाम से मनाया जाता है, क्योंकि उन्होंने वैचारिक रूप से पाकिस्तान के विचार को जन्म दिया था, पुख्ता किया था. जब भारत में लोग उर्दू दिवस का नाटक कर रहे थे, उस दिन पाकिस्तान में इकबाल को इसलिए याद किया जा रहा था क्योंकि उन्होंने “मुस्लिम वर्चस्व” का विचार ही नहीं किया बल्कि उस पर कार्य भी किया

इस ट्वीट में लिखा है कि उनका साहित्य मुस्लिमों को जगाने एवं उम्मा के लिए था.

लोगों ने याद किया कि अल्लामा इकबाल ने इस उपमहाद्वीप के मुस्लिमों को अलग राज्य की अवधारणा दी, जहां पर वह अपने मजहब और रीति रिवाजों के साथ रह सकते है

पाकिस्तान के इतिहास में 9 नवम्बर का दिन बहुत ही विशेष होता है क्योंकि उसी दिन दो देशों के सिद्धांत वाले अल्लामा इकबाल का जन्मदिन होता है, अल्लामा इकबार ने पाकिस्तान का विचार दिया और आजादी की रोशनी में सुनहरा भविष्य दिया

भारत में उर्दू को ऐसे अल्लामा इकबाल तक सीमित क्यों रख दिया है?

प्रश्न यह खड़ा होता है कि भारत में अभी तक उर्दू दिवस को देश तोड़ने वाले एवं पाकिस्तान के विचार के जनक अल्लामा इकबाल के जन्मदिन के साथ क्यों जोड़ा जा रहा है? वह कौन सा संदेश है जो इस दिन के माध्यम से दिया जा रहा है.

भारत में पसमांदा आन्दोलन का चेहरा डॉ फैयाज़ अहमद फैजी भी यही प्रश्न करते हैं कि आखिर उर्दू दिवस पकिस्तान के वैचारिक पिताओं में से एक अल्लामा इकबाल के नाम पर क्यों है?

यह उर्दू के प्रथम दीवान(काव्य संग्रह) लेखक चन्द्रभान जुन्नारदार (जनेवधारी), पण्डित रत्न लाल शर्शार, मुंशी ज्वाला प्रसाद बर्क, मुंशी नौबत राय नज़र, पण्डित बृज नारायण चकबस्त,मुंशी प्रेमचंद, कृष्ण चंद्र और गोपीचंद नारंग के नाम पर क्यों नहीं?

यह प्रश्न हर वह व्यक्ति पूछेगा जिसे अल्लामा इकबाल की जहर भरी शायरी समझ में आती है, जब वह भारत में सोमनाथ के मंदिर तोड़े जाने वालों का फिर से इंतज़ार कर रहे हैं. वही सोमनाथ का मंदिर जिसे न जाने कितनी बार तोड़ डाला गया था, और अल्लामा इकबाल जब तक भारत में थे, तब तक वह उसी टूटी स्थिति में था, परन्तु फिर भी वह लिखते हैं कि

क्या नहीं और ग़ज़नवी कारगह-ए-हयात में

बैठे हैं कब से मुंतज़िर अहल-ए-हरम के सोमनाथ!

अर्थात अब और गज़नवी क्या नहीं हैं? क्योंकि अहले हरम (जहाँ पर पहले बुत हुआ करते थे, और अब उन्हें तोड़कर पवित्र कर दिया है) के सोमनाथ अपने तोड़े जाने के इंतज़ार में हैं।

यह देखना अत्यंत ही दुर्भाग्यपूर्ण है कि जो अल्लामा इकबार बार बार अलगाववादी मानसिकता को प्रदर्शित करते हैं, और हिन्दुओं के प्रति सबसे अधिक दुर्भावना रखते हैं, जो उनके भगवान के विषय में यह लिखते हैं कि अब तो यह पुराने हो गए हैं और ब्राह्मणों ने बैर रखना बुतों से सीखा है।

उनकी नज्मों से इतर मुस्लिम लीग के अधिवेशन में उनके अलगाववादी विचार पढ़े जाने चाहिए। यह इकबाल ही थे, जिन्होनें भारत के टुकड़े करने और पाकिस्तान बनाने का विचार उठाया था। 29 दिसंबर 1930 को मुस्लिम लीग के अधिवेशन में उन्होंने भारत के भीतर एक मुस्लिम भारत बनाने की मांग का समर्थन किया था और पंजाब, उत्तरी-पश्चिमी फ्रंटियर क्षेत्र, सिंध, बलूचिस्तान को मिलाकर राज्य बनाने की बात की थी, जिसमें या तो ब्रिटिश राज्य के भीतर या ब्रिटिश राज्य के बिना सेल्फ-गवर्नेंस होगी। अर्थात मुस्लिमों का शासन होगा।

इकबाल ने इस भाषण में इस्लाम को राज्य बताया है। उन्होंने इस भाषण में कहा था कि मुस्लिम नेताओं और राजनेताओं को इस बात से भ्रमित नहीं होना चाहिए कि तुर्की और पर्शिया या फिर और मुस्लिम देश तो राष्ट्रीय हितों के आधार पर आगे बढ़ रहे हैं। भारत के मुसलमान अलग हैं। भारत से बाहर के जो भी इस्लामिक देश हैं, वह व्यावहारिक रूप से पूर्णतया मुसलमाना ही हैं। कुरआन की भाषा में वहां के अल्पसंख्यक “किताब के लोग’हैं। मुस्लिमों और ‘किताब के लोगों’ के बीच कोई भी सामाजिक अवरोध नहीं है। एक यहूदी या ईसाई के बच्चे के छूने से किसी भी मुस्लिम का खाना खराबा नहीं होता है और इस्लाम का कानून उन्हें परस्पर शादी की अनुमति देता है। फिर वह आगे कहते हैं कि कुरआन में लिखा है कि ‘ए, किताब के लोगों, हम उस शब्द पर एक साथ आते हैं, जो हमें परस्पर जोड़ता है।”

http://www.columbia.edu/itc/mealac/pritchett/00islamlinks/txt_iqbal_1930.html#03

यही कारण है कि पाकिस्तान में उन्हें इसलिए पूजा जाता है क्योंकि उन्होंने मजहब के आधार पर देश की बात की, मुल्क की बात की. उन्होंने अपनी नज़्म शिकवा में तो अपनी पहचान पूरी तरह से अरब से जोड़ दी थी.

वह लिखते हैं

अजमी ख़ुम है तो क्या, मय तो हिजाज़ी है मेरी।

नग़मा हिन्दी है तो क्या, लय तो हिजाज़ी है मेरी।

इसके अर्थ को समझना होगा। अजमी अर्थात अरब का न रहने वाला, खुम: शराब रखने का घडा, मय: शराब, परन्तु यहाँ पर मय का अर्थ शराब तो है ही, परन्तु इसकी जो प्रकृति है वह अरबी है। और फिर है हिजाजी: इसका अर्थ है, हिजाज का निवासी, हिजाज सऊदी अरब का प्रांत है, हिजाजी का अर्थ है ईरानी संगीत में एक राग!

अब समझना होगा कि जब अल्लामा इकबाल मुसलमानों की तत्कालीन बुरी स्थिति की शिकायत खुदा से कर रहे थे तो अंत में उन्होंने मुस्लिमों की पहचान अरब से जोड़ दी है। उन्होंने लिखा है

कि

घड़ा अरबी नहीं है तो क्या हुआ मय तो अरबी है। यहाँ पर घड़े का अर्थ है भारतीय मुस्लिम! अल्लामा इकबाल ने कहा मैं कहने के लिए देशी मुसलमान हूँ, मगर मैं मय अर्थात स्वभाव, प्रकृति, और अपनी जीवन पद्धति से तो अरबी हूँ!

मैं नगमा जरूर हिंदी का हूँ, पर लय तो अरबी ही है! लय का अर्थ हम सभी जानते हैं, नगमे की आत्मा!

अल्लामा इकबाल ने भारतीय मुसलमानों की पहचान को वतन अर्थात भारत से कहीं दूर अरब से जोड़ दिया था।

फिर भी उनके नाम पर यह दिन क्यों मनाया जाता है, यह समझ से परे है. ऐसा नहीं है कि विरोध नहीं हुआ है. वर्ष 2013 में यह मांग उठी थी कि उर्दू दिवस को इकबाल के जन्मदिवस के अवसर पर नहीं मनाया जाए क्योंकि यह उर्दू को एक साम्प्रदायिक रंग दे रहा है। परन्तु ऐसा प्रतीत होता है कि प्रोफेसर्स की भी यह मांग अनसुनी ही रह गयी

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