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Sunday, August 14, 2022

तृणमूल कांग्रेस का ‘महाभ्रष्टाचार’ बना ममता बनर्जी के लिए अभूतपूर्व संकट, क्या वह अपनी सत्ता बचा पाएंगी?

भारत की राजनीतिक और सांस्कृतिक चेतना में पश्चिम बंगाल का बहुत बड़ा महत्त्व है। स्वतंत्रता के पश्चात राजनीतिक अकर्मण्यता और दूरदर्शिता की कमी के कारण पश्चिम बंगाल वामपंथ के जाल में उलझ कर रह गया। तीन दशक से भी बड़े वामपंथी शासन काल के बाद ममता बनर्जी के रूप में बंगालियों को एक तारणहार दिखाई दिया, और इसी कारण उन्हें लगातार दो बार सत्ता के शीर्ष पर बैठाया भी गया। माँ, माटी, मानुष के नारे पर सर्वसमाज का प्रतिनिधित्व करने और साफ़ सुथरी सरकार देने का दम्भ भरने वाली ममता बनर्जी का तिलिस्म अब टूटने लग गया है, ऐसा लगता है जैसे वह अब अपनी राजनीतिक पारी के अंत की ओर तेजी से अग्रसर हैं।

यूँ तो ममता बनर्जी ने पिछले कुछ वर्षों में अतिवादी राजनीति का प्रदर्शन किया है। चाहे केंद्र सरकार से हर विषय पर आक्रामक मतभेद रखना हो, केंद्र को योजनाओं में अड़ंगा लगाना हो, चुनाव में धांधली और हिंसा करना हो, देशविरोधी गतिविधियों का समर्थन करना हो, या फिर सेना, लोकसेवा कर्मचारी, और यहाँ तक कि राज्यपाल से मतभेद करना हो, ममता बनर्जी और उनके दल ने कोई कसर नहीं छोड़ी। केंद्र सरकार भी शायद एक सही अवसर की तलाश में थी, और अब उन्हें ममता बनर्जी को घेरने का अवसर मिल ही गया है।

ममता बनर्जी पर पहले भी भ्रस्टाचार के आरोप लगे थे, शारदा चिटफंड ऐसा ही एक विषय था, लेकिन उसमे कोई कड़ी कार्यवाही नहीं हुई । लेकिन शिक्षक भर्ती घोटाले में शुरू हुई जांच अब ममता सरकार के गले की हड्डी बन चुकी है। इस घोटाले में ममता सरकार के मंत्री पार्थ चटर्जी
गिरफ्तार हो चुके हैं, वहीं उनकी सहयोगी अर्पिता मुखर्जी के पास करोड़ों रूपए और आभूषण मिलने के बाद यह मामला और बिगड़ता जा रहा है।
अब स्थिति इतनी खराब हो चुकी है कि तृणमूल कांग्रेस के भीतर से ही विरोध के स्वर उठने लगे हैं।

बता दें कि ईडी के अधिकारियों ने बुधवार को बेलघरिया स्थित अर्पिता मुखर्जी के दूसरे फ्लैट पर भी छापा मारा था। करीब 18 घंटे चली कार्यवाही में ईडी को 29 करोड़ नकद मिला है, जिसके गिनती के लिए 3 मशीनें लगानी पड़ीं। इसके अतिरिक्त 5 किलो सोना भी बरामद हुआ है। इससे पहले 23 जुलाई को भी ED ने मंत्री पार्थ चटर्जी और अर्पिता के ठिकानों पर छापेमारी की थी। तब भी अर्पिता के घर से 21 करोड़ रुपए नकद और 1 करोड़ रुपए नकदी मिली थी।

ममता बनर्जी किंकर्तव्यविमूढ़ हैं, जो हो रहा है वो अकल्पनीय है

यूं तो ममता बनर्जी हमेशा ही क्रुद्ध रहती हैं, लेकिन इस बार लग रहा है वह तनाव में हैं, उन्हें समझ नहीं आ रहा कि क्या प्रतिक्रिया दें। इस विषय पर ममता बनर्जी ने कहा, ‘आपको क्यों उन्हें उस अस्पताल में लेकर जाना पड़ा, जिसका सेंट्रल गवर्नमेंट से टच है? ESI हॉस्पिटल क्यों? क्यों कमांड हॉस्पिटल? आखिर इरादा क्या है? क्या यह बंगाल के लोगों का अपमान नहीं है? आपको क्या लगता है? क्या केंद्र निर्दोष है और राज्य चोर हैं? आप वहां पर राज्यों की वजह से हैं।’

उन्होंने भाजपा को चेतावनी देते हुए कहा, ‘महाराष्ट्र इस बार नहीं लड़ पाया। वे कहते हैं कि महाराष्ट्र के बाद छत्तीसगढ़, झारखंड और बंगाल का नंबर है। यहां आने की कोशिश करेंगे तो आपको बंगाल की खाड़ी को पार करना होगा। मगरमच्छ आपको निगल जाएंगे और सुंदरबन के रॉयल बंगाल टाइगर आपको खा जाएंगे। वहीं, उत्तरी बंगाल में हाथी आपके ऊपर लुढ़क जाएंगे।’

ममता बनर्जी ने कहा कि वह भ्रष्टाचार या किसी गलत काम का समर्थन नहीं करती हैं। उन्होंने कहा, ‘भाजपा गलत है अगर उसे लगता है कि वह एजेंसियों का इस्तेमाल करके मेरी पार्टी को तोड़ सकती है। सच्चाई बाहर आनी चाहिए, लेकिन एक समय सीमा के भीतर। मैं किसी को नहीं बख्शती हूं। अगर कोई चोर या डकैत है, तो टीएमसी में उनकी जगह नहीं है। लेकिन अगर आप मुझ पर स्याही फेंकने की कोशिश करते हैं तो मैं भी कीचड़ उछाल सकती हूं।’

अब बताइये इस वक्तव्य का क्या अर्थ निकला? इससे ममता बनर्जी के मन में पैदा हुए डर का पता लगता है।

तृणमूल कांग्रेस में है संशय की स्थिति

पश्चिम बंगाल के मंत्री पार्थ चटर्जी की गिरफ्तारी के बाद यह मामला ख़त्म नहीं होने वाला है, लगता है इस बार तृणमूल कांग्रेस को कड़ी न्यायायिक कार्यवाही झेलनी पड़ सकती है। जहां पार्थ चटर्जी और उनके सहयोगी इस समय हिरासत में हैं, वहीं तृणमूल के एक अन्य विधायक माणिक भट्टाचार्य को जल्द ही ईडी की कार्यवाही का सामना करना पड़ सकता है। इसके अतिरिक्त और भी कई नेता भ्रष्टाचार के मामलों में फंस सकते हैं।

ऐसा माना जा रहा है कि जिन भी मंत्रियों पर संदेह है, या जिन पर भ्रष्टाचार के छोटे या बड़े आरोप हैं, उन सभी पर भविष्य में कार्यवाही हो सकती है। यह भी संभव है कि पूरा मंत्रिमंडल स्वयं ही इस्तीफ़ा दे दे और ममता बनर्जी आगे कोई निर्णय लें । ऐसी किसी भी स्थिति में ममता बनर्जी चाहें तो नए मंत्रिमंडल का गठन कर सकती हैं, और ख़राब छवि के नेताओं को बाहर भी किया जा सकता है।

क्या ममता बनर्जी केंद्र से नजदीकी बढ़ाना चाहती हैं?

आपको यह सुनने में आश्चर्य हो सकता है, लेकिन इसमें कुछ तो सत्य है। ममता बनर्जी ने पिछले कुछ दिनों में केंद्र सरकार के साथ अपने सम्बन्ध सुधारने का प्रयत्न किया है। उपराष्ट्रपति के चुनाव की प्रक्रिया से पहले ममता बनर्जी असम के मुख्यमंत्री और पश्चिम बंगाल के राज्यपाल जगदीप धनखड़ से दार्जीलिंग में मिलीं, और उसके पश्चात उनकी पार्टी ने इस चुनाव की प्रक्रिया से अलग हटने का निर्णय कर लिया।

इसके अतिरिक्त ममता बनर्जी 7 अगस्त को नीति आयोग गवर्निंग काउंसिल की बैठक में भी सम्मिलित होंगी। इस बैठक की अध्यक्षता प्रधानमंत्री मोदी करेंगे और इसमें सभी राज्यों के मुख्यमंत्री भी सम्मिलित होंगे। यहाँ यह जानना आवश्यक है कि ममता बनर्जी पिछले कई महीनों से इस बैठक में भाग लेने नहीं आयीं थी, लेकिन इस बार आ रही हैं।

इससे क्या प्रतीत होता है? इससे तो यही लग रहा है कि ममता बनर्जी केंद्र सरकार से नजदीकी बढ़ाना चाह रही हैं और इस प्रयत्न में हैं कि केंद्र उनकी पार्टी और मंत्रियों पर कार्यवाही में किसी भी प्रकार कि ढील दे।

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