6 अप्रैल 2010 को छत्तीसगढ़ के ताड़मेटला जंगल में नक्सलियों ने 76 सुरक्षाकर्मियों की हत्या की, लेकिन 16 साल बाद हाईकोर्ट ने सबूतों की कमी के कारण 10 आरोपियों को बरी कर दिया।
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने 2010 के ताड़मेटला नक्सली हमले मामले में 10 आरोपियों को बरी कर दिया है। इस फैसले ने एक बार फिर देश की जांच व्यवस्था, अभियोजन प्रक्रिया और न्याय प्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सवाल यह भी उठ रहा है कि देश के लिए जान देने वाले 76 जवानों को आखिर न्याय मिला या नहीं। जिन नक्सलियों ने देश के सुरक्षाबलों पर सबसे बड़ा हमला किया, क्या वे आज भी कानून की पकड़ से बाहर हैं?

मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रविंद्र अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने 5 मई 2026 को यह फैसला सुनाया। अदालत ने साफ कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपियों के खिलाफ विश्वसनीय और कानूनी रूप से स्वीकार्य सबूत पेश नहीं कर पाया। कोर्ट ने जांच में भारी लापरवाही, प्रक्रियागत खामियों और गवाहों के मुकर जाने पर गहरी नाराजगी जताई।
यह मामला राज्य सरकार की उस अपील से जुड़ा था, जिसमें ट्रायल कोर्ट के 7 जनवरी 2013 के बरी करने वाले फैसले को चुनौती दी गई थी। हाईकोर्ट ने धारा 378 सीआरपीसी के तहत दाखिल अपील खारिज करते हुए कहा कि पूरे मामले में कोई प्रत्यक्षदर्शी या सीधा सबूत मौजूद नहीं था। अभियोजन केवल परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर मामला चला रहा था।

कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि 75 सीआरपीएफ जवानों और एक पुलिसकर्मी की हत्या जैसे भयावह मामले में भी जांच एजेंसियां असली अपराधियों की पहचान साबित नहीं कर सकीं। अदालत ने इसे बेहद दुखद स्थिति बताया। कोर्ट ने कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े इतने बड़े मामले में भी अभियोजन पक्ष अदालत के सामने भरोसेमंद सबूत नहीं रख पाया, इसलिए ट्रायल कोर्ट के पास आरोपियों को बरी करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा।
हाईकोर्ट ने जांच और अभियोजन की पांच बड़ी कमियों को भी गिनाया। पहली कमी यह रही कि किसी भी प्रत्यक्षदर्शी ने आरोपियों की पहचान नहीं की। अभियोजन यह साबित ही नहीं कर पाया कि हमला करने वाले लोग वही आरोपी थे, जिन्हें गिरफ्तार किया गया।
दूसरी बड़ी कमी आरोपियों के कथित कबूलनामे को लेकर रही। धारा 164 के तहत दर्ज बयान को किसी स्वतंत्र सबूत से समर्थन नहीं मिला। यानी पुलिस ने जो बयान अदालत में रखा, उसे मजबूत करने वाला कोई ठोस आधार मौजूद नहीं था।
तीसरी कमी विस्फोटक सामग्री को लेकर सामने आई। पुलिस ने पाइप बम, ग्रेनेड और हथियार घटनास्थल से बरामद किए, लेकिन आरोपियों के कब्जे से कुछ नहीं मिला। सबसे बड़ी बात यह रही कि फॉरेंसिक साइंस लैब की रिपोर्ट अदालत में पेश ही नहीं की गई। ऐसे में यह साबित नहीं हो सका कि बरामद सामग्री वास्तव में विस्फोटक थी।
चौथी कमी कानूनी प्रक्रियाओं में दिखी। अदालत ने पाया कि आर्म्स एक्ट के तहत जरूरी अभियोजन स्वीकृति रिकॉर्ड पर नहीं थी। आरोपियों की टेस्ट आइडेंटिफिकेशन परेड भी नहीं कराई गई। गवाहों के बयानों में भी विरोधाभास दिखाई दिए।
पांचवीं और सबसे गंभीर कमी यह रही कि अभियोजन यह साबित नहीं कर पाया कि आरोपियों ने विस्फोटक लगाए, संभाले या उनका इस्तेमाल किया।
सुनवाई के दौरान महाधिवक्ता ने खुद अदालत को बताया कि सभी गवाह मुकर गए और किसी ने भी आरोपियों को हमलावर के रूप में नहीं पहचाना। अदालत ने जब पूछा कि बिना सबूत के राज्य सरकार ने अपील क्यों दायर की, तब भी संतोषजनक जवाब नहीं मिला।
हाईकोर्ट ने जांच के तरीके पर नाराजगी जताते हुए कहा कि भविष्य में गंभीर अपराधों की जांच उच्च स्तर की होनी चाहिए। अगर जांच एजेंसियां इसी तरह काम करेंगी, तो जनता का आपराधिक न्याय प्रणाली से भरोसा उठ जाएगा।

ताड़मेटला हमला देश के सबसे खतरनाक नक्सली हमलों में गिना जाता है। 6 अप्रैल 2010 की सुबह सीआरपीएफ की 62वीं बटालियन और राज्य पुलिस की टीम चिंतलनार इलाके में एरिया डोमिनेशन पेट्रोलिंग कर रही थी। तभी सुकमा जिले के ताड़मेटला गांव के जंगलों में घात लगाकर बैठे नक्सलियों ने जवानों पर ताबड़तोड़ फायरिंग शुरू कर दी। हमले में 75 सीआरपीएफ जवान और एक पुलिसकर्मी मारे गए। नक्सली जवानों के हथियार भी लूटकर ले गए। भागते समय उन्होंने टिफिन बम भी लगाए।
इस मामले में 10 लोगों के खिलाफ चिंतागुफा थाने में केस दर्ज हुआ था। मुकदमे के दौरान दो आरोपियों की मौत हो गई, जिनमें सबसे कम उम्र का आरोपी 19 वर्षीय बरसे लखमा भी शामिल था।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि जिन जवानों ने देश की सुरक्षा के लिए अपनी जान दी, क्या उन्हें न्याय मिला? अगर जांच एजेंसियां सबूत तक नहीं जुटा सकीं, गवाह टूट गए और अदालत में मामला टिक नहीं पाया, तो इसका सीधा फायदा आखिर किसे मिला? नक्सलियों की हिंसा ने देश के 76 परिवारों को उजाड़ दिया, लेकिन 16 साल बाद भी असली दोषियों की पहचान अदालत में साबित नहीं हो सकी। यह केवल जांच की विफलता नहीं, बल्कि उन जवानों के बलिदान के साथ भी बड़ा अन्याय माना जा रहा है।

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