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Thursday, June 20, 2024

व्यास पूर्णिमा: भारतीय विमर्श की उच्च पृष्ठभूमि

आषाढ़ माह की पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा एवं गुरु पूर्णिमा भी कहा जाता है। महर्षि व्यास, जिनका जन्म महर्षि पराशर और निषाद कन्या सत्यवती के समागम के कारण हुआ था, और जिनके जन्म के तुरंत उपरान्त ही सत्यवती अपने घर चली गईं थीं, महर्षि पराशर के पास नन्हे व्यास को छोड़कर! व्यास का पालनपोषण उनके पिता महर्षि पराशर ने किया।

उनके जन्म और नाम दोनों की ही कहानी अद्भुत है एवं विमर्शों को उस ऊंचाई पर ले जाती है, जहाँ पर पश्चिमी विमर्श जाने की कल्पना ही नहीं कर सकता है। कहानी है महाभारत काल की। सत्यवती उन दिनों अपनी यौवनावस्था में थीं, और नाव खेने का कार्य करती थीं। महाभारत में आदिपर्व में सत्यवती स्वयं महर्षि व्यास के जन्म का वर्णन करते हुए कहती हैं कि एक दिन वह अपने नवयौवन के दिनों में उस नाव के पास गईं। और उसी समय धार्मिक श्रेष्ठ महर्षि पराशर यमुना नदी के पार उतरने के लिए आकर उनकी नाव पर चढ़े। पर उन्हें देखकर काम के वश में आ गए और उनसे पुत्र की याचना करने लगे।  महर्षि पराशर ने सत्यवती की देह से आती हुई मछली की गंध को दूर करने का वरदान दिया तथा यह भी कहा कि पुत्र के जन्म के बाद भी वह कुमारी ही रहेंगी।

फिर सत्यवती ने बताया कि मुनि ने उनसे कहा कि वह इस यमुना नदी के द्वीप पर ही उनके वीर्य से उत्पन्न इस गर्भ को छोड़कर कन्यावस्था में रहेंगी।

पराशर ने अपनी तपस्या के प्रभाव से चारों ओर कोहरा पैदा कर दिया और उसके उपरान्त चारों ओर अन्धकार उत्पन्न हो गया। सत्यवती और पराशर के इस समागम से पैदा हुए व्यास का नाम कृष्ण द्वैपायन भी था। चूंकि उनका जन्म अंधकार में वीर्याधान करने के कारण हुआ था, तो उनका वर्ण कृष्ण का हुआ, और उनका जन्म यमुना के एक द्वीप पर हुआ था, इसलिए इनका नाम कृष्ण द्वैपायन पड़ा।

महाभारत में जब सत्यवती एवं महाराज शांतनु के पुत्र बिना पुत्र के ही स्वर्ग सिधार गए तो ऐसे में कृष्ण द्वैपायन ने ही नियोग द्वारा अम्बिका और अम्बालिका के साथ नियोग विधि के माध्यम से धृतराष्ट्र तथा पांडु के जन्म द्वारा कुरू वंश को नष्ट होने से बचाया था।

महर्षि व्यास ने महाभारत की रचना की थी एवं इस कथा के माध्यम से हिन्दुओं के इतिहास का विस्तृत वर्णन उन्होंने किया है। यह कोई साधारण कार्य नहीं था। महाभारत का युद्ध भी कोई सहज युद्ध नहीं था, इस महाविनाशक युद्ध को आने वाली पीढ़ी को ज्यों का त्यों सौंपना कोई सरल कार्य नहीं था। उसे भगवान वेदव्यास ही कर सकते थे।

महर्षि व्यास ने समय समय पर यह प्रयास किए कि इस युद्ध को रोका जा सके। वह समय में आगे देख सकते थे, इसलिए जब युधिष्ठिर राजसूय यज्ञ के दौरान शिशुपाल वध के कारण आशंका से भर गए थे, तो उन्होंने भगवन वेदव्यास से प्रश्न किया था कि क्या उत्पातों का भय दूर होगा? उस पर भगवान वेदव्यास ने कहा था कि तेरह वर्षों की अवधि तक उत्पातों का भयानक फल होगा और उसका परिणाम सम्पूर्ण क्षत्रियों का विनाश होगा। उन्होंने युधिष्ठिर से स्पष्ट कह दिया था कि उनके और दुर्योधन के अपराध हेतु तथा भीम एवं अर्जुन के बल से सम्पूर्ण क्षत्रिय युद्धभूमि में इकट्ठे होकर विनष्ट हो जाएंगे।

महाभारत युद्ध जब दुर्योधन की हठ तथा धृतराष्ट्र के पुत्र मोह के कारण निश्चित हो गया था तब भी इस महाविनाश से बचाने के लिए भगवन वेदव्यास ने धृतराष्ट्र से अनुरोध किया था। वह आने वाले महाविनाश को देख रहे थे। परन्तु यह दुर्भाग्य ही था कि उनकी बात नहीं सुनी गयी।

महर्षि व्यास ने कुरुक्षेत्र की युद्ध भूमि में भगवान श्री कृष्ण के मुखारविंद से श्रीमदभगवतगीता का श्रवण किया, और जिसे अर्जुन और संजय के अतिरिक्त और कोई नहीं सुन सका था। संजय को प्रदत्त दिव्यदृष्टि के माध्यम से संजय को भी गीताज्ञान प्राप्त हुआ।

आज जब पश्चिमी वाम विमर्श आगे बढ़कर हिन्दू समाज को नीचा दिखाने के लिए हर संभव प्रयास कर रहा है तो ऐसे में महर्षि व्यास के जन्म की कथा ऐसे कई झूठे विमर्शों को तोड़ती है। जिसमें यह कि स्त्री के विवाह से पूर्व के पुत्र का आदर नहीं था। जबकि कृष्णद्वैपायन व्यास का आदर पूरी महाभारत में तो है ही, इसके साथ आज तक आषाढ़ पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा के नाम से ही मनाया जाता है। और दूसरा विमर्श यह भी इस उदाहरण से टूटता है कि स्त्री का आदर कम हो जाता है। न ही सत्यवती का आदर कृष्ण द्वैपायन का रहस्य बताने के बाद कम हुआ, और न ही कुंती का आदर कर्ण के जन्म का रहस्य बताने के बाद कम हुआ था।

हाँ, जैसे जैसे समय के साथ पवित्र काम के स्थान पर विकृत काम का प्रभुत्व होता गया, और जैसे जैसे वह कबीलाई और पिछड़ी यूरोपीय कल्चर से सजी पीढ़ी सामने आने लगी जिसके लिए काम का अर्थ मात्र देह की संतुष्टि ही थी और स्त्री को उपभोग मानने वाली पीढ़ी सामने आने लगी, उसके बाद संबंधों का अर्थ तो बदला ही, काम भी विकृत होता गया और विकृत विमर्श हिस्सा बन गया।

इसके साथ हिन्दू दृष्टि भी उसी विकृत विमर्श का हिस्सा बन गयी, एवं हिन्दू धर्म की पवित्र स्वतंत्रता को भूलकर, उसे तजकर एक ऐसी आज़ादी की चाह में आगे बढ़ गयी, जहां भटकाव के अतिरिक्त कुछ नहीं है!

इसीलिए आज आवश्यकता है कि हम व्यास पूर्णिमा के दिन भगवान वेदव्यास को स्मरण करें, और उनके ग्रन्थ महाभारत को पढ़ें, उसके जीवनमूल्यों को आत्मसात करें, धर्म और अधर्म के अंतर को स्पष्ट समझ सकें और स्थितियों के अनुरूप कदम उठाने में सक्षम हो सकें।


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