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Monday, March 16, 2026

बिहार की मतदाता सूची में विदेशी नागरिकों के नाम: क्या लोकतंत्र की नींव हिल रही है?


मतदाता सूची संशोधन के दौरान नेपाल, बांग्लादेश और म्यांमार के नागरिकों के नाम सामने आने से बिहार की राजनीति में तूफान, चुनाव आयोग पर उठे सवाल।

बिहार में आगामी विधानसभा चुनावों से पहले मतदाता सूची की स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) प्रक्रिया ने राजनीतिक तापमान बढ़ा दिया है। इस प्रक्रिया के तहत सामने आया है कि बड़ी संख्या में नेपाल, बांग्लादेश और म्यांमार के नागरिक राज्य के मतदाता सूची में पंजीकृत हैं। चुनाव आयोग ने 24 जून को निर्देश जारी कर कहा था कि 26 जुलाई तक विशेष पुनरीक्षण चलेगा और 1 अगस्त के बाद जांच पूरी कर, 30 सितंबर को अंतिम सूची प्रकाशित की जाएगी। इसके तहत 7.8 करोड़ से अधिक मतदाताओं की नागरिकता की जांच की जा रही है।

इस महाभियान में 77,000 से अधिक बूथ लेवल ऑफिसर (BLO), सरकारी कर्मचारी और राजनीतिक कार्यकर्ता लगे हुए हैं। नए और पुराने दोनों मतदाताओं को भारतीय नागरिकता के प्रमाण के रूप में पहचान पत्र और दस्तावेज देने को कहा गया है। इसी प्रक्रिया में यह खुलासा हुआ कि कई विदेशी नागरिक मतदाता सूची में शामिल हो गए हैं।

बीजेपी आईटी सेल के प्रमुख अमित मालवीय ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए विपक्षी दलों—आरजेडी, कांग्रेस, वामपंथी दलों पर आरोप लगाया कि वे वोट बैंक के लिए विदेशी नागरिकों को मतदाता सूची में शामिल करवाने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने पत्रकारों, यूट्यूबरों, एनजीओ और तथाकथित ‘लीगल एक्टिविस्ट’ पर भी चुनाव आयोग पर दबाव बनाने का आरोप लगाया।

वहीं AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने चुनाव आयोग पर हमला बोलते हुए कहा कि यह शर्मनाक है कि एक संवैधानिक संस्था ‘सूत्रों’ के माध्यम से जनता से संवाद कर रही है। उन्होंने सवाल उठाया कि चुनाव आयोग को नागरिकता तय करने का अधिकार किसने दिया? ओवैसी का तर्क है कि यह प्रक्रिया सबसे गरीब तबकों पर सीधा हमला है, जिनके पास जरूरी दस्तावेज़ नहीं होते और जो इस प्रक्रिया में स्वतः ही बाहर हो सकते हैं।

यह मुद्दा अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है। टीएमसी की महुआ मोइत्रा, आरजेडी के मनोज झा, कांग्रेस के केसी वेणुगोपाल और एनसीपी-एसपी की सुप्रिया सुले सहित कई नेताओं ने याचिकाएं दायर कीं। हालांकि सर्वोच्च न्यायालय ने चुनाव आयोग को SIR प्रक्रिया जारी रखने की अनुमति दी, लेकिन यह निर्देश दिया कि आधार कार्ड, वोटर आईडी और राशन कार्ड जैसे आम दस्तावेजों को स्वीकार किया जाए। चुनाव आयोग ने अपनी ओर से स्पष्ट किया कि ये दस्तावेज पहले से प्रक्रिया में शामिल हैं, लेकिन केवल इनसे नागरिकता सिद्ध नहीं होती।

दरअसल, यह पूरा विवाद नागरिकता, पहचान और लोकतांत्रिक अधिकारों के बीच के टकराव को उजागर करता है। बीजेपी की यह दलील कि विदेशी नागरिकों को वोटिंग का अधिकार नहीं होना चाहिए, सतही रूप से सही लग सकती है। लेकिन जब यह नागरिकता सिद्ध करने की प्रक्रिया गरीबों, दलितों, मुस्लिमों और अन्य हाशिए पर खड़े लोगों के खिलाफ एक औजार बन जाए, तो इसका लोकतंत्र पर गंभीर असर पड़ता है।

बिहार की तरह ही अब चुनाव आयोग ने पश्चिम बंगाल, असम, केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी में भी इस प्रक्रिया को शुरू करने की बात कही है, जहां अगले वर्ष मई में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। इन राज्यों में भी पहचान और नागरिकता पहले से संवेदनशील मुद्दे रहे हैं। खासकर असम में NRC की यादें अभी भी ताजा हैं, जिसमें लाखों लोगों को सूची से बाहर कर दिया गया था, चाहे वे दशकों से वहां रह रहे हों।

चिंता की बात यह है कि कहीं मतदाता सूची संशोधन, NRC की तरह, चुनाव पूर्व एक नया सामाजिक विभाजन का उपकरण न बन जाए। दस्तावेज़ आधारित नागरिकता की प्रक्रिया, भारत जैसे देश में, जहां करोड़ों लोगों के पास जन्म प्रमाणपत्र या जमीन से जुड़े कागज नहीं हैं, बेहद भेदभावपूर्ण साबित हो सकती है।

चुनाव आयोग एक संवैधानिक संस्था है, जिसे निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनाव सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी दी गई है। उसके निर्णयों में पारदर्शिता, समयबद्धता और जवाबदेही आवश्यक है। 30 सितंबर को बिहार की अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित होने जा रही है, और यह न केवल राज्य बल्कि पूरे देश के लोकतांत्रिक स्वास्थ्य की परीक्षा होगी।

यह जरूरी है कि चुनाव आयोग किसी भी राजनीतिक दबाव या पक्षपात से ऊपर उठकर केवल कानून और संविधान के अनुसार कार्य करे। साथ ही यह भी ध्यान दे कि कोई भी भारतीय नागरिक, विशेषकर गरीब और वंचित वर्ग, दस्तावेज़ों की कमी के कारण अपने सबसे बुनियादी अधिकार वोट देने के अधिकार से वंचित न हो जाए।

यदि लोकतंत्र का अर्थ ही समावेशन है, तो हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि संशोधन की प्रक्रिया सुधार का माध्यम बने, न कि एक नया विभाजन रचने का हथियार।

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Dr. Prosenjit Nath
Dr. Prosenjit Nath
The writer is a technocrat, political analyst, and author. He pens national, geopolitical, and social issues. His social media handle is @prosenjitnth.

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