Will you help us hit our goal?

29.1 C
Varanasi
Friday, September 24, 2021

भाजपा को घेरने के चक्कर में फंसे वामपंथी और कांग्रेसी विचारक और उनके जाल में फंसे राष्ट्रवादी?

एनसीईआरटी में पुस्तकों की विषयवस्तु को लेकर हिन्दुपोस्ट लगातार अपनी आवाज उठा रहा है।  जिस प्रकार तथ्यगत छेड़छाड़ की गयी है, उसके विषय में हम लगातार लिख रहे हैं। परन्तु कल एक मजेदार वाकया हुआ, जिसमें भाजपा अर्थात राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ अर्थात वामपंथियों के अनुसार नारंगी गैंग को अश्लील बताने के चक्कर में खुद ही घिर गए।  एनसीईआरटी की पाठ्यपुस्तकों में कक्षा एक की हिंदी की पुस्तक रिमझिम में एक कविता है, आम पर!  कविता कुछ इस प्रकार है:

छ साल की छोकरी,

भर लाई टोकरी

टोकरी में आम हैं,

नहीं बताती दाम है

दिखा-दिखाकर टोकरी,

हमें बुलाती छोकरी,

हमको देती आम है,

नहीं बुलाती नाम है

नाम नहीं अब पूछना

हमें आम है चूसना!”

यद्यपि अपने मूल में यह कविता छ पंक्तियों की थी, इसकी अंतिम दो पंक्तियों को बदला गया है. मूल कविता थी:

छै साल की छोकरी,
सिर पर रखे टोकरी।
नहीं बताती दाम है,
नहीं बताती नाम है,
दाम-नाम क्या पूछना,
हमें आम है चूसना!

अब इस कविता पर बवाल मचा है। यद्यपि यह सत्य है कि यह कविता कोई सार्थक सन्देश नहीं देती है, परन्तु जिस प्रकार से इस कविता पर अश्लील होने के आरोप लग रहे हैं, वह बौद्धिक विलासिता का एक जीता जागता उदाहरण है।  इस कविता पर ट्विटर पर कल शोर मचना आरम्भ हुआ। कि यह कविता अश्लील है। यह कविता कहाँ से अश्लील हो सकती है?  हाँ, यह कविता निरर्थक है, इसमें कोई संदेह नहीं है। इस कविता से बच्चे कुछ सीख नहीं पा रहे हैं। यह भी सत्य है। पर इस कविता के बहाने पूरे हिन्दू समाज को पिछड़ा घोषित करने का जो षड्यंत्र आरम्भ हुआ, उसमें कथित राष्ट्रवादी भी जाने अनजाने शामिल हो गए।

छतीसगढ़ कैडर के 2009 बैच के आईएएस ऑफिसर अवनीश शरण ने इस कविता को साझा करते हुए आपत्ति दर्ज की कि “यह किस सड़कछाप कवि की रचना है? कृपया इसे पाठ्यपुस्तक से बाहर करें।”

हालांकि उन्हें उत्तर भी मिले और एक यूजर ने उन्हें कवि श्री रामकृष्ण खद्दर के विषय में बताया कि वह आज़ादी के समय के बाल कवि थे।

वही एक यूजर ने कहा कि सारा मुद्दा सोच का है, आम चूसने में कोई अश्लीलता या नकारात्मकता नहीं दिखाई देती है।

अब जब यह ट्विटर पर शोर हो और फेसबुक पर न हो, तो यह समझ नहीं आता। इस कविता पर प्रख्यात अभिनेता आशुतोष राणा ने भी प्रश्न उठाए और उन्होंने अपनी फेसबुक पोस्ट पर प्रश्न उठाते हुए लिखा कि

एक तरफ़ हम हिंदी भाषा के गिरते स्तर और हो रही उपेक्षा पर हाय तौबा मचाते हैं और दूसरी ओर इतने निम्न स्तर की रचना को पाठ्यक्रम का हिस्सा बना देते हैं ? ऐसी रचना को निश्चित ही पाठ्यक्रम में नहीं रखा जाना चाहिए क्योंकि जैसे सिंह की पहचान उसकी दहाड़ होती है हाथी की पहचान उसकी चिंघाड़ होती है वैसे ही मनुष्य की पहचान उसकी भाषा होती है।

हमें यह स्मरण रखना चाहिए की बच्चे राष्ट्र की आत्मा होते हैं यही हैं जिनके मस्तिष्क में अतीत सोया हुआ है, यही हैं जिनके पहलुओं में वर्तमान करवटें ले रहा है और यही हैं जिनके क़दमों के नीचे भविष्य के अदृश्य बीज बोय जाते हैं।  

आशुतोष राणा की फेसबुक पोस्ट

आशुतोष राणा की यह बात एकदम सही है कि जैसे हाथी की चिंघाड़ उसकी पहचान होती है वैसे ही मनुष्य की पहचान उसकी भाषा होती है। मगर एक प्रश्न उनसे यह भी है कि जब उनकी पत्नी एक फिल्म बनाती हैं “त्रिभंग”, और उसमें हर वाक्य पर लगभग गाली डलवाती हैं, तो क्या उनसे यह प्रश्न नहीं पुछा जाना चाहिए कि भाषा वहां पर भी ठीक करा दें क्योंकि स्त्रियाँ भी राष्ट्र की आत्मा होती हैं। मगर वह अपनी पत्नी की उस फिल्म का जिसमे जमकर गालियाँ दी गई हैं, उसकी प्रशंसा करते हैं और यहाँ तक कि “पगलैट” फिल्म में भी जहां जहां हिन्दू धर्म और संस्कृति पर बार बार फालतू प्रश्न उठाए हैं, वह कुछ नहीं बोलते!

खैर, वह अपने क्लिष्ट शब्दों वाली रचना भी लिख देते हैं कि ऐसी कविताएँ होनी चाहिए, जरूर होनी चाहिए, मगर वह कक्षा एक के बच्चों के लिए और उन बच्चों के लिए नहीं हो सकती हैं, जो अभी अक्षरों से परिचित ही हो रहे हैं।  उन्हें तुकबंदी की रचना चाहिए होती है।

और यह भी देखना होगा कि अचानक से ही केवल इस कविता पर विवाद इसलिए तो कांग्रेस और वामपंथी विचारकों ने नहीं आरम्भ किया जिससे असली मुद्दे दब जाएं और साथ ही नई शिक्षा नीति में जो पुस्तके आ रही हैं, वह भी उन्हीं के अनुसार आएं! क्या यह दबाव बनाने की राजनीति है? और राष्ट्रवादी इसमें उनके हाथ के टूल बन गए?

क्या इन विचारकों ने आज तक उस झूठे इतिहास पर प्रश्न उठाए जिन्हें लेकर राष्ट्रवादी बार बार प्रश्न उठा रहे हैं?

इस कविता पर विवाद हुआ और इसे भाजपा और आरएसएस समर्थक कविता बता दिया गया और फिर एक प्रगतिशील विचारक चंचल भू ने राजनीतिक आधार पर इस कविता की आलोचना की और फिर उनकी इस पोस्ट पर भाजपा और आरएसएस को गाली देने वालों की होड़ लग गयी।  और यह कहा जाने लगा कि भाजपाइयों से उम्मीद भी क्या की जा सकती है? और यह कहा जाने लगा कि इस समय छिछोरा बोध ही सिर चढ़ा हुआ है।

परन्तु शिक्षा क्षेत्र में कार्य करने का दावा करने वाले कई लोगों को यह पता ही नहीं था कि इस कविता को उनकी प्रिय सोनिया गांधी की सरकार द्वारा सम्मिलित किया गया था।  और इस समय स्त्री विमर्श लाने वाली फेमिनिस्ट, अपनी प्रिय सोनिया गांधी की सरकार में इस कविता को देख नहीं पाई थीं?

इस कविता को अश्लील कहकर घेरने वाली कवयित्री सोनी पाण्डेय, जिन्हें कांग्रेसी विचारक ने महान बताया था, वह इतनी महान हैं कि वह प्रगतिशीलता के नाम पर भाजपा के नेताओं को कोसती हैं और उसी योगी सरकार से सम्मान लेती हैं, वह भी स्व-अनुशंसा वाला!

इन दिनों राहुल गांधी को देश के लिए सबसे जरूरी नेता बताने वाली वामपंथी विचारों वाली फेमिनिस्ट ने इस मुद्दे को पूरी तरह से स्त्री विमर्श की ओर मोड़ दिया और भाजपाइयों के बहाने पूरे पुरुष समाज को कठघरे में खड़ा कर दिया। क्या हम लोग बालश्रम का समर्थन करते हैं? क्या हिन्दू लड़के बलात्कारी हैं?

कितने परिवारों में ऐसे बच्चे पाए जाते हैं जो साथी की वजाईना में पेन्सिल डालें? जैसा यह फेमिनिस्ट दावा कर रही हैं?

हालांकि इस कविता के नीचे जो बातें लिखी हुई हैं कि बच्चों से बातचीत करें, और यदि वह ऐसे किसी बच्चे को जानते हैं जो बाज़ार में सामान बेचता है, तो पता लगाएं कि वह स्कूल जाता है या नहीं। यदि नहीं जाता है तो स्कूल में उसका नाम लिखवाने के लिए तुम कैसे मदद करोगे? परन्तु इन पंक्तियों को किसी ने देखा ही नहीं है।

जबकि स्त्रीवादी लेखिका मैत्रेयी पुष्पा ने भी इस कविता में  स्त्री विमर्श घसीटे जाने का विरोध किया।

अंतिम दो पंक्तियों से समस्या लोगों को सकती है, परन्तु आम चूसना जैसे शब्द ग्रामीण अंचल में प्रचलित हैं। यह जिस परिवेश के हिसाब से उसके हिसाब से देखना चाहिए।  यह भी देखना होगा कि यह कविता किस कालखंड में लिखी गयी थी। और छोकरी शब्द का अर्थ वाकई कवि ने किस परिप्रेक्ष्य में लिया है।

जिन कवि राम कृष्ण खद्दर ने यह कविता लिखी थी उनका जन्म 1916 में हुआ और निधन 12 फरवरी 1975 को हो गया था।

हालांकि इस कविता पर शोर आरम्भ हुआ था भाजपा को कोसने के लिए, पर जैसे ही यह पता चला कि यह कविता तो वर्ष 2006 से ही पाठ्यक्रम में है, इन क्रांतिकारी लोगों के सुर बदल गए और फिर वह पूरे ग्रामीण जीवन, जो कि भारत की रीढ़ है और जो अभी तक इनकी क्रान्ति और परिवार तोड़ो की राजनीति से दूर है, वह इनके निशाने पर आ गया।

इन्होने इस कविता के बहाने पूरे लोक को तोड़ने का विमर्श आरम्भ कर दिया और पूरा राष्ट्रवादी खेमा इनका शिकार हो गया। राष्ट्रवादी लोग भी इन्हीं दो शब्दों पर शोर मचाने लगे, बिना यह जाने कि यह कविता कब लिखी गयी थी और यह किसके लिए है? स्पष्ट है कि यह कविता एक कुलीन वर्ग के लिए नहीं है, यह उस समाज के लिए है जो अभी भी अपने माता पिता के कामों में हाथ बंटाना पसंद करता है।

बाल श्रम का उदाहरण देने वाले लोग कभी भी रियल्टी शोज़ में बच्चों के बालश्रम पर आवाज़ नहीं उठाते हैं? क्या वह बाल श्रम नहीं है?

परन्तु जो लोग इस कविता को समाज विरोधी या बाल श्रम का आरोप लगा रहे हैं, वह यह नहीं देख रहे कि इसमें दाम नहीं लिए गए हैं, अर्थात बलात श्रम नहीं है और न ही कोई नाम पूछा गया है।

जब प्रगतिशील लेखक अशोक पाण्डेय लिखते हैं कि इस देश में बाल श्रम अपराध है और छः साल की बच्ची का सर पर आम की टोकरी (असल में खाँची) लादे फ़ोटो किसी को व्यथित नहीं करता! लोग अर्थ में उलझ गए लेकिन यह नहीं सोच सके कि इस ज़रा सी बच्ची को इस रूप में चित्रित कर बच्चों के ज़ेहन तक पहुँचाना कैसे बाल श्रम को normalise कर रहा है?

हर कोई जानता है कि इस देश में बालश्रम अपराध है, पर यह कविता तो कांग्रेस ने ही शामिल की थी। अशोक पाण्डेय जी कांग्रेस से प्रेम करते हैं एवं राहुल गांधी जी को सलाह भी देते हैं, जैसा उनके इस ट्वीट से प्रतीत होगा है कि राजीव गांधी जी की छवि खराब करने का षड्यंत्र उनके आसपास मौजूद उन लोगों ने रचा था, जिन पर वह सबसे ज्यादा भरोसा करते थे। राहुल गांधी को यह हमेशा याद रखना होगा।

तो क्या वह पहले कांग्रेस की सरकार को यह नहीं बता पाए थे कि यह कविता बालश्रम को प्रोत्साहित कर रही है? मजे की बात यह है कि कविता और विषय को जाने बिना राष्ट्रवादी लोग इस पूरे विवाद में कूद पड़े! और वह कूदे तो थे कांग्रेस को और एनसीईआरटी को घेरने के लिए और अपनी यह शिकायत सरकार से करने के लिए कि अभी तक यह आपत्तिजनक शब्द क्यों हैं? क्योंकि उनकी आपत्ति भी छोकरी शब्द को लेकर है परन्तु वह कांग्रेस समर्थक विचारकों द्वारा उठाए गए विमर्श का शिकार बन गए और अनजाने ही अपने ही समाज और गाँवों के विरोध में जाकर खड़े हो गए।

राष्ट्रवादी हिन्दुओं को हमेशा यह याद रखना होगा कि लड़ाई में वह किसके साथ जाकर खड़े हैं।  बात किसी विशेष पार्टी की नहीं है, परन्तु जो विचारधारा आपके परिवार की परम्परा पर ही प्रहार कर रही हो उसके साथ जाकर खड़े हो जाना कहाँ की बुद्धिमानी है? लोक के विरोध में चले जाना कहाँ की बुद्धिमानी है? कविता निरर्थक है, यह सत्य है, परन्तु इस कविता के विरोध में और सरकार के विरोध में क्या आप नक्सलियों का समर्थन लेने वालों के पक्ष में जाकर खड़े हो जाएँगे?

जो गाँव अभी तक अपनी परम्पराओं को सहेजे हुए हैं, उन्हें निशाना बनाने वालों के साथ खड़े हो जाना तो बुद्धिमानी नहीं है!

हालांकि इस कविता के विषय में वर्ष 2018 में समझाया गया था

और इतना ही नहीं आज एनसीईआरटी की ओर से सफाई आई है

साथ ही इस कविता के विषय में एक शिक्षक के विचार भी यहाँ पढ़े जा सकते हैं

यह पूरा विवाद जहाँ भाजपा विरोध के उद्देश्य से आरम्भ हुआ था, वह कांग्रेस विरोध की तरफ मुड़ते मुड़ते अंतत: हिन्दू समाज के विरोध में जाकर खड़ा हो गया।

क्लीन एनसीईआरटी का प्रश्न ठीक है, परन्तु यह देखना होगा कि हमारा विरोध तथ्यों की तोड़ मरोड़ पर अधिक हो क्योंकि हिन्दुओं को हानि उससे अधिक है और इस विवाद के षड्यंत्र के दूसरे पक्ष पर भी बात करेंगे!

फिर यह कह सकते हैं कि यह कविता निरर्थक है परन्तु अश्लीलता की परिभाषा में फंसकर यदि देशज शब्दों को हिंदी से दूर करेंगे तो एक नए षड्यंत्र फंसेंगे

और राष्ट्रवादी हिन्दुओं को यह सदैव स्मरण रखना चाहिए कि कहीं वह किसी जाल में तो नहीं फंस रहे?


क्या आप को यह  लेख उपयोगी लगाहम एक गैर-लाभ (non-profit) संस्था हैं। एक दान करें और हमारी पत्रकारिता के लिए अपना योगदान दें।

हिन्दुपोस्ट अब Telegram पर भी उपलब्ध है. हिन्दू समाज से सम्बंधित श्रेष्ठतम लेखों और समाचार समावेशन के लिए  Telegram पर हिन्दुपोस्ट से जुड़ें .

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Latest Articles

Sign up to receive HinduPost content in your inbox

We don’t spam! Read our privacy policy for more info.