अमेरिका के विशेषज्ञों की माने तो भारतीयों में पायी जाने वाली ‘ईमोशनल इंटेलिजेंस (भावनात्मक बौद्धिकता )’ और ‘ मैनेजमेंट स्टाइल (प्रबंधन शैली)’ अन्य लोगों से अलग है। मानवीय मूल्यों से ओतप्रोत, वे वैश्विक बाजार की बारीकियों को पहचानते हैं। ‘कमांड और कंट्रोल’ के स्थान पर सहयोग और सहानुभूति को आगे रखते हैं। विपरीत परिस्थिति में मानसिक संतुलन बनाए रख जरूरत पड़े तो जिसे कहते हैं ‘जुगाड़’ वो भी निकाल लेते हैं। इस गुणवत्ता के पीछे वो परस्पर एकात्म परिवार है जिसमें एक दूसरे के सुख-दुख-प्रसन्नता-उपलब्धि-संपन्नता को प्रत्येक सदस्य अपना मानकर जीता है, साथ-साथ बड़ा होता। और संबंधों को खूब निभाना जनता है ।
और परिणाम सामने है , लिवाइस के सीएफओ (चीफ फाइनेन्स ऑफिसर) हरमीत सिंह हैं; तो यूनिलीवर के श्रीनिवास; टेस्ला के वैभव तनेजा ; एप्पल के केवन पारेख ; और दुनिया की सबसे अमीर सीईओ हैं जयश्री उलाल ! एडोब, आईबीएम , यूट्यूब और अन्य वैश्विक प्रतिष्ठानों के शीर्ष पर मौजूद भारतीयों को जोड़ दें तो ये सूची उम्मीद से काफी लंबी हो सकती है।
बाजार की ये मांग है जो कि भारत की प्रतिभाओं में उम्मीद को जगा देते है। कोई आश्चर्य नहीं, आज अमेरिका में 70 प्रतिशत से अधिक भारतीय ही हैं, जो एच-1बी वीज़ा अर्जित करते हैं। बदली स्थिति में अमेरिका की कम्पनियों ने भी अब अपने मार्ग को चुन लिया है। गूगल विशाखापटनम में $15 बिलियन का एआई हब खोलने जा रहा है, जिसमें 1 लाख नौकरियां की जरूरत पड़ेगी। माइक्रोसॉफ्ट ने भारत के अंदर $17.5 बिलियन निवेश किये हैं; तो ओपन एआई नई दिल्ली में अपना पहला ऑफिस खोलने जा रहा है। अमेज़न $35 बिलियन का निवेश करने वाला है , तो एप्पल, मेटा , नेटफ्लिक्स, गूगल हैदराबाद और बैंगलोर में अपने केंम्पस खोलने के लिए तैयार हो चुके हैं। इसको लेकर 32000 नए नौकरियां जुडने जा रही हैं। पहले कंपनियां भारत से अमेरिका बुलाती थीं, ब्रेन-ड्रेन (प्रतिभा-पलायन) होता था। अब ये काम भारत में ही होगा।
भारत में उपलब्ध रोजगार की जहां तक बात है, तो कुल 74% कम्पनियाँ ऐसी हैं जो जूझ रहीं उस टैलेंट को पाने के लिए जिसकी उन्हें जरूरत है। और जिसकी उम्मीद में उन्होंने भारत को चुन लिया है। 2030 तक देश में 2400 से ज्यादा ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर (जीओसीसी )अपना ठिकाना बना चुके होंगे , जहां 28 लाख नौकरियों की जरूरत पड़ेगी ।
और फिर देश के बाहर भी भारतीय प्रतिभाओं के लिए संभावनाएं कोई कम उत्साहवर्धक नहीं । रूस आज अपने सबसे बड़े युवा-संसाधन के संकट से गुजर रहा है। कारण है, उसके शरीर को जकड़ कर रख देने वाली ठंड से युक्त विशाल क्षेत्र के चलते नैसर्गिक निम्न जन्म दर। ऊपर से अब यूक्रेन-युद्ध जिसमें बड़ी संख्या में युवा आबादी का दोहन हुआ। जबकि आज उसको 11 मिलियन ( 1 करोड़ 10 लाख) कामगारों की जरूरत है, और आंतरिक सुरक्षा से जुड़े कारणों से वो सीमा से लगे सेंट्रल एशिया पर अपनी निर्भरता को दूर करना चाहता है।
और अब उसने भारत तरफ रुख किया है। इससे वो भारत के रुपयों का भी बेहतर उपयोग कर पाएगा, रुपए में होने वाली क्रूड ऑइल-ट्रैड में मदद मिलेगी । पिछले वर्ष दिसंबर में पुतिन का देश में आना हुआ, और दोनों देशों में बीच एक डील पर सहमति बनी , लेबर-माइग्रैशन को सरल किया गया। आज बड़ी संख्या में लगभग 2 लाख से ऊपर भारतीय कामगार रूस स्थित निर्माण स्थल ; रक्षा उत्पादन इकाईयां ; शिप-बिल्डिंग ; हेवी इंडस्ट्री ; होटल-रेस्टोरेंट, मुंसिपल सर्विसेस ; हेल्थ-केयर इत्यादि में अपनी कौशल युक्त सेवाएं प्रदान कर रहे हैं। इस आपूर्ति को लेकर रीक्रूट्मेंट एजेंसीयों ने चेन्नई में अपने प्रशिक्षण केन्द्र स्थापित किये हैं, जहां तकनीकी ज्ञान के साथ रूसी भाषा भी सिखाई जाती है।
आज खाड़ी युद्ध में ट्रैड-रूट स्ट्रैट ऑफ होरमुज भी जद में आ चुका है। उल्लेखनीय है कि इराक, सऊदी, यूएई , कुवैत से इसी रूट से 40% तेल भारत को आता है। इसको ध्यान में रखते हुए परिष्कृत पेट्रोल/डीज़ल के निर्यात पर अंकुश लगाने की योजना पर मंथन का दौर शुरू हो चुका है, जिससे घरेलू आपूर्ति पर असर न पड़े। साथ ही एलएनजी की सप्लाइ को लेकर भी इसी प्रकार के कदम उठाए गए हैं। दूसरी और रूस ने स्पष्ट कर दिया है कि इस कमी जहां तक हो सकेगा वो पूरी करने के तत्पर है।
ऐसी स्थिति में भारत से कुशल-श्रम शक्ति का निर्यात व्यापार संतुलन को स्थापित करने में निश्चित रूप से बड़ी भूमिका निभाने के काम आएगा।
