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Wednesday, November 30, 2022

“द व्हाईट मैन’स बर्डन” की मानसिकता और मंदिरों का ध्वंस!

कुछ वर्ष पहले अंडमान में प्रवेश करते हुए, एक ईसाई रिलिजन प्रचारक की जहरीले तीरों से मारकर हत्या कर दी गयी थी और यह हत्या वहीं की जनजातियों ने की थी। सबसे रोचक यह था कि उन द्वीपों में सहज प्रवेश ही संभव नहीं था और वह द्वीप बाहरी दुनिया से संरक्षित द्वीप है। फिर ऐसा क्या हुआ अचानक से कि अमेरिकन मिशनरी जॉन चाऊ सेंटनलीज़ आदिवासियों को जबरन ईसाई बनाने के लिए पहुंच गया?

उसने एक पोस्ट लिखी थी कि मैं जीसस का सन्देश उन तक पहुँचना चाहता हूँ. पर प्रतिबंधित द्वीपों पर क्यों? क्यों एक जिद्द थी कि उन्हें सुधारना है? और सुधारने का अधिकार उन्हें किसने दिया और सनक क्यों? क्यों शेष लोगों को यह मिशनरी चैन से जीने नहीं देते? और क्यों वह चैन से हिन्दुओं को उनके मंदिरों में जाने नहीं देते, मंदिरों पर उनकी दृष्टि क्यों है?

इसके विषय में आइये आज कुछ समझते हैं:  

एक कविता है रुडयार्ड किपलिंग की The white man’s burden। यह अंग्रेजी साम्राज्यवाद का प्रचार करने वाली कविता है, पर इसे एक बार पढ़ना आवश्यक होगा, क्योंकि तभी हम समझ पाएंगे कि दक्षिण में इन दिनों मंदिरों पर जो हमले हो रहे हैं, उसके पीछे की मनोवृत्ति क्या है और जो अपने मजहब का प्रचार करने के लिए हिन्दू धर्म की बुराई करते हैं, उसके पीछे क्या सोच है और क्या मानसिकता है, वह केवल इस कविता में दिख जाती है।

यह साम्राज्यवाद की कविता नहीं थी बल्कि यह रिलिजन सुप्रीमसी की कविता है। जिसमें एक रिलिजन यह कह रहा है कि गोरे लोगों की पीड़ा समझिये!

वामपंथियों ने इसे श्वेत साम्राज्यवाद कहा, परन्तु यह श्वेत साम्राज्यवाद न होकर रिलीजियस था, एकदम वही मजहबी साम्राज्यवाद था, जो उन मौलवियों की बातों में झलकता है कि “जन्नत तो केवल मुस्लिमों के लिए है। इसलिए जन्नत चाहिए तो इस्लाम में आना ही होगा।”

रुडयार्ड लिखते हैं कि गोरे लोगों पर जो बोझ है उसे समझना होगा, उन पर “आधे शैतान और आधे बच्चों” को सभ्य बनाने की जिम्मेदारी है। उन पर यह उत्तरदायित्व है कि वह गाली सुनते हुए भी उन लोगों को सभ्य बनाएं, जो सभ्य होना नहीं चाहते हैं। वह कहते हैं कि यह गोरे लोगों का फर्ज है कि अपने बेटों को निर्जन स्थानों पर भेजें।

फिर वह कहते हैं कि दूसरे का लाभ चाहें, और दूसरे के फायदे के लिए कार्य करें!”

ब यही वह बिंदु है, जिसके आधार पर आज ईसाई मिशनरी, अयोध्या जैसे स्थानों पर भी आकर अपने इस जबरन “भलाई” के कामों को कर रही हैं। यह गोरे अर्थात ईसाइयों का एक फर्ज है, जो उन्हें करना है। यह बाध्यता है उनके रिलिजन की।

यह बाध्यता इसलिए है क्योंकि यह उनका श्रेष्ठतावाद है जो उन्हें बार बार उन लोगों को सभ्य बनाने के लिए प्रेरित करता है, जो उनके अनुसार सभ्य नहीं हैं। यह कहीं से भी साम्राज्यवाद नहीं था, यह अपने रिलिजन के अनुसार पूरे विश्व को बनाने की मानसिकता थी और अभी तक है।

परन्तु यह कविता साम्राज्यवाद की कविता कैसे हो गयी? इसमें किसके साम्राज्य की बात कही गयी है? आखिर गोरे लोग किसके साम्राज्य की बात कर रहे हैं? वामपंथियों ने इसकी निंदा यह कहकर तो की कि यह श्वेत साम्राज्यवाद की कविता है, परन्तु उन्होंने यह नहीं बताया कि यह ईसाई सफेद साम्राज्यवाद की कविता है। यह कविता उस श्रेष्ठता बोध को बताती है, जो उन गोरे लोगों में बसा हुआ है, जो इस पूरी दुनिया में केवल और केवल अपने रिलिजन का प्रचार चाहते हैं। जो इसकी चाह लिए वर्षों से भारत में लगे हुए हैं।

18 वीं शताब्दी में अब्बे जे ए डुबोइस (Abbe J.A. Dubois) नामक एक फ्रांसीसी पादरी 1792 ई. में भारत आया था।

उसने 30 वर्षों तक तमिलनाडु के एक गाँव में रहकर भारतीय समाज का गहन अध्ययन किया। उसने एक पुस्तक लिखी थी, Hindu manner customs and ceremony। इस पुस्तक में जो लिखा है, उसी का विस्तार है रुडयार्ड किपलिंग की वह कविता। इस पुस्तक में वह प्राक्कथन में लिखता है कि भारत में बहुत मंदिर हैं, मंदिर ही मंदिर हैं। पूरा का पूरा देश भ्रष्ट है और लोगों ने अपने दिलों के दुराचार के अनुसार ही अपने आप धर्म बना लिए हैं। मगर इससे कोई फर्क नहीं पड़ता, अब ग्रीस और रोम के इतने देवताओं का क्या हुआ? वह एक खोखले सपने की तरह उड़ गए हैं। अब हमें प्रभु से प्रार्थना करनी है कि “सत्य की मशाल अर्थात torch of truth” गंगा के किनारे बसे देशों में जले। इसमें कोई संदेह नहीं है कि एक दिन ऐसा आएगा जब जिद्दी हिन्दू इस रोशनी को देखेगा और फिर खुद ही अपने अँधेरे अंधविश्वासों से दूर हो जाएगा; मगर हमें निराश नहीं होना है।

एक दिन आएगा, जब भारत के बड़े बड़े मन्दिरों पर क्रॉस लहराएगा, जैसा अभी उसके कई स्थानों पर लहरा रहा है!”

फ्रांसीसी अब्बे जे ए डुबोइस ने जो सपना देखा, कि भारत के बड़े बड़े मंदिरों पर क्रॉस लहराया जाएगा, उसी को रुडयार्ड किपलिंग ने कविता के रूप में कहा, जिसे बड़ी ही धूर्तता से वामपंथियों ने साम्राज्यवाद की संज्ञा दे दी, जबकि वह वही सफेद जहर था, जो हिन्दुओं की नसों में भरा जा रहा था, सेक्युलरिज्म के नाम पर और जिसका परिणाम हमें देखने को मिल रहा है

तमिलनाडु में इन दिनों मंदिरों पर हमले हो रहे हैं,

असम में दुर्गा पूजा में ईसाई बाधा डाल रहे हैं,

और ऐसे ही तमाम हमले रोज हो रहे हैं, क्योंकि व्हाईट मैन अर्थात गोरे लोगों अर्थात ईसाईयों पर यह फर्ज है कि वह हिन्दुओं को सुधारें, वह उसी प्रकार लील जाना चाहते हैं, जैसे रोम के देवी देवताओं को लील गए थे।

वह अकेडमिक रूप से लीलना चाहते हैं, वह जातिगत विमर्श पैदा करके लील रहे हैं।  

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