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Friday, September 30, 2022

अमेरिका और यूरोपीय संघ का रूस से आयात जारी, लेकिन चाहते हैं भारत-रूस का सम्बन्ध-विच्छेद, ये दोहरा रवैया क्यों?

यूक्रेन में रूसी सैन्य अभियान ने दुनिया को दो धड़ो में बाँट दिया है। रूस और पश्चिमी शक्तियों के बीच चल रहे अघोषित संघर्ष के कारण दुनिया उथल-पुथल से गुजर रही है। हमने देखा है कि कैसे अमेरिका के नेतृत्व में पश्चिम देशो ने रूस पर प्रतिबंधों की झड़ी लगा दी है, और कैसे सामान्य रूसी नागरिको को लक्षित किया जा रहा है और राष्ट्रपति पुतिन को एक ‘दुष्ट तानाशाह‘ के रूप में चित्रित किया जा रहा है।

अगर भारत की बात की जाए तो वो इस समय पिछले कुछ दशकों के सबसे चुनौतीपूर्ण समय से गुजर रहा है। अंतर्राष्ट्रीय सम्बन्ध और कूटनीति के लिए ये बेहद जटिल समय है,क्योंकि भारत को बिना किसी खेमे में जाए एक संतुलन बनाये रखना है, और भारत यह कर भी रहा है। पहले ही दिन से भारत ने हर पटल पर यही कहा है कि दोनों पक्षों को शान्ति से इस मामले का हल निकालना चाहिए। भारत ने यह पूरी तरह से स्पष्ट कर दिया है कि वह दोनों पक्षों की सुरक्षा चिंताओं का सम्मान करता है, और इस संघर्ष को तुरंत समाप्त करने की सलाह देता है।

हालांकि, अमेरिका और उसके साथी देश ये चाहते हैं कि भारत रूसी आक्रमण की निंदा करे, वहीं दूसरी और रूस की यह आशा है कि भारत अगर उसका खुल कर समर्थन भी ना कर पाए तो कम से कम तटस्थ रुख अपनाए। भारत रूस को निराश ना करते हुए संयुक्त राष्ट्र, सुरक्षा कौंसिल और अन्य पटल पर पेश किये गए प्रस्तावों पर हुई वोटिंग से दूर रहा है, और इसी वजह से पश्चिमी देशो के निशाने पर आ गया है।

अमेरिका और पश्चिमी देश भारत पर हरसंभव दबाव क्यों डाल रहे हैं?

पिछले कुछ हफ्तों में, अमेरिका और अन्य पश्चिमी देश रूस के खिलाफ भारत को प्रभावित करने की पूरी कोशिश कर रहे हैं। यदि आप बारीकी से देखें, तो आप पाएंगे कि कैसे कई सरकारें, बुद्धिजीवी, विदेश नीति विशेषज्ञ, थिंक टैंक, मीडिया हाउस और सोशल मीडिया प्रभावक इस तरह से चित्रित करने की कोशिश कर रहे हैं जैसे कि भारत इस मुद्दे पर तटस्थ रुख अपनाकर एक गंभीर गलती कर रहा है।

कभी वे भारत से विनती कर रहे हैं, कभी-कभी उनका स्वर उन्मादी या धमकी भरा होता है, लेकिन एकमात्र उद्देश्य भारत पर रूस की निंदा करने के लिए दबाव डालना है। कुछ दिन पहले, यूरोपीय संघ के मिशन के प्रमुखों ने यूक्रेन के लिए एकजुटता के प्रदर्शन में दिल्ली में भेंट की थी। क्या आपको नहीं लगता कि यह हमारी सरकार पर कुछ दबाव डालने के लिए एक रणनीतिक कदम था? अन्यथा, दुनिया में लगभग 200 राष्ट्र हैं, और यूरोपीय संघ के राजनयिकों की ऐसी बैठक कहीं भी हो सकती थी।

अब तक हमारी सरकार ने उनके दबाव में झुकने से इनकार कर दिया है। भारत अपने दृष्टिकोण में सही है, क्योंकि यह पश्चिमी दुनिया को खुश करने के लिए अपने लंबे समय के सहयोगी और सबसे बड़े रक्षा और प्रौद्योगिकी आपूर्तिकर्ता के साथ संबंधों को खराब नहीं कर सकता है। दूसरा कारण पश्चिमी देशों के द्वारा रूस का बहिष्कार करना और उस पर तमाम तरह के प्रतिबन्ध लगाना भी बेतुका है। वे भारत के साथ व्यवहार करने में सरासर पाखंड का प्रदर्शन कर रहे हैं। एक तरफ वे हमें रूस के खिलाफ कड़ा रुख अपनाने के लिए दबाव बना रहे हैं, लेकिन रूस पर किसी भी तरह के प्रतिबंध लगाने से पहले वे खुद अपने फायदे तौल रहे हैं।

अमेरिका, नाटो और अन्य पश्चिमी देशो का दोहरा व्यवहार

अमेरिकी राष्ट्रपति जो बिडेन ने रूसी तेल, गैस और अन्य ऊर्जा उत्पादों के आयात पर प्रतिबंध लगाने की घोषणा बड़े जोर शोर से की थी। हालांकि, उन्होंने चतुराई से अपने परमाणु ऊर्जा संयंत्रों के लिए यूरेनियम के आयात को निरंतर रखा है। अमेरिकी परमाणु ऊर्जा उद्योग अपने परमाणु ऊर्जा संयंत्रों को बिजली देने के लिए अपनी यूरेनियम आवश्यकताओं के लगभग आधे हिस्से के आयात के लिए रूस पर बहुत अधिक निर्भर करता है।

अमेरिकी ऊर्जा उद्योग रूस से यूरेनियम आयात की अनुमति जारी रखने के लिए अमेरिकी सरकार से दृढ़ता से पैरवी कर रहा है। रॉयटर्स के अनुसार, अमेरिकी सरकार के एक दस्तावेज से पता चलता है कि रूस के खिलाफ प्रतिबंधों में यूरेनियम का उल्लेख नहीं किया गया था। यहां, यह जानना महत्वपूर्ण है कि रूस के यूरेनियम उत्पादन को वहां की सरकार द्वारा संचालित कंपनी रोसाटोम द्वारा नियंत्रित किया जाता है, और यह रूसी सरकार के लिए बड़े पैमाने पर राजस्व उत्पन्न करता है।

यहाँ यह प्रश्न तो उठता है कि क्या अमेरिकी ऊर्जा उद्योग वास्तव में रूस से आयात जारी रख कर उसकी अर्थव्यवस्था का वित्तीय रूप से समर्थन कर रहा है?

अमेरिका ने वैसे तो रूसी तेल और गैस आयात पर प्रतिबंध लगा दिया है, लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति भी अपने यूरोपीय सहयोगियों के समर्थन के बारे में सुनिश्चित नहीं थे। प्रतिबंध की घोषणा करते हुए, राष्ट्रपति बिडेन ने एक अजीब सा उद्धरण दिया। उन्होंने कहा था कि “हम इस प्रतिबंध पर आगे बढ़ रहे हैं, यह समझते हुए कि हमारे कई यूरोपीय सहयोगी और साझेदार हमारे साथ जुड़ने की स्थिति में नहीं हो सकते हैं।”

अमेरिका सभी यूरोपीय देशों की तुलना में कहीं अधिक तेल का उत्पादन करता है, और वह एक तरह से ऊर्जा के शुद्ध निर्यातक हैं। लेकिन इस बयान से ये दिख रहा है कि अमेरिकी राष्ट्रपति इस समय असहाय हैं, और वो बहुत अच्छी तरह से जानते हैं कि उनके यूरोपीय मित्र रूस से तेल और गैस आयात पर प्रतिबंध लगाने नहीं जा रहे हैं। यूरोपीय देश वास्तव में रूस के तेल और गैस के सबसे बड़े खरीदार हैं। यूरोपीय देशों के अलावा, चीन और अमेरिका रूसी तेल और गैस उत्पादों का एक बड़ा हिस्सा खरीदते हैं।

यहां दिलचस्प तथ्य यह है कि यूरोपीय देश अमेरिका की तुलना में सात गुना अधिक रूसी तेल आयात कर रहे हैं। यूरोपीय राष्ट्र रूसी तेल आयात पर कहीं अधिक निर्भर हैं, विशेष रूप से पूर्वी यूरोपीय देश, जो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए रूस पर बहुत अधिक निर्भर हैं।

उदाहरण के लिए, लिथुआनिया रूस से अपने कुल तेल जरूरत का 83% आयात करता है, जिसके बाद फिनलैंड (80%), स्लोवाकिया (74%), पोलैंड (58%), हंगरी (43%), और एस्टोनिया (34%) का स्थान है। जबकि जर्मनी 30% आयात करता है, इसके बाद नॉर्वे (25%), बेल्जियम (23%), तुर्की (21%), डेनमार्क (15%), और स्पेन (11%) का स्थान है।

क्या होगा यदि यूरोपीय देश रूस से तेल आयात पर प्रतिबंध लगा देते हैं?

अगर ऐसा कुछ होता है तो यूरोप पे हाहाकार मच जाएगा, उनके घर के हीटिंग सिस्टम, बिजली, परिवहन और कई तेल पर निर्भर उद्योग बर्बाद हो जायेंगे। तेल की कीमत पहले से ही बढ़ रही है और कई ऊर्जा विश्लेषकों ने पहले ही चेतावनी दी है कि तेल की कीमतें वर्ष के अंत तक $160 या $200 प्रति बैरल तक जा सकती है। यदि ऐसा होता है, तो यूरोप को एक बहुत ही दर्दनाक स्थिति का सामना करना पड़ेगा, और वहां मुद्रास्फीति और आर्थिक संकट बढ़ जाएगा, जिससे जनता में आक्रोश भी पैदा हो सकता है।

यही कारण है कि यूरोपीय देश रूसी आयात पर प्रतिबंध लगाने के पक्ष में नहीं हैं, और वे यूक्रेन के ‘आक्रमण’ के बारे में अपनी नाराजगी तो दिखाएंगे लेकिन तेल और गैस आयात करते रहेंगे।

क्या भारत को पश्चिम देशो के दोहरे रवैया पर झुकना चाहिए?

पश्चिमी देशो के इस व्यवहार के लिए ‘पाखंड’ के अलावा कोई और शब्द नहीं हो सकता है। प्रत्येक राष्ट्र अपने हित के निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र होता है, भारत किसी भी मुद्दे पर समर्थन करने या तटस्थ रहने के अपने अधिकार का सही तरीके से उपयोग कर रहा है। यदि यूरोपीय देश अपनी रुचि और ऊर्जा आवश्यकताओं का ध्यान रख रहे हैं, तो वो किस अधिकार से भारत को कैसे दोषी ठहरा सकते हैं?

यहां ये जानना जरूरी है कि सिर्फ भारत ही नहीं है, बल्कि सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, पाकिस्तान जैसे अमेरिका के लंबे समय से सहयोगियों सहित कई देशों ने रूस की निंदा करने से इनकार कर दिया है और यहां तक कि बिडेन के कॉल का जवाब देने से भी इनकार कर दिया है। फिर भी, पश्चिमी देशो ने सिर्फ भारत पर ही दबाव बनाने का प्रयास किया है।

अमेरिकी एक्सपर्ट्स ने भारत को सलाह देते हुए कहा था कि QUAD के सदस्य के रूप में भारत को अन्य सदस्यों की भावनाओ के प्रति संवेदनशील होना चाहिए। लेकिन ये एक गलत आशा है, क्यूकी हर देश को अपनी लड़ाई खुद लड़नी पड़ती है। जब लद्दाख सीमा पर चीन के साथ भारत की झड़प हुई थी, तब क्या QUAD, NATO, और अन्य पश्चिमी देश भारत के समर्थन में सामने आये थे?

पिछले दिनों हमारी सरकार ने और विदेश मंत्री ने अमेरिका के साथ बातचीत के दौरान इन मुद्दों को उठाया, और अमेरिका और उसके सहयोगियों के दोहरे मापदंडो पर खुल कर बोला।

सरकार तो अपना काम कर रही है, लेकिन हम भारत के नागरिकों को भी इस मामले में सरकार के दृष्टिकोण का समर्थन करना चाहिए, और पश्चिमी देशों के भारत को हथियारों को मोड़ने या दबाव बनाने के किसी भी प्रयास की निंदा करनी चाहिए। पश्चिमी देशो को भी समझना चाहिए कि डिजिटल युग में इस तरह के दोहरे मानकों को छिपाना कठिन है, और भारत में आज एक ऐसी सरकार है जो हमारे रणनीतिक हितों की सुरक्षा के लिए कहीं अधिक दृढ़ है।

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