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Wednesday, December 1, 2021

सुभद्रा कुमारी चौहान: वीर ही नहीं हर रस की लेखिका

आज सुबह से जहाँ पर अफगानिस्तान में मुस्लिम औरतों को लेकर लोगों की चिंता मीडिया और सोशल मीडिया पर छाई हुई थी वहीं गूगल ने एक अपने डूगल में भारत की ऐसी स्त्री को स्थान दिया था, जिन्होंने वैसे तो तमाम रचनाएँ रचीं, परन्तु उनकी एक रचना ने उन्हें समय पटल पर अमर कर दिया। वह भारतीय स्त्रियों की मेधा और सृजनात्मकता का ऐसा प्रतीक हैं, जिसके कई आयाम हैं।

यह थीं सुभद्रा कुमारी चौहान, जिनका जन्म 16 अगस्त 1904 मे इलाहाबाद (अब प्रयागराज) में हुआ था। उनकी प्रारम्भिक शिक्षा वहीं पर हुई और उनका विवाह ठाकुर लक्ष्मण सिंह चौहान के साथ हुआ। विवाह के पश्चात वह जबलपुर चली गयी थीं। भारत के प्रति प्रेम से भरी सुभद्रा कुमारी चौहान पहली सत्याग्रही थीं, जिन्हें अंग्रेजी शासन का विरोध करने के कारण जेल भेजा गया था, वह 1923 और 1942 में जेल गयी थीं।

उनका लेखन देखकर ऐसा प्रतीत होगा है जैसे उनके भीतर स्वाभाविक लेखक था। वैसे तो उन्होंने बहुत कुछ रचा है, पर उन्हें एक कविता ने अमरता प्रदान की है। वह है झांसी की रानी लक्ष्मीबाई पर लिखी हुई कविता ने। इसमें उन्होंने केवल झांसी की रानी की वीरता का ही उल्लेख नहीं किया है, बल्कि उन्होंने कथित फेमिनिज्म द्वारा फैलाए गए इस मिथक को भी तोड़ा है कि हिन्दू स्त्रियों को पढ़ने लिखने का अधिकार नहीं था।

उन्होंने लिखा है:

कानपूर के नाना की मुँहबोली बहन ‘छबीली’ थी,

लक्ष्मीबाई नाम, पिता की वह संतान अकेली थी,

नाना के संग पढ़ती थी वह, नाना के संग खेली थी,

बरछी, ढाल, कृपाण, कटारी उसकी यही सहेली थी,

वीर शिवाजी की गाथाएँ

उसको याद ज़बानी थीं।

इस कविता में वह कई मिथक तोड़ देती हैं, जिसके आधार पर यह कथित फेमिनिज्म आज ही हिन्दू लड़कियों को उनके इतिहास के प्रति भड़काता रहता है। वह लोग बार बार यह स्थापित करने का प्रयास करती हैं कि हिन्दू औरतों का जीवन केवल और केवल रसोई तक था, मगर सुभद्रा कुमारी चौहान इसे भी झूठ साबित करती हैं जब वह यह लिखती हैं:

लक्ष्मी थी या दुर्गा थी वह स्वयं वीरता की अवतार,

देख मराठे पुलकित होते उसकी तलवारों के वार,

नकली युद्ध, व्यूह की रचना और खेलना ख़ूब शिकार,

सैन्य घेरना, दुर्ग तोड़ना, ये थे उसके प्रिय खिलवार,

महाराष्ट्र-कुल-देवी उसकी

भी आराध्य भवानी थी।

इस कविता में झांसी के उस समय के इतिहास के साथ अंग्रेजों द्वारा भारत पर किए गए अत्याचारों का भी वर्णन है। अंत में उन्होंने जो कहा है, वह शायद रानी लक्ष्मीबाई भी लिखना चाहती थीं:

रानी गयी सिधार, चिता अब उसकी दिव्य सवारी थी,

मिला तेज़ से तेज़, तेज़ की वह सच्ची अधिकारी थी,

अभी उम्र कुल तेइस की थी, मनुज नहीं अवतारी थी,

हमको जीवित करने आयी बन स्वतंत्रता नारी थी,

दिखा गयी पथ, सिखा गयी

हमको जो सीख सिखानी थी।

वास्तव में सुभद्रा कुमारी चौहान ने इस कविता को जन जन के मुख पर पहुंचा दिया था। और भारतीय सनातनी स्त्रियों का वह चेहरा प्रस्तुत किया, जिसे तोड़ने का इस वामपंथी फेमिनिज्म ने बार बार प्रयास किया, परन्तु सुभद्रा कुमारी चौहान की एक कविता ही उनके तमाम हथकंडे पर भारी पड़ती है, परन्तु इसका शायद उन्हें नुकसान भी हुआ, क्योंकि उनके राष्ट्रवादी चेहरे के कारण उनकी कहानियों को पूरे साहित्य में जैसे नकार दिया।

वह मात्र वीर रस की कवयित्री ही नहीं थीं, बल्कि उन्होंने मानवीय सम्बन्धों को अपनी कहानियों में बहुत ही कुशलता से उकेरा है। उनकी कई कहानियां हृदय को भीतर तक प्रभावित करती हैं और उस समय के समाज के साथ ही पति-पत्नी, भाई बहन आदि सभी सम्बन्धों की सघनता को प्रतिबिंबित करती हैं।

जैसे मुंहबोले भाई और पति के बीच फंसी एक स्त्री की कहानी, और यह ईर्ष्या किसी बुरे भाव में नहीं है, यह प्रेम को लेकर उपजी ईर्ष्या थी, जिसमें लड़की अर्थात विनीता का मुंहबोला भाई और पति दोनों पक्के मित्र हैं, और फिर भी पति अपनी पत्नी को इतना प्रेम करता है, कि अपने दोस्त से प्रेम करते हुए भी तब ईर्ष्या से भर जाता है जब उसकी पत्नी उसके दोस्त से बात करती है। दोनों पति पत्नी एक दूसरे से इतना प्रेम करते हैं, कि उनके मध्य कोई नहीं आ सकता है। यह संबंधों की जटिलता की ऐसी कहानी है, जिसका अंत बेहद सरल है, पति अपने दोस्त को अपने ही घर ले आता है। कहानी के अंत में खुशी के आंसू झलक जाते हैं।

सुभद्रा कुमारी चौहान की एक कहानी है पापी पेट! यह कहानी पढ़ कर ऐसा लगता है जैसे वह उन्हीं दिनों इस दायरे में नहीं बंधीं। जहाँ तक स्त्री की यौन अस्मिता एवं विरोध की बात है उन्होंने मंझली रानी कहानी में यह विरोध स्पष्ट दिखाया है। पर पापी पेट कहानी उन्हें संवेदनाओं के एक ऐसे चितेरे के रूप में स्थापित करती है, जो आज भी सबसे ख़ास है। यह कहानी स्वतंत्रता आन्दोलन में हुई सभा और उस पर हुए लाठीचार्ज के बाद भारतीय पुलिस अधिकारियों के परस्पर द्वन्द की कहानी है।

“पुलिस लाइन में पहुंचकर सिपाही लाठीचार्ज की चर्चा करने लगे। सभी को लाठीचार्ज करने, निहत्थे, निरपराध व्यक्तियों पर हाथ चलाने का अफ़सोस हो रहा था। सिपाही राम खिलावन ने अपनी कोठरी में जाकर अंदर से दरवाजा लगा लिया और लाठी चूल्हे में जला दी। उसकी लाठी के वार से एक सुकुमार बालक की खोपड़ी फट गयी थी। उसने मन में कहा “बेचारे, निहत्थे और निरपराधों को कुत्तों की तरह लाठी से मारना! राम राम यह हत्या! किसके लिए? पेट के लिए? इस पापी पेट को तो जानवर भी भर लेते हैं? फिर हम आदमी होकर इतना पाप क्यों करें? इस बीस रुपट्ती के लिए यह कसाईपन? न अब तो यह न हो सकेगा? लानत है ऐसी नौकरी पर; और दूसरे दिन नौकरी से इस्तीफा देकर अपने देश को चला गया।”

परन्तु प्रश्न यही है कि उनकी कहानियों पर चर्चा क्यों नहीं होती और जिन्हें गूगल ने इतना मान दिया, वह आज दिन भर हमारे विमर्श से दूर क्यों रहीं? हमें हर मूल्य पर अपनी उन सभी स्त्रियों के विषय में बात करनी है, जिनके विषय में चर्चाएँ कम हुई हैं या एजेंडा के चलते उन्हें वामपंथी साहित्य ने अधिक छूने से परहेज किया है!


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