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Saturday, May 18, 2024

अफगानिस्तान में न्यूज़ एंकर्स को पर्दे में स्वीकारने से लेकर नाइजीरिया में ईसाई लड़की को इस्लामी कट्टरपंथियों द्वारा जलाए जाने पर भारत के “लेफ्ट-इस्लामिस्ट” फेमिनिज्म वर्ग की चुप्पी

उनकी पीड़ा और संवेदना असीम है। सुदूर एलेन कुर्दी का शव देखते ही उनकी पीड़ा इतनी हिलोरे मारती है कि कविताओं पर कविताएँ रच जाती हैं। वह एलेन कुर्दी स्वयं बन जाती हैं। और न जाने कितनी उपमाएं दे जाती हैं। उन्हें सीरिया में तब से प्रेम जागृत होना आरम्भ हुआ जब से एलेन कुर्दी समुद्र तट पर मिला। उससे पहले यजीदी लड़कियों के साथ ईराक में जो कुछ किया इससे वह अछूती थीं।

उनकी सम्वेदना का दायरा युगों पीछे के कथित झूठे हिन्दू समाज के झूठे ग्रंथों में लिखी बातों तक है, मगर उनका दायरा मुस्लिम शासकों को सबसे महान बताने पर है। लेफ्ट गुलाम फेमिनिस्ट इस बात पर एक भी शब्द बोलने के लिए तैयार नहीं हैं कि कैसे आईएसआईएस के आतंकियों ने यजीदी लड़कियों को सेक्स स्लेव ही नहीं बनाया था, बल्कि ऐसे ऐसे अत्याचार किये थे कि लोग सुनकर दहल जाते हैं।

कश्मीर की गिरिजा टिक्कू तो कथित फेमिनिस्ट इसलिए नहीं देख पाईं क्योंकि वह हिन्दू और वह भी पंडित समुदाय की थी, जिसे नष्ट करने का वह नारा लगाती हैं। ब्राह्मणवादी मानसिकता का नाश करने के लिए हमेशा तैयार रहती हैं, और उनकी दृष्टि में पंडित या ब्राह्मण सबसे बड़े पापी हैं तो उनकी स्त्रियों के लिए क्या आवाज उठाना। इसलिए कश्मीरी पंडित स्त्रियों के लिए उनका कलेजा उस तरह नहीं कांपता है, परतु वह यजीदी महिलाओं के लिए भी कुछ नहीं कहती हैं, जो आईएसआईएस से पीड़ित थीं।

अभी हाल ही में ईराक की एक सांसद ने एक यजीदी पीड़िता की कहानी साझा करते हुए दिल दहला दिया था कि एक यजीदी महिला को उसके एक वर्षीय बेटे को ही पकाकर खिला दिया था। परन्तु फिर भी हमारे देश में एक भी लेफ्ट इस्लामिक फेमिनिस्ट लेखिकाओं की यह आवाज नहीं आई कि यहाँ कुछ गलत हुआ है। परन्तु हां एलेन कुर्दी उन्हें दिख गया, वह एक साल का बच्चा जिसे आईएसआईएस ने काट दिया, मार डाला और पका दिया, उस बच्चे की पीड़ा इन औरतों के कानों में नहीं पड़ती है।

खैर, अब आते हैं कुछ और बातों पर। पड़ोस में अफगानिस्तान में जब तालिबान सत्ता में आया था, तो वहां से स्वतंत्र विचारों वाली स्त्रियाँ भाग आई थीं, क्योंकि उन्हें पता था कि उनका जीवन अफगानिस्तान में सुरक्षित नहीं है। वह एक एक करके भाग गयी थीं, और फिर उन्होंने जो डर व्यक्त किये थे, वह किसी से छिपे नहीं हैं।

धीरे धीरे वही हुआ और पहले स्वतंत्र विचारों वाली लड़कियों की उन्होंने हत्या कराई और फिर लड़कियों के लिए स्कूल ही बंद कर दिया। हालांकि इसी तालिबान के आने पर भारत का लेफ्ट इस्लामिक फेमिनिस्ट वर्ग बहुत प्रसन्न हुआ था। उसे यह आशा उत्पन्न हुई थी कि चलो कोई तो है जो इस कथित हिन्दुओं की सरकार से छुटकारा दिला सकता है।

और फिर उन्होंने इस बात की प्रशंसा आरम्भ कर दी कि कम से कम वह प्रेस कांफ्रेंस कर रहे हैं, और उसके बाद यही वर्ग इस बात पर प्रशंसा के साथ आया कि कम से कम वह लड़कियों और लड़कों को अलग अलग ही सही पढने की इजाजत दे रहे हैं। परन्तु इनकी सभी तारीफें हर उस आजाद आम मुस्लिम लड़की की आवाज की कातिल हैं, जो इन तालिबान का शिकार हुई और जब तालिबान ने लड़कियों के लिए स्कूल बंद कर दिए, तब भी यह मौन रहीं!

तालिबान ने महिलाओं के लिए दिन प्रतिदिन नए नए प्रतिबन्ध लगा दिए हैं, परन्तु न जाने कहाँ कहाँ का दर्द देखने वाली ये फेमिनिस्ट मादाएं कुछ नहीं बोली हैं, फिर चाहे उनका बिना बुर्के के घर से बाहर न निकलने देने का हो, या फिर यह सलाह कि वह हो सके तो बाहर ही न निकलें, और उनका और आदमियों का पार्क जाने का अलग अलग दिन बनाना और फ्लाइट में अकेले न जाना, एवं साथ ही पति और पत्नी भी रेस्टोरेंट में एकसाथ खाना खाने नहीं जा सकते!

मगर इसके बाद अब जो आदेश आया, वह महिला स्वतंत्रता पर सबसे बड़ा आघात और हमला था। यह आदेश आया कि महिला एंकर्स टीवी पर अपना चेहरा ढककर आएं।

और अब इसका पालन भी आरम्भ हो गया है। परन्तु हिन्दुओं को कोसने वाली और तालिबान को सराहने वाली लेफ्ट फेमिनिस्ट ब्रिगेड का अभी तक कोई भी आलोचनात्मक वाक्य इस निर्णय के विरुद्ध नहीं आया है। उनका कहना है कि हमें हिन्दुओं का विरोध इसलिए करना है क्योंकि वह देश में हिन्दू तालिबान नहीं चाहती हैं, और यही कारण हैं कि वह कर्नाटक में बुर्के का समर्थन करने के लिए तैयार हो जाती हैं और इस आड़ में इस्लामी कट्टरता को और बढ़ाती हैं।

इतना ही नहीं ये लेफ्ट फेमिनिस्ट अश्वेत कवयित्री माया एंजेलो की कविताओं को खूब भुनाती हैं, परन्तु वह अश्वेत डेबोरा सैम्युअल के साथ खड़ी नहीं होतीं है जिसे कट्टर इस्लामी भीड़ ने कथित रूप से पैगम्बर निंदा के आरोप में पीट पीट कर मार डाला।

नाइजीरिया में एक ईसाई विद्यार्थी ने कथित रूप से कुछ ऐसा लिख दिया जो वहां के मुस्लिम वर्ग को पसंद नहीं आया और उन्होंने उसे पहले पकड़ पकड़ कर पीटा और फिर उसे मार डाला और कुछ लोगों के अनुसार उसके शरीर को जला दिया

मगर भारत में बैठा लेफ्ट इस्लामिस्ट फेमिनिस्ट वर्ग कट्टर मुस्लिमों द्वारा ईसाइयों की हत्याओं पर या फिर कट्टर मुस्लिम संगठन तालिबान द्वारा उन्हीं की औरतों पर किए जा रहे एक भी अत्याचार पर अपना मुंह नहीं खोलता है, वह कट्टर इस्लाम के खतरों को हिन्दू लडकियों को नहीं बताता है बल्कि वह भारत में हिन्दू धर्म के खिलाफ लगातार जहर उगलता हुआ हिन्दू लड़कियों को हिन्दू धर्म से विमुख करता रहता है।

जबकि आवश्यकता है कि कट्टर इस्लाम औरतों के लिए दुनिया कैसी बना रहा है, इस विषय में बात की जाए? कैसे वह अपने ही समुदाय की औरतों को पर्दों में बंद कर रहा है, कैसे वह दूसरे समुदाय की औरतों को भी घेर घेर कर मार रहा है? इस विषय में सभी को जानकारी प्रदान की जाए! परन्तु अत्यंत खेद एवं क्षोभ की बात है कि भारत का लेफ्ट इस्लामिस्ट फेमिनिस्ट समुदाय ऐसी किसी भी जानकारी को देने से बचता है!

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