spot_img

HinduPost is the voice of Hindus. Support us. Protect Dharma

Will you help us hit our goal?

spot_img
Hindu Post is the voice of Hindus. Support us. Protect Dharma
21.6 C
Sringeri
Monday, June 8, 2026

शत्रुबोध साहित्य : कड़वी लाभकारी औषधियां

(शत्रुबोध के नवीन साहित्य)

ज्ञान प्राप्ति हेतु सदा रत रहने वाले भारत के अधिकांशतः आर्यावर्ती आज स्वार्थपूर्ति हेतु अधिक रत रहते हुए दिखाई देते हैं, ऐसे में युगों से चली आ रही मौखिक परंपराओं एवं मूल्यों के चलते स्व का थोड़ा – बहुत ज्ञान हम सभी को है, किंतु शत्रु का ज्ञान उतना नहीं है जितना आज के वैचारिक युद्ध में होना चाहिए। हम ऋषियों की संतानों के शोणित का ‘रसास्वादन’ करने हेतु तत्पर, हमारे सदियों पुराने शत्रुओं को स्वयं के खेमे में प्रेम से सम्मिलित करने की वृत्ति पूर्णतः मूर्खता है। ईश्वर का कोटि – कोटि धन्यवाद कि हमारे पूर्वज हम जैसे नहीं थे, उनमें शत्रुबोध और स्वयंबोध दोनों होने के कारण आज हम सभी आधार कार्ड और विवाह पत्रिकाओं में अपना हिंदू नाम लिख पाते हैं और अभिवादन करते हुए राम – राम कह पाते हैं। 

म्लेच्छों को हमारी शुचितापूर्ण सनातन संस्कृति से दूर रखना हमारा प्रथम कर्तव्य है, ऐसे में म्लेच्छ कौन हैं ; अर्थात शत्रु कौन हैं, इसका स्पष्ट व सटीक ज्ञान हिंदू होकर जीवन जीने के अधिकार हेतु अत्यधिक आवश्यक है। जिस प्रकार कोई रोग न होने पर भी कड़वी व गुणकारी औषधियां शरीर हेतु महत्वपूर्ण होती हैं, ठीक उसी प्रकार शत्रुबोध भी बिना संकट के उतनी ही महत्ता का है। हालांकि शत्रुओं की सूची लंबी है किंतु प्रसन्नता की बात यह है कि इन्हीं शत्रुओं का बोध कराने वाले नवीन साहित्यकारों ने गुणवत्ता की दृष्टि से उत्तम साहित्य रचना की है, जिनमें से निम्नलिखित साहित्य मेरे मतानुसार आवश्यक रूप से पठनीय हैं। 

1. स्नेक्स इन द गंगा – ब्रेकिंग इंडिया 2.0

लेखक – राजीव मल्होत्रा, विजया विश्वनाथन – इस पुस्तक का मुख्य विषय पश्चिमी देशों के उस शिक्षाविद् तंत्र की आलोचनात्मक विवेचना है, जो योजनाबद्ध तरीके से ऐसे विद्वानों को तैयार करता है जो हिंदू और भारत विरोधी प्रचार का समर्थन और प्रसार करते हैं। यह पुस्तक इस बात को उजागर करती है कि किस प्रकार पश्चिम की शीर्ष अकादमिक संस्थाएं, विशेषकर हार्वर्ड विश्वविद्यालय, हाल ही में भारत में स्थापित हुईं सामाजिक विज्ञान और मानविकी केंद्रित यूनिवर्सिटियों के साथ एक गहरे गठजोड़ में हैं। भारतीय विश्वविद्यालय, भले ही भारत में स्थित हों, लेकिन हार्वर्ड के ‘जूनियर पार्टनर’ की तरह कार्य करते हैं और उनके पाठ्यक्रम और शोध एजेंडे में हार्वर्ड की विचारधारा को ही आगे बढ़ाते हैं। इस पुस्तक में ‘अशोका यूनिवर्सिटी’ नामक एक पूर्ण अध्याय समर्पित है, जो इस बात के प्रमाण-आधारित विवरण प्रस्तुत करता है कि किस तरह अशोक विश्वविद्यालय भारत में हार्वर्ड के नैरेटिव को मज़बूत करने के लिए कार्य करता है, विशेषकर हिंदू और भारत को लेकर फैलाए जा रहे विमर्श में। 

2. भारत राइजिंग 

लेखक – उत्पल कुमार 

उत्पल कुमार इस पुस्तक में स्पष्ट रूप से उल्लेख करते हैं कि स्वतंत्रता उपरांत, ‘चाचा लॉबी’ ने धर्मनिरपेक्षता को एक प्रमुख एजेंडे के रूप में देश की नस-नस में उतारने का प्रयास किया — न केवल शीर्ष अधिकारियों और नेताओं के भीतर, बल्कि सामान्य देशवासियों के मध्य भी। यहां लेखक नेहरू ‘चाचा’ के अहंकारपूर्ण, पक्षपाती, घृणास्पद रवैये पर प्रकाश डालते हैं – जो विशेष रूप से राष्ट्र प्रेमियों और विशेषकर आरएसएस के प्रति अधिकांश कांग्रेसी नेताओं का रहा है । इसी रवैये में जिद, आत्ममुग्धता, और सबसे महत्वपूर्ण — कुर्सी के प्रति ‘चाचा’ का मोह भी प्रमुख रूप से उभर कर आता है। 

एक अन्य अध्याय में लेखक तीन ‘साइलेंट वॉरफेयर’ अर्थात तीन स्वरहीन युद्धों की बात करते हैं : “वैचारिक, जनसांख्यिकीय, मज़हबी”। इसमें लेखक ने तेज़ गति से होते हुए चिंताजनक जनसांख्यिकीय परिवर्तन, हानिकारक विचारधाराओं के खतरे और मज़हबी संघर्ष जैसे मुद्दों को ऐसे तथ्यों के साथ प्रस्तुत किया है, जो अब तक आम पाठकों के सामने नहीं आए थे। इसी के साथ पाठकों को लेखक का यह प्रश्न उठाना साहसी लगेगा कि — “आखिर क्यों पश्चिमी देशों के और भारत के मुख्यधारा बुद्धिजीवी, हिंदुओं के लिए एक और अब्राहमिक समुदायों के लिए पृथक – पृथक मापदंड अपनाते हैं?” हालाँकि इस प्रश्न का उत्तर लेखक स्पष्ट रूप से औपनिवेशिक मानसिकता में खोजते हैं, हालांकि लेखक के तर्कों से इतर, पाठकों को यह पक्ष बुद्धिजीवियों की अपेक्षा सामान्य जनमानस में अधिक व्याप्त दिखाई देगा। साथ ही लेखक वामपंथियों द्वारा हिंदुओं और अब्राहमिक समुदायों के मध्य इस पक्षपात को अपनाने के पीछे फंडिंग के उद्देश्य पर भी प्रकाश डालते हैं।

इस पुस्तक की सबसे उल्लेखनीय बात यह है कि लेखक ने मुस्लिम समुदाय की प्रवृत्तियों की मज़हबी प्रकृति को जिस निडरता से उजागर किया है, वह इस पुस्तक की सबसे प्रभावशाली प्रस्तुति बन जाती है।

3. द मेजोरिटेरियन मिथ 

लेखक – कौशिक गंगोपाध्याय

इस पुस्तक में लेखक कल्चरल मार्क्सिज्म विषय पर विस्तृत रूप से प्रकाश डालते हैं यह स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं कि भारतीय संविधान, न्यायपालिका और राजनीतिक व्यवस्था हिंदुओं की तुलना में अल्पसंख्यकों के प्रति अधिक अनुकूल और पक्षपाती हैं। जब तक कोई राजनीतिक दल संविधान में संशोधन की पहल नहीं करता, तब तक यह स्पष्ट है कि नीतियाँ अल्पसंख्यकों के पक्ष में झुकी हुई हैं।

कश्मीरी हिंदुओं के उत्पीड़न, या सबरीमाला में मंदिर प्रवेश जैसे धार्मिक मुद्दों पर भी न्यायपालिका का रवैया यही रहा है — वह बहुसंख्यक विरोधी मिथक से ग्रस्त है और उसी के अनुरूप निर्णय लेती है। कई बार ऐसा प्रतीत होता है जैसे न्यायपालिका मानकर चलती है कि हिंदू बहुसंख्यक ही दोषी है, चाहे वह स्वयं पीड़ित क्यों न हो। इसके साथ ही लेखक यह बताते हैं न्यायपालिका ने स्वयं को ‘चर्च’ की भूमिका में स्थापित कर लिया है, जो यह तय करती है कि हिंदू धर्म के कौन से तत्व ‘मूलभूत’ हैं और कौन से ‘गैर-मूलभूत’। यह दृष्टिकोण बहुसंख्यक समुदाय के प्रति गहरे पूर्वाग्रह को दर्शाता है, जहां संवैधानिक और न्यायिक हस्तक्षेप का लक्ष्य सिर्फ हिंदुओं को नियंत्रित करना और उनकी धार्मिक स्वतंत्रता को सीमित करना होता है, जबकि अल्पसंख्यक मज़हबों और उनके हिंसक व चालाक समर्थकों को ऐसे हस्तक्षेपों से पूरी तरह मुक्त रखा जाता है। साथ ही, स्कॉलरली विषयों पर पुस्तक लेखन की संरचना कैसी होनी चाहिए, यह भी इस पुस्तक से सीखने जैसा है। 

4. सिनिकल थ्योरीज़ – हाउ एक्टिविस्ट स्कॉलरशिप मेड एवरीथिंग अबाउट रेस, जेंडर एंड आईडेंडिटी एंड वाय दिस हार्मस एवरीबडी 

लेखक – हेलन प्लकरोज़ एवं जेम्स लिंडसे

इस पुस्तक में वोकिज्म के अति विस्तृत इतिहास पर प्रभावशाली एवं भरपूर तथ्यों के साथ सार्थक व तर्कशील विवेचन देखने को मिलता है, जटिल सिद्धांतों को बड़ी सरलता से इसमें प्रस्तुत किया गया है। इसके अंतर्गत दो मुख्य सिद्धांत हैं – 

1. ज्ञान का पोस्टमॉडर्न सिद्धांत:

   यह कहता है कि हमें यह कभी नहीं पता चल सकता कि कोई एक सच्चाई है भी या नहीं। यानी “सच्चाई” जैसी कोई चीज़ है या नहीं, यह खुद शक़ के घेरे में है। साथ ही, यह मानता है कि हमारा ज्ञान समाज और संस्कृति के हिसाब से बनता है — न कि वो कोई शुद्ध या स्थायी सच्चाई होती है।

2. राजनीतिक पोस्टमॉडर्न सिद्धांत:

   यह मानता है कि समाज में ताक़त (पावर) और ऊँच-नीच (हायरार्की) के सिस्टम होते हैं, और यही तय करते हैं कि हमें क्या “सच” बताया जाएगा और क्या नहीं।

अन्य चार मुख्य बिंदु जिन पर पूरा liberalism अर्थात वामपंथ गतिशील है : 

1. सीमाओं का धुंधला होना:

   जैसे सही-गलत, पुरुष-स्त्री, कला-विज्ञान जैसी सीमाएं अब उतनी साफ़ नहीं रह गई हैं।

2. भाषा की ताक़त:

   शब्दों के ज़रिए ही हम सोचते और समझते हैं, और भाषा ही तय करती है कि हमें क्या समझ आता है।

3. संस्कृति के अनुसार सच्चाई : 

   हर संस्कृति की अपनी सच्चाई होती है। कोई एक “वैश्विक” सच्चाई नहीं है जो सबके लिए समान हो।

4. व्यक्ति और सार्वभौमिकता की हानि:

   अब “व्यक्ति” की जगह समूह की पहचान (जैसे जाति, लिंग, धर्म) को ज़्यादा महत्व दिया जाता है। साथ ही, सबके लिए एक जैसा सच या मूल्य मान्य नहीं रह गया है।

इन विचारों के कारण, पोस्टमॉडर्न सोच ने विज्ञान की भी मान्यता समाप्त कर दी, क्योंकि अगर हम यह मानते हैं कि एक ही “सच” है ही नहीं — तो फिर हम उसे ढूँढें क्यों?

वोकिज्म के संपूर्ण इतिहास, सिद्धांतों एवं इस भयंकर रोग से मुक्त होने के उपाय इस पुस्तक में प्राप्त होते हैं, वोकिज्म पर सर्वाधिक शोधपरख एवं श्रेष्ठ पुस्तकों में से एक है यह पुस्तक।

5. हिंदू मस्जिदस 

लेखक – प्रफुल्ल गोराडिया

विदेशी आक्रमणकारियों ने सनातन आस्था को पुनः – पुनः भयंकर व वीभत्स रूप में चोट पहुंचाई है। असंख्य मंदिरों की दुर्दशा इन मूर्तिभंजकों ने इस प्रकार की है कि उनकी व्याख्या निसंदेह लोचन भीगो देंगी। ऐसे मंदिरों का वर्णन जिन्हें तोड़कर मस्जिद बनाई गई, इनका उल्लेख प्रफुल गोराड़िया जी द्वारा “हिंदू मस्ज़िदस” में तथ्यों सहित किया गया है।

ऐसे ही कुछ मंदिर जिनका उल्लेख प्रफुल जी करते हैं – 

• कुव्वतुल मस्जिद – महरौली में हुए इस विनाश का प्रथम कारण मुहम्मद गौरी था। यह कुतुब मीनार के पास ही स्थित है। मस्जिद का नाम इसके निर्माता के नाम पर रखा गया है,कुतुबुद्दीन ऐबक,कुव्वतुल इस्लाम। इसी मस्जिद के बारे में ‘ऑक्सफोर्ड हिस्ट्री ऑफ इस्लाम’ में यह लिखा है कि “दिल्ली में विशाल सामूहिक मस्जिद जिसे कुव्वत अल -इस्लाम के रूप में जाना जाता है,भारत में निर्मित पहली मस्जिद में से एक थी। 1191 में प्रारंभ हुई यह मस्जिद, एक पूर्व – इस्लामिक मंदिर की जगह पर खड़ी थी,जिसके खंडहर संरचना में शामिल किए गए थे। प्रांगण में एक लोहे का लंबा स्तंभ था,जो मूल रूप से भारतीय भगवान विष्णु को लगभग 400 ईस्वी पूर्व के आसपास समर्पित था, इसे हिंदू धर्म पर इस्लाम की विजय के प्रतीक के रूप में फिर से से खड़ा कर दिया गया था।” कुव्वतुल मस्जिद 27 हिंदू एवं जैन मंदिरों को तोड़कर बनाई गई। यह हिंदुओं के अपमान का एक स्मारक है। अलीगढ़ के सर सैय्यद अहमद खान, 27 मंदिरों के विध्वंस के बारे में अपनी ऊर्दू पुस्तक ‘आसार उस सनादीद’ में गर्व से लिखते हैं – “राज पिठोरा का मूर्ति गृह कुव्वतुल इस्लाम को मस्जिद में परिवर्तित कर दिया गया। मूर्ति को मंदिर से बाहर ले जाया गया। दीवारों,दरवाजों एवं खंबे पर गढ़ी गई कुछ छवियों को पूरी तरह से मिटा दिया गया,कुछ को विरूपित कर दिया गया।…..सत्ताईस मंदिरों की सामग्री,जिसकी कीमत पांच करोड़ चालीस लाख दिलवाल थी, इसका उपयोग मस्जिद निर्माण में किया गया।” वे आगे लिखते हैं – “जब सुलतान शमसूददीन (मुहम्मद गौरी) द्वारा विजय प्राप्त की गई,तब महाकाल के मूर्तिघर को ध्वस्त किया गया व उनकी मूर्ति को दिल्ली लाया गया,और उन्हें मस्जिद के दरवाज़े पर बिखेर दिया गया।”

इस प्रकार यह कुछ झलकियां थीं, ऐसे कईं शत्रु हैं जिनके बारे में हम इन पुस्तकों से पढ़ सकते हैं।

१. भारत में मार्क्सवाद और मार्क्सवादी इतिहास लेखन – शंकर शरण

२. अकादमिक हिंदूफोबिया : ए क्रिटीक ऑफ़ वेंडी डोनिगर’स एरोटिक स्कूल ऑफ़ इंडोलॉजी – राजीव मल्होत्रा

३. ब्रेनवॉश्ड रिपब्लिक – नीरज अत्री

४. स्वयंबोध और शत्रुबोध – पंकज सक्सेना

५. टीपू सुल्तान – विक्रम सम्पत

६. इंडियन मुस्लिम्स हू आर दे – के.एस. लाल

७. इंडिया, भारत और पाकिस्तान – जे. साई दीपक

८. एमिनेंट डिस्टोरियन्स – उत्पल कुमार

९. टेन हेड्स ऑफ रावण : ए क्रिटीक ऑफ हिंदूफोबिक स्कॉलर्स – राजीव मल्होत्रा एवं दिव्या रेड्डी

१०. ब्रेकिंग इंडिया – राजीव मल्होत्रा और अरविंदन नीलकंदन

— जान्हवी नाईक ,रिसर्च एसोशिएट सेंटर फॉर इंडिक स्ट्डीज इंडस यूनिवर्सिटी 

Subscribe to our channels on WhatsAppTelegram &  YouTube. Follow us on Twitter and Facebook

Related Articles

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Latest Articles

Sign up to receive HinduPost content in your inbox
Select list(s):

We don’t spam! Read our privacy policy for more info.

Thanks for Visiting Hindupost

Dear valued reader,
HinduPost.in has been your reliable source for news and perspectives vital to the Hindu community. We strive to amplify diverse voices and broaden understanding, but we can't do it alone. Keeping our platform free and high-quality requires resources. As a non-profit, we rely on reader contributions. Please consider donating to HinduPost.in. Any amount you give can make a real difference. It's simple - click on this button:
By supporting us, you invest in a platform dedicated to truth, understanding, and the voices of the Hindu community. Thank you for standing with us.