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Wednesday, November 30, 2022

कृषि कानून वापस, पर “किसान” डटे? क्या चुनावों तक ही डटे रहेंगे या फिर?

कृषि कानून वापस हो गए हैं, पर किसान अभी तक डटे हुए हैं, और दिल्ली बॉर्डर खाली करने को लेकर अभी उनकी कोई योजना नहीं है. राजनीतिक दल अपनी अपनी राजनीति कर रहे हैं. परन्तु लखनऊ में हुई किसान महापंचायत में यह स्पष्ट हो गया कि कथित किसानों द्वारा अभी आन्दोलन वापस लिए जाने की कोई योजना नहीं है.

राकेश टिकैत ने कई और मांगे अभी सामने रख दी हैं. जिनमें एमएसपी का कानून, और शहीद किसानों की याद में स्मारक, सहित कई और मांगें हैं.  उन्होंने प्रधानमंत्री की माफी को अपर्याप्त बताया है और कहा है कि वह इसे नहीं मानते हैं.  और अपना आन्दोलन जारी रखेंगे.

एक साल से चल रहे किसान आन्दोलन का हल निकलता दिखाई नहीं दे रहा है और शायद अभी हल आएगा भी नहीं. राकेश टिकैत ने उठने से इंकार कर दिया है और अब यह स्पष्ट है कि यह चलता ही रहेगा.  ऐसे में यह देखना अत्यंत आवश्यक होगा कि इसकी समय सीमा क्या होगी? क्या यह इन चुनावों तक ही रहेगा? या फिर यह आगे भी चलेगा?

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यह किसान आन्दोलन अभी चुनावों तक तो चलेगा ही, परन्तु यह उसके बाद भी चलते रहने की आशंका है, क्योंकि यह किसानों के विषय में है ही नहीं. यह मात्र भारतीय जनता पार्टी के विरोध में खड़ा किया गया आन्दोलन है और विशेषकर उत्तर प्रदेश को लेकर इसका ताना बाना बुना जा रहा है.

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में, जहाँ इस आन्दोलन का प्रभाव अधिक है और ऐसा लगता है कि भारतीय जनता पार्टी को प्रभावित करेगा, वहां पर कानून व्यवस्था एक बहुत बड़ा मुद्दा है. और कई महीनों से मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ उन मामलों पर कदम उठा रहे हैं, जिन पर पहले की सरकार में बोला भी नहीं जाता था, जैसे कैराना से हिन्दू परिवारों का पलायन, कबाड़ी माफियाओं पर कार्यवाही आदि सम्मिलित हैं.

समाजवादी पार्टी का शासन हो या फिर बहुजन समाज पार्टी का शासन, पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हिन्दुओं का जीना हमेशा कठिन रहता था. कैराना में मुकीम काला का नाम आतंक का पर्याय था और मुकीम काला के कारण ही कैराना से हिन्दुओं का पलायन हुआ था.

मुजफ्फरनगर में वर्ष 2013 में सचिन और गौरव दो युवकों की हत्या कर दी गयी थी और उसके बाद महापंचायत से लौटते लोगों पर हमला कर दिया गया था, जिसमें 65 लोगों की मृत्यु हो गयी थी और साथ हजारों लोगों को पलायन करना पड़ा था.

यह तो चर्चित मामले रहे थे, परन्तु यह पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मुस्लिम आतंक बताने के लिए पर्याप्त हैं और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ उन समस्याओं पर काम कर रहे हैं, जिनसे यह क्षेत्र त्रस्त था, और यही कारण है कि इस क्षेत्र में भारतीय जनता पार्टी को चुनौती देने के लिए सपा, रालोद और किसान आन्दोलन तीनों मिलकर काम कर रहे हैं.

आज राष्ट्रीय किसान प्रगतिशील संघ ने सरकार से अनुरोध किया कि वह किसान विरोधी लॉबी से प्रभावित न हों और उन्होंने सभी 28 राज्यों और 9 संघ शासित प्रान्तों के प्रशासकों से अनुरोध किया कि वह अपने अपने सम्बन्धित राज्यों में सुधारों का क्रियान्वयन सुनिश्चित करें.

राष्ट्रीय किसान प्रगतिशील स्नाघ ने कहा है कि अगर भारत को अपने नागरिकों को स्थाई खाद्य सुरक्षा और खाद्य पदार्थों की कम महंगाई का आश्वासन देना है तो उसे हाल ही में किए गए बाजार सुधारों से किसानों की मदद करने की जरूरत है

संघ का कहना है कि हाशिए पर रहने वाले किसान इन सभी कानूनों से बहुत आश्वान्वित थे, जिन्हें अब निरस्त किया जा रहा है. प्रगतिशील संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष इन कानूनों को वापस लिए जाने से बहुत आक्रोशित दिखे और उन्होंने कथित विकास विरोधी एजेंटों से स्पष्ट पूछा कि आखिर कौन सी प्रणाली न उभरते राज्यों से धान की सभी 87 किस्मों और फसलों की अन्य किस्मों के लिए एमएसपी प्रदान करेगी? इसके साथ ही उन्होंने पूछा, हमने आखिर क्या अपराध किया है? वे हमारे सपनों और आकांक्षाएं को क्यों मार रहे हैं? ये तथाकथित किसान नेता चाहते हैं कि हम उनके खेत में मजदूर और सहायक के रूप में काम करें. वे चाहते हैं कि हम पलायन के लिए मजबूर हों.

भारतीय किसान युनियन का भानु गुट पहले ही इस आन्दोलन से अलग हो चुका है और कई संगठन इन कानूनों का समर्थन कर रहे थे. परन्तु अब जब इन्हें निरस्त किया जा रहा है तो ऐसे में वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप सिंह का यह विश्लेषण बहुत कुछ सोचने पर विवश करता है.  उन्होंने कहा कि लखनऊ में किसान महापंचायत हुई थी, परन्तु यह विजय न होकर, निराश करने वाली थी.  उन्होंने प्रश्न उठाए कि आखिर किसी मीडिया ने आन्दोलन में आने वाले किसानों की संख्या पर कोई बात क्यों नहीं की?

यही बात कई स्थानीय पत्रकारों ने भी कही थी कि कहीं पर भी महापंचायत में आए हुए किसानों की भीड़ का उल्लेख नहीं था.  टिकैत का इंटरव्यू था, भारतीय जनता पार्टी को पराजित करने की रणनीति थी, परन्तु किसान नदारद थे!

आज ही “कथित किसान नेता” सुखबीर खलीफा और उनके 28 समर्थकों एवं 200 अज्ञात लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज हुई है. क्योंकि उन्होंने नॉएडा के जीरो पॉइंट में ट्रैफिक जाम किया और धारा 144 का उल्लंघन किया.

अब जब राकेश टिकैत ट्रैक्टर मार्च की धमकी दे रहे हैं और निश्चय व्यक्त कर रहे हैं, तो ऐसे में देखना होगा कि सरकार क्या कदम उठाती है और इस प्रकार की अराजकता के समक्ष हमारी न्यायपालिका भी कब तक आँखें मूंदे रहती है?

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