जातिवादी राजनीति का नया औजार बन चुका यह विधेयक उच्च शिक्षण संस्थानों में भय, वैमनस्य और वैचारिक दमन का वातावरण तैयार करता है क्या यही है कांग्रेस का नया एजेंडा?
कर्नाटक की कांग्रेस सरकार ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि उनके लिए शिक्षा, छात्र हित और संस्थागत स्वायत्तता से अधिक महत्वपूर्ण है वोटबैंक को खुश करना। ‘रोहित वेमुला (शैक्षणिक बहिष्कार रोकथाम) विधेयक 2025’ इसका ताजा उदाहरण है। यह कानून जितना नाम से करुणा और न्याय का आभास देता है, उतना ही भीतर से विभाजनकारी, एकपक्षीय और विध्वंसकारी है। यह कानून न तो छात्र हित में है, न शिक्षा व्यवस्था के हित में और न ही सामाजिक समरसता के।
इस विधेयक के तहत अनुसूचित जाति, जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग और अल्पसंख्यक समुदायों से आने वाले छात्रों के साथ किसी भी प्रकार का “बहिष्कार” दंडनीय अपराध बना दिया गया है। आरोप लगते ही बिना वारंट गिरफ्तारी, गैर-जमानती धाराएं, एक से तीन साल की जेल और ₹1 लाख तक जुर्माना यह सब केवल आरोप मात्र पर। यानी अगर कोई छात्र किसी सहपाठी को प्रोजेक्ट ग्रुप में शामिल नहीं करता, होस्टल पार्टी में नहीं बुलाता या पढ़ाई में सहयोग नहीं करता और यदि वह छात्र SC/ST/OBC/अल्पसंख्यक वर्ग से है तो यह “बहिष्कार” मान लिया जाएगा और आरोपी सीधे सलाखों के पीछे होगा।
यह कानून न्याय का नहीं, प्रतिशोध का औजार है। इस तरह के कानून शिक्षा को सुरक्षित नहीं, बल्कि आतंकित और विषाक्त बनाएँगे। सबसे चिंताजनक बात यह है कि इस कानून में झूठे आरोपों की कोई सज़ा नहीं है। यानी, कोई भी व्यक्ति केवल जातिगत या वैचारिक शत्रुता के चलते किसी को फँसा सकता है, और उस पर कोई दंड नहीं होगा। इससे शैक्षणिक संस्थान आपसी विश्वास की जगह संदेह और जातिवादी राजनीति के अड्डे बन जाएंगे।
जिस तरह से यह विधेयक राजनीतिक मंशा से प्रेरित दिखता है, वह और भी खतरनाक है। रिपोर्ट्स के अनुसार राहुल गांधी ने स्वयं इस बिल को ‘रोहित वेमुला’ के नाम से लाने का सुझाव सिद्धारमैया सरकार को दिया था। यानी कांग्रेस एक बार फिर मृत्यु के साथ राजनीति, जाति के साथ ध्रुवीकरण और कानून के साथ वैचारिक बदला लेने की राह पर है। रोहित वेमुला की आत्महत्या को लेकर वर्षों से जो झूठा नैरेटिव खड़ा किया गया, उसी नैरेटिव को अब कानूनी जामा पहनाया जा रहा है चाहे वह नैरेटिव तथ्यों से मेल खाता हो या नहीं।
वामपंथी और तथाकथित दलित-पंथी ताकतें वर्षों से विश्वविद्यालयों को अपने वैचारिक युद्ध का मैदान बनाते आई हैं। उनका उद्देश्य कभी भी शिक्षा या समावेशन नहीं रहा, बल्कि हिंदू विरोधी विमर्श, संघ और राष्ट्रवादी संगठनों को निशाना बनाना, और भारत विरोधी एजेंडे को आगे बढ़ाना रहा है। अब यह नया कानून उन्हें एक ऐसा हथियार देगा जिससे वे विश्वविद्यालयों में ‘शिकार’ चुन सकें चाहे वह छात्र हो, शिक्षक या संस्थान प्रमुख।
आप कल्पना कीजिए कि एक शिक्षक जो आरक्षण की नीति की आलोचना करता है, या कोई छात्र जो ABVP से जुड़ा है, उसे इस कानून के तहत “जातिवादी बहिष्कारकर्ता” कहकर फँसाया जा सकता है। केवल असहमति, आलोचना या प्रतियोगिता भी अब अपराध बन जाएगी यदि आरोप लगाने वाला ‘सही’ जातिगत श्रेणी से आता हो।
यह कानून केवल सामान्य वर्ग के छात्रों को नहीं, बल्कि संपूर्ण अकादमिक वातावरण को कृत्रिम अपराधबोध और भय में झोंक देगा। संस्थान अपनी स्वायत्तता खो देंगे। कोई भी विवाद चाहे वह शैक्षणिक हो या व्यक्तिगत अब जातिवादी रंग में रंगा जाएगा। सरकार को भी यह अवसर मिलेगा कि जो संस्थान उनके नैरेटिव से सहमत न हों, उनके बजट और प्रशासन पर अंकुश लगाए।
कांग्रेस की नीति स्पष्ट है जनसंख्या बहुल वर्गों को विशेषाधिकार, भले ही उससे न्याय का सिद्धांत कुचल जाए। कर्नाटक में लगभग 94% जनसंख्या OBC/SC/ST/अल्पसंख्यक वर्गों में आती है। यह विधेयक उन्हीं समूहों को संबोधित करता है। यानी यह सीधे-सीधे राजनीतिक ध्रुवीकरण और जातिगत ध्रुवीकरण की रणनीति है।
इससे यह भी स्पष्ट होता है कि कांग्रेस और उसके वैचारिक सहयोगियों की नजर में ‘सामाजिक न्याय’ केवल बहुसंख्यकों को दबाने का साधन है। उनके लिए हर ब्राह्मण या सामान्य वर्ग का छात्र शोषक है, हर ABVP कार्यकर्ता उत्पीड़क है और हर आलोचना ‘संवेदनहीनता’ है। इस मानसिकता ने ही जेएनयू से लेकर हैदराबाद विश्वविद्यालय तक को टुकड़े-टुकड़े गैंग की प्रयोगशाला बना दिया और अब यही प्रयोग कर्नाटक में कानून बनकर लागू किया जा रहा है।
अगर कोई पार्टी सचमुच सामाजिक न्याय चाहती है, तो वह संवाद, समरसता और संस्थागत सुधार की दिशा में काम करेगी न कि ऐसा कानून बनाएगी जो डर, असुरक्षा और वैमनस्यता को बढ़ावा दे। लेकिन कांग्रेस का एजेंडा ‘समाज सुधार’ नहीं, बल्कि समाज का बँटवारा है।
इस विधेयक से न केवल छात्र बल्कि शिक्षक, प्रशासक, शोधकर्ता सभी अब जाति की राजनीति के बंधक बन जाएंगे। विश्वविद्यालय विचार का केंद्र नहीं, जातीय शिकायतों और राजनीतिक बदले का अखाड़ा बन जाएंगे।
यह कानून “शैक्षणिक न्याय” का दावा करता है, लेकिन वास्तव में यह शैक्षणिक आपातकाल की शुरुआत है।
