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Wednesday, April 17, 2024

हिंदी दिवस, प्रगतिशील साहित्य और हिंदी की कथित दुर्दशा

आज हिंदी दिवस है और आज के दिन हिंदी को लेकर न जाने कितनी बातें आदि होती हैं। एक परिपाटी बन जाती है कि कहा जाए कि हिंदी को रोजगार की भाषा बनाएं आदि आदि। आज का दिन लगभग हर ऐसे व्यक्ति के लिए रुदन का दिन बन जाता है, जो हिंदी में ही नहीं बल्कि हिंदी का कमा खा रहा है।  आज हम बात करते हैं कि जिस भाषा ने स्वतंत्रता संग्राम के मध्य एक जनजागरण उत्पन्न करने का महत्वपूर्ण कार्य किया, उसे कैसे चरणबद्ध तरीके से निर्बल ही नहीं किया गया, अपितु उसे नष्ट करने का भी हर संभव प्रयास किया गया।

आधुनिक हिंदी साहित्य ने हिंदी को आम जन से दूर कर दिया। यद्यपि सुनने में यह अत्यंत अप्रिय प्रतीत हो सकता है, परन्तु कहीं न कहीं यह सत्य है। वर्ष 1936 में जबसे हिंदी साहित्य ने कथित प्रगतिशीलता का चोला ओढ़ा, उसने हिंदी साहित्य को आमजनता से दूर करने का कार्य करना आरम्भ कर दिया। वर्ष 1935 में लन्दन में प्रोग्रेसिव राइटर्स एसोसिएशन की स्थापना भारतीय लेखकों और बुद्धिजीवियों ने कुछ ब्रिटिश साहित्य कर्मियों के साथ की। इसमें मुल्क राज आनन्द, सज्जाद जहीर और ज्योतिर्मय घोष सम्मिलित थे जिन्होनें इसके उद्देश्यों और लक्ष्यों को बताते हुए घोषणापत्र लिखा कि “भारतीय समाज में बहुत ही तेजी से कट्टरवादी बदलाव हो रहे हैं। हमारा मानना है कि भारत के नए साहित्य को हमारी आज की मूल समस्याओं के विषय में बात करनी है, और जो हैं भूख और गरीबी, सामाजिक पिछड़ापन, और राजनीतिक दमन। यह सभी हमें नकारात्मकता और अकर्मण्यता की ओर लेकर जाता है। वह सब जो हमारे अंदर आलोचनात्मक भावना पैदा करता है, जो तर्क के प्रकाश में संस्थानों और रीति-रिवाजों की जांच करता है, जो हमें कार्य करने, खुद को संगठित करने, बदलने में मदद करता है, हम प्रगतिशील के रूप में स्वीकार करते हैं’ (आनंद, पीपी. 20-21)

फिर वर्ष 1935 में सज्जाद लन्दन से भारत चले आए, जिससे भारत में इस आन्दोलन को आगे बढ़ाया जा सके। यहाँ पर आने से पहले वह कई लोगों को अपने इस घोषणापत्र की प्रतियां भेज चुके थे। सज्जाद जिस राह पर साहित्य को लेजाना चाहते थे, वह कन्हैया लाल मुंशी के साथ अपनी बातचीत के माध्यम से स्पष्ट कर देते हैं

“”हमें यह स्पष्ट हो गया कि कन्हैयालाल मुंशी का और हमारा दृष्टिकोण मूलतः भिन्न था। हम प्राचीन दौर के अंधविश्वासों और धार्मिक साम्प्रदायिकता के ज़हरीले प्रभाव को समाप्त करना चाहते थे। इसलिए, कि वे साम्राज्यवाद और जागीरदारी की सैद्धांतिक बुनियादें हैं। हम अपने अतीत की गौरवपूर्ण संस्कृति से उसका मानव प्रेम, उसकी यथार्थ प्रियता और उसका सौन्दर्य तत्व लेने के पक्ष में थे। जबकि कन्हैयालाल मुंशी सोमनाथ के खंडहरों को दुबारा खड़ा करने की कोशिश में थे।”

साहित्य में कम्युनिस्ट विचारधारा तेजी से आगे बढ़ रही थी, जिसमें हिन्दू धर्म को तो बार बार अंधविश्वास और पिछड़ा घोषित किया जाता रहा, परन्तु जिसने हिन्दू धर्म के लोगों को पीड़ित किया, और रक्त से सने जनेऊ तुलवाए, उस इस्लामी विचारधारा की कट्टरता को अपनाया जाता रहा।

जैसे इस प्रगतिशील लेखक संघ में इस्मत चुगताई भी प्रारंभिक सदस्य के रूप में थीं, वही इस्मत चुगताई जिनके मन में हिन्दू धर्म के प्रति इस हद तक घृणा थी कि वह अपनी हिन्दू शाकाहारी सहेली को छिपाकर मांस खिलाती थीं और उनकी सहेली को भी इस बात का पता नहीं होता था।

वही फैज़ इसमें थे जो लिखते थे

“सब बुत गिरवाए जाएंगे

बस नाम रहेगा अल्लाह का!”

और वही सज्जाद थे जिनके लिए सोमनाथ के खँडहर दोबारा खड़ा किया जाना एक साम्प्रदायिक और अन्धविश्वासी सोच थी।

यद्यपि वर्ष 1935 में प्रगतिशील लेखक संघ के अध्यक्ष के रूप में प्रेमचंद ने अपने अध्यक्षीय भाषण में कहा था कि

‘प्रगतिशील लेखक संघ’, यह नाम ही मेरे विचार से गलत है। साहित्यकार या कलाकार स्वभावतः प्रगतिशील होता है। अगर यह उसका स्वभाव न होता, तो शायद वह साहित्यकार ही न होता। उसे अपने अन्दर भी एक कमी महसूस होती है और बाहर भी। इसी कमी को पूरा करने के लिए उसकी आत्मा बेचैन रहती है। अपनी कल्पना में वह व्यक्ति और समाज को सुख और स्वच्छंदता की जिस अवस्था में देखना चाहता है, वह उसे दिखाई नहीं देती। इसलिए, वर्तमान मानसिक और सामाजिक अवस्थाओं से उसका दिल कुढ़ता रहता है। वह इन अप्रिय अवस्थाओं का अन्त कर देना चाहता है, जिससे दुनिया जीने और मरने के लिए इससे अधिक अच्छा स्थान हो जाय। यही वेदना और यही भाव उसके हृदय और मस्तिष्क को सक्रिय बनाए रखता है।“

http://pahleebar.blogspot.com/2019/08/1936.html

परन्तु उनकी इस बात को ध्यान में रखते हुए लकीर पीटी गयी उनके द्वारा कही गयी अन्य बातों पर जैसे उन्होंने यह कहा था कि हमने अभी जिस युग को पार किया है, उसे जीवन से मतलब न था। हमारे साहित्यकार कल्पना की सृष्टि खड़ी कर उसमें मनमाने तिलिस्म बांधा करते थे। कहीं फिसानये अजायब की दास्तान थी, कहीं बोस्ताने खयाल की ओर कहीं चंद्रकांता संतति की। इन आख्यानों का उद्देश्य केवल मनोरंजन था और हमारे अद्भुत रस-प्रेम की तृप्ति। साहित्य का जीवन से कोई लगाव है, यह कल्पनातीत था। कहानी कहानी है, जीवन जीवन; दोनों परस्पर विरोधी वस्तुएं समझी जाती थीं। कवियों पर भी व्यक्तिवाद का रंग चढ़ हुआ था। प्रेम का आदर्श वासनाओं को तृप्त करना था, और सौंदर्य का आंखों को। इन्हीं श्रृंगारिक भावों को प्रकट करने में कवि-मंडली अपनी प्रतिभा और कल्पना के चमत्कार दिखाया करती थी।“

और यथार्थ को ही दिखाने को लेकर एवं इस प्रकार दिखाने को लेकर लोगों में होड़ मच गयी कि उसमें से सारे रस गायब हो गए। और इसका एक दुष्परिणाम यह हुआ कि प्रोग्रेसिव दिखने के प्रयास में, जागरण करने के प्रयास में हिन्दू आस्था को ही नीचा दिखाने का कार्य किया जाने लगा। क्योंकि जिन लोगों ने इस प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना की थी, उनका दृष्टिकोण हिंदी और हिन्दुओं दोनों के लिए ही साम्प्रदायिकता से भरा हुआ था। एक ही झटके में प्राचीन ठुकराने की बात हो गयी और मध्य काल में जनजागरण का सबसे बड़ा प्रतीक रामचरित मानस वह ग्रन्थ हो गया, जिसमें मात्र धर्म से जुडी साम्प्रदायिकता थी। और कालान्तर में हिन्दू धर्म के विरोध में ही साहित्य रचा जाने लगा, जिसे प्रगतिशीलता की संज्ञा दी गयी।

यही नहीं, जब ऐसे साहित्य को जनता ने पढ़ना बंद कर दिया, तो उन्होंने इसका दोष और किसी पर नहीं हिंदी पर लगा दिया कि हिंदी में वह शक्ति ही नहीं है कि लोगों के मध्य क्रांति उत्पन्न कर सके। वर्ष 1937 में उर्दू-हिंदी के प्रगतिशील लेखकों का दूसरा अधिवेशन हुआ तो उसमें डॉ अब्दुल अलीम का एक लेख था, जिसमें उन्होंने हिंदी और उर्दू दोनों ही लिपियों को अस्वीकार कर रोमन लिपि अपनाने की सलाह दे डाली थी। इस विषय में काका कालेलकर ने कहा था कि “मैं प्रगतिशील लेखक संघ से सहानुभूति अवश्य रखता हूँ किंतु यदि लेखक संघ ने रोमन लिपि के प्रस्ताव को अपना लिया तो उस स्थिति में मैं पूरे आन्दोलन का विरोध करूंगा।” सज्जाद ज़हीर ने किसी प्रकार बीच-बचाव किया और उन्हें कहना पड़ा कि रोमन लिपि के सुझाव का संगठन की नीति से कोई सम्बन्ध नहीं है।

यह हिंदी का दुर्भाग्य था कि स्वतंत्रता के उपरान्त जब उसे पल्लवित होना था, तब सत्ता साम्यवादी विचारों से प्रभावित पंडित जवाहर लाल नेहरू के हाथ में आई, जिनका दृष्टिकोण भी सोमनाथ को लेकर वही था जो सज्जाद जहीर का था।

शनै: शनै: कालांतर में हिंदी साहित्यकारों ने मात्र मार्क्सवादी आलोचकों की दृष्टि में ऊपर उठने के लिए ऐसी रचनाएं रचीं, जिनके चलते हिंदी का पाठक बाज़ार से दूर हो गया क्योंकि उन्होंने साहित्य से रसों को ही दूर कर दिया और यथार्थ के नाम पर भौंडी चीज़ों और स्वयं की यौन कुंठाओं तथा विष्ठाओं को लिखने लगे। जिस भारत में श्रृंगार शतक लिखा गया, जिस संस्कृत में काम सूत्र लिखी गयी, जिस देश में कालिदास ने मेघदूत लिखा उस देश में अब ऐसा साहित्य लिखा जाने लगा था, जिसमें न ही प्रेम था और न ही व्यंग्य! था तो मात्र हिन्दू घृणा से भरी रचनाएँ!

परन्तु इन साहित्यकारों ने इसका ठीकरा हिंदी पर फोड़ा और कहा गया कि कठिन संस्कृत निष्ठ हिंदी पढ़ी नहीं जाती और फिर अंग्रेजी और अरबी फारसी प्रेमियों ने हिंदी को सरलीकरण के बहाने और नीरस बनाना आरंभ कर दिया। जिसका परिणाम यह हुआ कि हिंदी मात्र अनुवाद की भाषा बनकर रह गयी।

साहित्यकार यथार्थ को ही देखकर लिखता है, वह समाज में चेतना उत्पन्न करने के लिए कई मार्गों का आश्रय लेता है, जैसे तुलसीदास जी ने लिया, जैसे सूरदास जी ने लिया, जैसे मीराबाई ने लिया और जैसे कबीर दास जी ने लिया, जैसे अक्क महादेवी ने लिया।

परन्तु कथित यथार्थ के वर्णन मात्र ने हिंदी साहित्य को हिन्दुओं की पीड़ा में वृद्धि करने का ही कार्य किया, क्योंकि जिन लेखकों ने कथित प्रगतिशीलता का दामन थामा था, उनका उद्देश्य ही था कि अतीत के अत्याचारों पर मिट्टी डाल देना और हिन्दू चेतना से उनके साथ हुए सबसे भयानक नरसंहारों को विस्मृत करा देना। सोमनाथ का खंडहर जीवित रखना आवश्यक था, ताकि उन समस्त नरसंहारों को स्मृति में जीवित रखा जा सके और इतिहास से सीखा जा सके। परन्तु जिस आन्दोलन की नींव ही ऐसे लोगों ने डाली हो, जिनकी दृष्टि में सोमनाथ का प्रश्न उठाना ही साम्प्रदायिकता हो, क्या उस प्रगतिशील साहित्य से हिन्दुओं और हिंदी के प्रति कुछ कल्याण की अपेक्षा की जा सकती थी?

नहीं! यही दृष्टि स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद लिखे गए साहित्यकारों के साथ रही। प्रगतिशीलता का अर्थ कभी भी लोक और संस्कृति के विरोध में नहीं होता, परन्तु प्रगतिशील साहित्य ने यही किया। उसने यथार्थ के वर्णन के नाम पर हिन्दू और हिंदी का विरोध करना आरम्भ कर दिया। हिन्दुओं की पीड़ा को साहित्य से दूर ही नहीं किया बल्कि उन्हें ही शोषक घोषित कर दिया।

और कोई भी समाज अपने लिए अपशब्द सुनने के लिए तो पुस्तकें नहीं खरीदेगा? हिंदी साहित्य की कथित प्रगतिशीलता ने हिंदी को जो क्षति पहुंचाई है, उसकी पूर्ति सहज नहीं हो सकती है। मजे की बात यही है कि यही प्रगतिशील हिंदी साहित्यकार, जिन्होनें हिन्दुओं के प्रति साम्प्रदायिक दृष्टि रखते हुए और विभाजनकारी साहित्य रचते हुए साहित्य रचा, उन्होंने ही हिंदी के उत्थान के लिए सरकार से धन लेकर वह योजनाएं आरम्भ की, जिनके माध्यम से और विभाजनकारी साहित्य रचा गया, जिनसे पाठक हिंदी से और दूर हुआ।

परन्तु वह लोग हिंदी को जनमानस से दूर नहीं कर पाए, जैसे ही सोशल मीडिया आया, वैसे ही इन कथित प्रगतिशीलों का हिन्दू घृणा से भरा हुआ चेहरा सामने आया, और आज हिंदी का लेखक मार्क्सवादी आलोचकों पर ध्यान न देते हुए लिख ही नहीं रहा है, अपितु कमा भी रहा है. हिंदी जो इनके रोने धोने से रोजगार से दूर हुई थी, आज उसी तकनीक के माध्यम से वह लोगों को रोजगार दे रही है, जिस तकनीक का यह कथित प्रगतिशील विरोध करते थे.

आज हिंदी ने प्रगतिशील लेखकों के बनाए हुए उन सभी मिथकों को तोड़ दिया है और बाजार हाट की भाषा बनकर रोजगार और व्यापार की भाषा बन गयी है! मजहब विशेष की प्रगतिशीलता का अर्थ मात्र इस्लाम के फैलाव के लिए क्रान्ति करना होता है और कुछ नहीं! और यही भारत में प्रगतिशील साहित्यकारों ने किया, साहित्य के बुर्के में इस्लाम का प्रचार और हिन्दुओं का विरोध!

प्रगतिशीलता की इस परिभाषा ने उन तुलसीदास की आलोचना आरम्भ कर दी जिनकी लिखी एक पंक्ति ने स्वतंत्रता आन्दोलन में क्रान्ति का उद्घोष किया था और वह थी “पराधीन सपनेहूँ सुख नाहीं!”

और इस प्रगतिशीलता ने उस चंद्रकांता संतति को बदनाम कर दिया जिसे पढ़ने के कारण हजारों लोगों ने हिंदी सीखी थी, अत: इस प्रगतिशीलता ने सच्ची प्रगतिशीलता और पाठकों को दूर कर दिया और इस्लामी हिंदी की रचना कर दी, जिसमें हिन्दू विरोधी एजेंडा था! परन्तु चंद्रकांता संतति आज भी पढी जा रही है, रामचरित मानस आज भी सर्वाधिक क्रय होने वाला ग्रन्थ है, और जिस प्रगतिशीलता की दुहाई देकर यह आन्दोलन बना, उसे आज की पीढ़ी समझ ही नहीं चुकी हैं बल्कि उसका विरोध भी कर रही है, तभी हिंदी आज पुन: अपनी उड़ान भर रही है!


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