ओपेक की मनमानी और यूनियनबाजी ढह गयी, सउदी अरब की चैधराहट के कारण सयुक्त अरब अमीरात ने ओपेक को गहरा आधात दिया है और उसकी मनमानी और सउदी अरब समर्थक यूनियनबाजी के खिलाफ चाबूक चला दिया है। संयुक्त अरब अमीरात ने घोषणा की है कि वह तेल उत्पादक देशो के संगठन ओपेक की मनमानी और सउदी अरब की समर्थक नीतियों को स्वीकार करने के लिए बाध्य नहीं है, हम इससे मुक्त हो गये हैं, हमनें ओपेक की सदस्यता छोड़ दी है, अब हम स्वतंत्रत होकर तेल की विश्व व्यवस्था का प्रबंधन करेंगे। संयुक्त अरब अमीरात ने अपनी घोषणा में कहा है कि यह कदम हमारे राष्ट्रीय हितों को सुरक्षित करेगा, हमारी अर्थव्यवस्था को मजबूत करेगा, हमारी दीर्घकालिक रणनीति का प्रमुख हिस्सा है, सबसे बडी बात यह है कि हमारे इस कदम मंें उर्जा के क्षेत्र मे विकास की नयी संभावनाएं बनेंगी, घरेलू उर्जा उत्पादन में विदेशी निवेश बढेगा और वैश्विक उर्जा बाजार में अस्थिरता का दौर समाप्त होगा, स्थिरता आयेगा, अमेरिका-ईरान युद्ध से उत्पन्न स्थितियां समान होंगी, उर्जा संकट दूर होगा, सिर्फ इतना ही नहीं बल्कि उर्जा संकट के कारण दुनिया में बढती महगाई पर अंकुश लगने की संभावना है। वास्तव में संयुक्त अरब अमीरात की नीति अपने आप को एक जिम्मेदार और प्रतिबद्धता से युक्त उर्जा उत्पादक देश के रूप में स्थापित करना है। ओपेक को नेता सउदी अरब है, सउदी अरब के हस्तक्षेप से ही ओपेक की नीतियां बनती हैं और बिगडती है, स्थापित होती हैं, सक्रिय रहती हैं। संउदी अरब को अमेरिका का समर्थन हासिल रहता है। हाल के वर्षो में संयुक्त अरब अमीरात और सउदी अरब के बीच कई प्रश्नों और मुद्दों पर मतभेद गहरे रहे हैं और उनके बीच शह-मात का खेल चलता रहता है, खाडी देशों का नेता कौन होगा, खाडी देशों पर किसकी दमदार उपस्थिति रहेगी, इन सब को लेकर संशय और शीत युद्ध चलता रहता है। पहले सउदी अबर और ईरान का सुन्नी-शिया की मानसिकता युद्धक स्थिति उत्पन्न करती थी पर अब खाडी में सउदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात के बीच टकराव का नया दौर शुरू हो गया है।
खाड़ी देशों के इस संकट और समस्या को जानने और समझने के लिए हमें ओपेक के इतिहास और उसकी नीतियों को जानना-समझना होगा, ओपेक की बाधाएं और यूनियनबाजी कैसी खतरनाक परिस्थितियां बनाती है, विश्व महंगाई को कैसे बढाती हैं, विश्व अर्थव्यवस्था को कैसे प्रभावित करती है? ओपेक की ढहती मनमानी और यूनियनबाजी अमेरिका के लिए खतरे की घंटी है क्या ? ओपेज के इस संकट का लाभ भारत कैसे उठा सकता है? संयुक्त अरब अमीरात से भारत को नयी उर्जा डील करनी होगी? भारत के उर्जा संकट को दूर करने में संयुक्त अरब अमीरात क्या महती भूमिका निभा सकता है क्या ? उर्जा उत्पादन बढेगा, ओपेक की यूनिबाजी ढहेगी, ओपेक का उर्जा उत्पादक देशों पर नियंत्रण घटेगा तो निश्चित तौर पर उर्जा उत्पादन बढेगा। उर्जा उत्पादन बढेगा तो फिर दो महत्वपूर्ण राहतं मिलने की उम्मीद होगी। ये दोनों राहतें हैं क्या? एक राहत यह है कि उर्जा उत्पादन बढेगा तो फिर विश्व उर्जा बाजार में स्थिरता आयेगी और दूसरी राहत यह है कि उर्जा मूल्यों में कमी आयेगी, उर्जा खरीदार के पास ओपेक देशों के अलावा भी अन्य विकल्प होंगे। रूस की तरह संयुक्त अरब अमीरात भी सस्ता तेल बेचकर अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूत कर सकता है।
ओपेक एक अंतर-सरकारी संगठन है, तेल उत्पादक प्रमुख देश इसके सदस्य हैं। इस संगठन का मुख्यालय खाडी देशों में नहीं है। फिर ओपेक का मुुख्यालय कहां हैं? ओपेक का मुख्यालय खाडी देशों से दूर आस्ट्रिया के वियना में है। इस संगठन का प्राथमिक उद्देश्य उर्जा उत्पादक देशों के हितों को संरक्षित करना और उर्जा जरूरतों का लाभ उठाकर अधिकतम लाभ कमाना है। इसकी स्थापना 1960 में हुई थी। इसकी सदस्यता की प्रमुख बातें यह है कि इसके दो ऐसे सदस्य हैं जिनकी पृष्ठभूमि और रणनीति अमेरिका विरोधी है। ईरान और वेनेजुएला भी इसके सदस्य है। ईरान में शाह शासन की समाप्ति के बाद इस्लामिक क्रांति हुई और घोर इस्लामिक शासन स्थापित हुआ। शाह शासन अमेरिका के हितों की रक्षा करता था और अमेरिका-यूरोप की संस्कृति का वाहक था। इस्लामिक शासन में अमेरिका के हितों पर हमेंशा छूरी चलती थी। यही कारण है कि अमेरिका ईरान विरोधी रहा था। वर्तमान में अमेरिका का ईरान पर हमला के कारणों के पीछे भी यही तथ्य थे। ईरान का भविष्य ओपेक के अंदर क्या होगा? इस पर संशय है। इतना तय है कि ईरान की स्थिति भी अब कोई खास नहीं होगी। ईरानी तेल कुंओ पर अमेरिकी कंपनियों का दबदबा होगा जो अपने हितों का संरक्षण करेगी। ओपेक का सबसे बडा तेल उत्पादक देश वेनेजुएला है। वेनेजुएला के पास 303 अरब बैरल तेल है और इसके अलावा उसके पास गैस का भी भंडार है। वर्तमान मे वेनेजुएला की स्थिति क्या है? यह सभी जानते हैं। वेनेजुएला पर अमेरिका ने कब्जा कर लिया है और वेनेजुएला के राष्ट्रपति का अपहरण कर लिया है, वेनेजुएला का राष्ट्रपति अभी भी अमेरिकी जेलों में बंद है। अभी-अभी अमेरिका ने वेनेजुएला का यूरेनियम पदार्थ अपने कब्जे में लिया है। वेनेजुएला के यूरोनियम से अमेरिका अरबों डालर का लाभ कमायेगा। वेनेजुएला का तेल भंडार और उर्जा के अन्य संसाधनो पर अमेरिकी गिद्ध दृष्टि लगी रहेगी, अमेरिका जैसा चाहेगा वैसा करेगा। वेनेजुएला के तेल भंडार और उर्जा के अन्य स्रोतों का दोहन कर अमेरिका अपनी तिजोरी भरेगा, अपनी अर्थव्यवस्था मजबूत करेगा। कहने का अर्थ यह है कि अमेरिका ओपेक के नियमों की अवहेलना करने से भी पीछे नहीं रहेगा। इस कारण ओपेक के कमजोर होने या निरर्थक होने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता है। ओपेक प्लस भी संकट के दौर से गुजर रहा है।
जहां तक भारत का प्रश्न है तो निश्चित तौर पर ओपेक से संयुक्त अरब अमीरात का अलग होना शुभ संकेत है। अभी-अभी भारत के प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी का एक बयान आया है। नरेन्द्र मोदी ने अपने नागरिकों से निवेदन किया है कि वे तेल का खपत कम करें, क्योंकि वैश्विक बाजार में तेल की कीमतों में बाढ आयी हुई है, आग लगी हुई। नरेन्द्र मोदी ने वर्क फाॅर होम का सिद्धांत दिया है। भारत के पास कोई बडा तेल कुआ भी नहीं है। तेल और उर्जा के अन्य स्रोतों की आवश्यकता के लिए भारत को आयात पर निर्भर रहना पडता है। भारत ने रूस और यूक्रेन युद्ध का लाभ उठाया और सस्ता तेल खरीद कर अपने नागरिकों को सस्ता तेल उपलब्ध कराया और देश की अर्थव्यवस्था को स्थिर रखा। पर रूस से सस्ता तेल खरीदने को लेकर अमेरिका की दादागीरी भारत पर भारी पड गयी। डोनाल्ड ट्रम्प ने न केवल भारत को धमकी दी बल्कि कई प्रकार के प्रतिबंधों को भी लागू कर दिया, भारतीय वस्तुओं के निर्यात पर बेतहाशा ट्रैरिफ लगायी। इस कारण भारत को झुकना पडा, भारत की उर्जा परिस्थितियां खतरनाक हो गयी। भारत ने रूस से तेल खरीदना सीमित कर दिया। वर्तमान में भारत उर्जा की खतरनाक परिस्थितियों का सामना कर रहा है। इस खतरनाक परिस्थितियों में संयुक्त अरब अमीरात का यह कदम बहुत ही राहतकारी है और भारत के उर्जा संकट को दूर करने जैसा हो सकता है। दुनिया के उर्जा विशेषज्ञ यह समझ रहे हैं कि संयुक्त अरब अमीरात अब ओपेक और सउदी अरब को नीचा दिखाने और इनकी चैधराहट को चुनौती देने के लिए कुछ अलग और नया करेगा। कुछ अलग और नया क्या हो सकता है? संयुक्त अरब अमीरात अपना तेल उत्पादन बढायेगा। तेल उत्पादन प्रतिदिन 50 से लेक 60 लाख बैरल तक बढायेगा। भारत और संयुक्त अरब अमीरात के बीच रिश्ते में गर्माहट है और मजबूती भी है। सबसे बडी बात यह दोनों देशों के बीच तेल के प्रश्न पर भी संबंध अच्छे है। भारत अपनी जरूरतों का 10 प्रतिशत तेल संयुक्त अरब अमीरात से खरीदता है। संयुक्त अरब अमीरात अपना तेल उत्पादन बढायेगा तो फिर वह बेचेगा कहां? भारत जैसे देश ही खरीददार होंगे। सबसे बडी बात यह है कि निवेश के स्तर पर भी भारत के पास संभावनाएं होंगी। संयुक्त अरब अमीरात के तेल कुओं के उत्खनन में निवेश कर सकता है। संयुक्त अरब अमीरात ने भी विदेशी निवेश की अपेक्षाएं व्यक्त की है। अमेरिकी तेल कंपनियों की गिद्ध दृष्टि भी लगी हुई है।
ओपेक को लेकर भारत के साथ कूटनीतिक समस्याएं भी हैं। ओपेक का नेता सउदी अरब है। सउदी अरब से हमारे कूटनीतिक संबंध बहुत ही मजबूत है। सउदी अरब ने भारत विरोधियों और आतंकियों पर नियंत्रण में हमारी मदद की है, कई दुर्दात आतंकियों को पकड कर हमें सौपा है और अपने देश मे भारत विरोधियों और आतंकियों की शरणस्थली उजाडी है। सउदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात की इस लडाई में भारत को सावधानी बरतनी होगी, पक्षपात की नीतियों से बचना होगा, स्वतंत्र-निष्पक्ष कूटनीति अपनानी होगी। क्योकि भारत सउदी अरब से भी तेल और उर्जा की जरूरतों को पूरा करता है। हम केवल संयुक्त अरब अमीरात पर निर्भर नहीं रह सकते हैं। ओपेक का विखराव और ढहती मनमानी भारत के लिए एक अवसर जरूर है।
— आचार्य श्रीहरि
