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Thursday, August 11, 2022

विश्व इमोजी दिवस पर बात लक्ष्मी कौल की, हिन्दू नायिका की, जिन्होनें फेसबुक से पूछा “आखिर क्यों नहीं हैं हिन्दू धार्मिक प्रतीक उसके ‘avtar-अवतार’ विशेषता में?”

आज विश्व इमोजी दिवस है, और इसका अर्थ है कि हम जो कहना चाहते हैं, उसे चित्रों के माध्यम से व्यक्त कर दिया जाए। वह एक विशेष संदेश लिए होते हैं। आज जब हम इमोजी की बात करते हैं, तो फेसबुक पर एक फीचर है और वह है “अवतार” का! उसमें अभी हम देखते हैं कि हम हिन्दू वेशभूषा में भी “अवतार” बना सकते हैं। परन्तु जब फेसबुक ने यह फीचर अपने यूजर्स के लिए प्रस्तुत किया था, तो उसमें हिन्दू वेशभूषा नहीं थी।

उसमें एशिया के लिए या कहें हिन्दुओं के लिए उनके प्रतीकों का स्थान नहीं था। या तो ईसाई वेशभूषा थी, या फिर हिजाबी एक्स्सेसरीज! यह फीचर पहले यूके में प्रस्तुत किया गया था और फिर भारत में बाद में आया था। जब वह भारत में आया तो बिंदी थी, साड़ी थी, तो क्या यह अपने आप हुआ था? क्या बिंदी को अपने आप जोड़ दिया गया था, या फिर उसके पीछे किसी ने लड़ाई लड़ी थी?

क्या फेसबुक ने स्वत: यह कदम उठाया था, संभवतया यह प्रश्न कभी हमारे मस्तिष्क में आया ही नहीं होगा, क्योंकि हमें यह आवश्यक लगा ही नहीं। हमने यह सोचा ही नहीं होगा कि क्या सोशल मीडिया पर हमारी सांस्कृतिक पहचान को प्रस्तुत करने के लिए किसी ने फेसबुक से “पंगा” भी लिया होगा? कहने के लिए यह छोटी बात है, परन्तु फेसबुक के इस निर्णय के प्रति विरोध किया गया था!

फेसबुक का विरोध करने वाली और कोई नहीं एक साड़ी और बिंदी को अपनी जीवन में आत्मसात करने वाली “लक्ष्मी कौल” हैं! लक्ष्मी कौल का नाम भारत में आम लोगों के बीच लोकप्रिय नहीं है, या कहें परिचित भी नहीं है। लक्ष्मी कौल, ब्रिटेन की धर्मनिष्ठ हिन्दू नागरिक हैं।  वह वहां पर रहकर हिन्दू संस्कृति पर गर्व करवाना सिखा रही हैं। लक्ष्मी कौल ने अपने अथक प्रयासों के चलते ब्रिटिश संसद में हिन्दुओं के जीनोसाइड को मान्यता दिलवाई थी और अभी जब कश्मीर फाइल्स के निर्माण के बाद विवेक अग्निहोत्री ह्युमेनीटी टूर पर ब्रिटेन गए थे तो उस आयोजन की तस्वीरों को रीट्वीट करते हुए लिखा था कि अब पनुन कश्मीर जीनोसाइड बिल को मान्यता दिलवाना और लागू करवाना अगले चरण हैं:

हिन्दू संस्कृति और हिन्दू पहचान के प्रति जो वह युद्ध लड़ रही हैं, उसी युद्ध में एक छोटा परन्तु अत्यंत महत्वपूर्ण पड़ाव था फेसबुक पर “अवतार” वाले खेल का। जरा सोचिये कि फेसबुक पर करोड़ों हिन्दू जब अपनी पहचान खोज कर स्वयं का प्रतिनिधित्व करने जाते तो उन्हें उनकी सांस्कृतिक पहचान से ही वंचित कर दिया जाता, तो क्या होता?

परन्तु लक्ष्मी कौल ने इस सम्बन्ध में twitter पर भी आवाज उठाई थी और लिखा था कि, बिंदी आदि क्यों नहीं हैं?

उन्होंने लिखा था कि

“मैंने इग्नोर करने का प्रयास किया, मगर नहीं कर सकती? क्यों समावेश का अर्थ हमेशा हिजाब होता है? क्यों हम किसी साड़ी और बिंदी को समावेश के रूप में नहीं देख सकते हैं? फेसबुक जहां आपको इन नए अवतारों को प्रस्तुत करने में गर्व हो रहा है, तो मेरे लिए यह महा विफलता है!”

उसके बाद उन्होंने गार्जियन में भी एक लेख लिखा और कहा कि “गेम ऑफ अवतार्स: फेसबुक, मेरा प्रतिनिधित्व कहाँ है?”

यह सही है कि कुछ लोग कह सकते हैं कि उस समय वह भारत में प्रस्तुत नहीं किये गए थे, इसलिए साड़ी बिन्दू को सम्मिलित नहीं किया गया था, परन्तु उन्हें उस समय मात्र अमेरिका और यूके मेंलाया गया था, तो हिजाब क्यों सम्मिलित किया गया था? यह पश्चिम और वामपंथ द्वारा किया गया एक बहुत बड़ा भेदभाव है कि उन्हें हिन्दू और हिन्दू प्रतीक दिखाई नहीं देते हैं। हिन्दू प्रतीक उनके लिए एकदम त्याज्य हैं, हिन्दू प्रतीक उनके लिए शर्म का प्रतीक हैं, इसलिए जहाँ वह हिजाब सम्मिलित करते हैं, मगर चूड़ी और बिंदी उनके लिए गुलामी के प्रतीक हैं, जबकि हिजाब के लिए वह भारत में आन्दोलन करते हैं, उन्हें मुस्लिमों की पहचान से जोड़ते हैं।

परन्तु हिन्दुओं की पहचान बिंदी से जोड़ते ही उन्हें कुछ हो जाता है। वहीं फेसबुक जो कर रहा था, वह सामाजिक मृत्यु का एक उदाहरण था, जिसे क्लौडिया कार्ड ने बताया है। सोशल साईट पर हिन्दुओं की सोशल डेथ की जा रही थी। परन्तु लक्ष्मी कौल ने इसका विरोध किया।

उन्होंने अपने लेख में लिखा कि एक साड़ी पहनने वाली और बिंदी से प्यार करने वाली ब्रिटिश भारतीय होने के नाते उन्हें यह देखना बहुत ही हैरान और परेशान कर रहा है कि एक सोशल मीडिया बड़ा समूह जिसमें उनके देशज एवं सोशल प्रोफाइल के एक विशाल डेटाबेस के बाद भी उनकी वर्चुअल उपस्थिति के लिए कोई भी “अवतार नहीं है”

फिर उन्होंने यह भी लिखा था कि यह पहली बार नहीं हो रहा है और यह सोशल मीडिया तक ही सीमित नहीं है, बल्कि विविधता और समावेश में मुख्यत: या तो एक श्वेत चेहरा, अश्वेत चेहरा और एक हिजाब पहने हुए महिला दिखाई देती है, मगर इस समावेश में साड़ी/सलवार कमीज और बिंदी क्यों सम्मिलित नहीं है?

उनके द्वारा यह बात उठाए जाने पर, जो उन्होंने twitter पर उठाई थी, और #ThisIsMyAvatar ट्रेंड हुआ था। इसके कुछ दिनों के बाद जब भारत में यह प्रस्तुत किए गए तो उनमें अंतत: साड़ी एवं बिंदी सम्मिलित की गयी थी और फिर लक्ष्मी कौल ने twitter पर लिखा था कि

उन्हें प्रसन्नता है कि उन्होंने लाखों साड़ी पहनने वालों के साथ फेसबुक के खिलाफ आवाज उठाई थी, और जिसका परिणाम रहा कि साड़ी और सलवार कमीज को अवतारों में सम्मिलित किया गया

फेसबुक ने जब अवतार सम्मिलित किए तो उसमें बिंदी,साड़ी आदि सभी सम्मिलित थीं।

https://www.indiatoday.in/technology/news/story/facebook-has-launched-avatars-in-india-here-s-how-you-can-create-your-own-1695565-2020-06-30

आज इमोजी दिवस के अवसर पर इन हिन्दू नायकों की बात करना आवश्यक है जो सोशल मीडिया पर सामाजिक मृत्यु न हो यह भी सुनिश्चित कर रहे हैं एवं हिन्दू जीनोसाइड को पहचान दिलाने के लिए भी लड़ रहे हैं!

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