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Sunday, April 21, 2024

मातृभाषा दिवस पर विशेष: भाषांतरण के चलते संस्कृत एवं हिन्दी के साथ दुराग्रहपूर्ण व्यवहार: कौन करेगा विमर्श?

आज विश्व में अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस मनाया जा रहा है।  यह बहुत ही अजीब बात है कि भारत में जहां एक ओर भाषाई एकात्मकता को बढ़ाने आदि को लेकर अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस मनाने की बात होती है और भाषा के स्तर पर संस्कृत से उपजी भारतीय भाषाओं को लेकर दुराग्रह का अभियान ही जैसे चलाया जा रहा है क्योंकि संस्कृत से लेकर हिन्दी तक अपमान निरंतर हो रहा है।

संस्कृत का आंकलन मात्र भाषांतरण या कहें उसके अंग्रेजी स्थानापन्न शब्दों के आधार पर किया जा रहा है।  संस्कृत को यह कहकर अपमानित किया जाता है कि इसमें न ही प्रेम है और न ही लोरी।  इतना ही नहीं इसमें लिखे गए विभिन्न प्रकार के मन्त्रों एवं श्लोकों का भाषांतरण के आधार पर विकृतीकरण भी आम है।  

अवधारणात्मक शब्द जो एक भाषा में भिन्न अवधारणा लिए हुए हैं, उन्हें दूसरी अवधारणा के आधार पर आंका जाता है, इतना ही नहीं हिन्दी के सहज अवधी बोली के शब्द भी पिछड़े ठहरा दिए जाते हैं और वह भी भाषांतरण एवं राजनीतिक दुराग्रह के आधार पर।

आज जब पूरा विश्व मातृभाषा दिवस मना रहा है, ऐसे में हिन्दू ही एकमात्र समुदाय है जो अपनी भाषा के साथ हो रहे दुराग्रह पूर्ण व्यवहार को देख रहा है क्योंकि उसकी भाषा के शब्दों की अवधारणाएं अब्राह्मिक आधार पर देखी जाती हैं।  

अभी हाल ही में कथित प्रेम दिवस अर्थात 14 फरवरी को भारतीय पशु कल्याण बोर्ड ने एक अपील जारी की थी, जिसमें कहा गया था कि 14 फरवरी का दिन काऊ हग डे अर्थात गाय आलिंगन दिवस के रूप में मनाएं! परन्तु चूंकि गाय शब्द, जिसे अब्राह्मिक अवधारणा में मात्र एक जानवर तक सीमित कर दिया गया है, या फिर उससे भी नीचे तो इस अपील का मजाक उड़ाया गया और साथ ही इस सीमा तक विरोध किया गया कि इस अपील को वापस लेना पड़ा।  

ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि संस्कृत की अवधारणा अर्थात हिन्दू की अवधारणा में गाय पवित्र मानी गयी है।  गाय के दूध को अमृततुल्य माना गया है और वेदों में गौ माता को अवध्या कहा गया है।  

यहाँ पर संस्कृत अर्थात मातृभाषा में गाय एक ऐसा पवित्र शब्द है, जिसके साथ वात्सल्य जुड़ा हुआ है, जिसके लिए पहली रोटी निकाली जाती है तो दूसरी ओर वह सोच है जहाँ पर गाय को रोटी में लपेटकर खाया जाता है।  

हर शब्द जो हिन्दू धर्म की महत्ता का है, जिसमें हिन्दू धर्म के प्राण कहे जाते हैं, उसका उपहास उड़ाया जाता है, उसका अर्थ ही ऐसा कर दिया जाता है कि वह उपहासात्मक प्रतीत होने लगता है जैसे कि गाय शब्द है।   जिस गाय को लेकर वेदों में न जाने कितने श्लोक लिखे गए, न जाने महत्ता में क्या क्या नहीं लिखा गया, उसे आज उपहासात्मक शब्द ही नहीं बल्कि अपमानजनक एवं तुच्छ शब्द बना दिया गया है।  

आए दिन कथित वह सभ्य लोग इस शब्द का अपमान करते हुए दिख जाते हैं, जो भाषाई राजनीति करते हुए हिन्दी को अपमानित करते हैं।  

जिस गाय के लिए वेदों में आह्वान किए हुए हैं, उस गाय को अपमानित किया जाता है! ऋग्वेद के प्रथम मंडल में कई मन्त्र हैं जो गाय को समर्पित हैं, जैसे

ऋग्वेद संहिता, प्रथम मंडल, सूक्त 4, द्वितीय अनुवाक ::  ऋषि :- मधुच्छन्दा वैश्वामित्र। देवता :- इन्द्र। छन्द :- गायत्री]

सुरूपकृलुमूतये सुदुघामिव गोदुहे। जुहूमसि द्यविद्यवि॥

गो दोहन करने वाले के द्वारा, प्रतिदिन मधुर दूध प्रदान करने वाली गाय को जिस प्रकार बुलाया जाता है, उसी प्रकार हम अपने संरक्षण के लिये सौन्दर्य पूर्ण यज्ञ कर्म सम्पन्न करने वाले इन्द्र देव का आह्वान करते है।[ऋग्वेद 141]

दुहने हेतु गौ को पुकारने वाले के समान, अपनी सुरक्षा के लिए हम उत्तम कर्मा इन्द्रदेव का आह्वान करते हैं।

The manner in which a person who extract milk from the cow calls her, with affection & regard, we invite Indr Dev who perform excellent deeds, for the protector of our Yagy।

मनो न योऽध्वनः सद्य एत्येकः सत्रा सूरो वस्व ईशे। 

राजाना मित्रावरुणा सुपाणी गोषु प्रियममृतं रक्षमाणा॥

मन की तरह शीघ्रगामी जो सूर्यदेव स्वर्गीय पद में अकेले जाते हैं, वे तुरन्त ही विविध धन प्राप्त करते हैं। शोभन और सुबाहु मित्र और वरुणदेव हमारी गौओं के प्रीतिकर और अमृत तुल्य दूध की रक्षा करते हुए अवस्थान करें।[ऋग्वेद 1719]

मन के समान द्रुतगति वाले, मेधावी लोगों को दाता सुन्दर भुजाओं वाले सखा और वरुण हमारी गौओं के श्रेष्ठ और अमृत तुल्य दूध की रक्षा करें।

Sury Dev who moves fast like the innerself-Man,  becomes alone in his heavenly path and gets various kinds of wealth।  Let Mitr & Varun Dev protect the excellent milk of our cows।

परन्तु जिस मातृभाषा में गाय को लेकर ऐसी अवधारणा है, उसी भारत में गाय को लेकर एक अजीब सोच का विकास हो गया है।  क्या संस्कृत एवं संस्कृत में निहित हिन्दू अवधारणाओं के निरंतर अपमान पर बात तक नहीं होनी चाहिए?

यह भी अपमानजनक है कि हिन्दुओं को और नीचा दिखाने के लिए एक शब्द प्रयोग किया जाता है “काऊ बेल्ट” अर्थात गोबरपट्टी! ऐसा कहा जाता है कि यहाँ के लोग गंवार होते हैं।  परन्तु गंवार की परिभाषा क्या है? गंवार को अपमानजनक या नीचा शब्द क्यों कहा जाने लगा है?

जैसे संस्कृत का गाय शब्द अवधारणात्मक घृणा का शिकार है, वैसे ही गंवार शब्द भी उस घृणा का शिकार है, जो कथित अंग्रेजी बोलने वालों को हिन्दी बोलने वालों से होती है।  

आदरणीय गोस्वामी तुलसीदास रामचरित मानस में लिखते हैं

स्यामसुरभि पय बिसद, अति गुनद करहिं सब पान,

गिराग्राम्य सिय राम जस, गावहिं सुनहिं सुजान!

अर्थात,काली गाय का दूध उज्जवल और अत्यंत गुणदायक जानकर भी सब पान करते हैं, उसी तरह गँवारी बोली में कहे गए सियाराम के यश को सज्जन लोग गान करते हैं और सुनते हैं।

मगर जब इसका अंग्रेजी अनुवाद होता है तो ‘द रामायण ऑफ तुलसीदास‘ में यह गंवारू अर्थात ग्राम्य भाषा को रफ (असभ्य) भाषा कर दिया जाता है। इसके अनुवाद में लिखा गया है –

The milk cow can be black; its milk is white and very wholesome, and all men drink it and so though my speech is rough, it tells the glory of Sita and Rama and will therefore be heard and repeated with pleasure by sensible people।

अंग्रेजों के लिए ग्राम का अर्थ पिछड़ा था, गाय एक पशु थी एवं हमारे यहाँ की व्यवस्था एक नई दुनिया।  वनवासियों की दुनिया पर उन्होंने जो किताबें लिखी हैं, उन्हें पढ़कर ज्ञात होता है कि वह एक उन्मुक्त एवं स्वतंत्र समाज देखकर हतप्रभ हैं।  ‘छोटा नागपुर के ओरांस’ (‘the oraons of chota nagpur’) में उराऊं की समृद्ध परम्परा देखकर हैरान हैं। वह यह देखकर हैरान हैं कि कैसे जंगलों में रहने वाले लोग धरती माता और सूरज का रिश्ता जोड़कर खुद को सांस्कृतिक रूप से समृद्ध किए हैं। वह यौन स्वतंत्रता देखकर भी हैरान हैं।

अब जिनके लिए लोक भाषा का अर्थ ही रफ (असभ्य) भाषा है, वह किस तरह से ग्रामीण जीवन और उसके साथ ही साथ प्रकृति की निकटता को समझ पाएंगे? जिस भारत में उन्होंने कदम रखा वह भारत प्रकृति से प्रेम करने वाला भारत था, नदियों को पूजने वाला भारत था। (कृपया नदियों के सम्बन्ध में अभी की जा रही लापरवाही का उदाहरण न दिया जाए क्योंकि नदियों का प्रदूषण भी औपनिवेशिक काल में आरम्भ हुआ), वह जिस भारत में आए उसके सुदूर गावों में जो व्यवस्था थी वह उसके लिए पर्याप्त थी।

आज जब मातृभाषा दिवस मनाया जा रहा है तो हिन्दुओं के साथ हो रहे इस भाषाई अत्याचार और दुराग्रह पर बात कौन करेगा?

क्या संस्कृत के साथ हो रहे इस दुराग्रहपूर्ण व्यवहार पर इसलिए मातृभाषा दिवस पर बात नहीं होगी कि वह इस समय किसी की मातृभाषा नहीं है? या फिर इसलिए बात करना अनिवार्य है क्योंकि संस्कृत ही तमाम भाषाओं का मूल कही जाती है।  

वह गाँव जिससे लोक जुड़ा हुआ है, उससे सम्बन्धित शब्द गंवार को rough जब कर दिया जाएगा या फिर गौ माता को जब एक पशु के रूप में भाषांतरित कर दिया जाएगा तो पूरी अवधारणा ही नष्ट हो जाएगी।  मातृभाषा दिवस पर आवश्यक है कि हिन्दुओं (धर्मनिष्ठ) हिन्दुओं के साथ भाषा को लेकर जो दुराग्रह एवं घृणा पूर्ण प्रसंग किए जा रहे हैं, उन पर बात हो कि भाई इतनी घृणा किसलिए?

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