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Friday, April 17, 2026

मेरी समझ के दायरे में राधाकृष्णन का मूल्याकंन

गुजरात विधान सभा 2012 की बात है। गुजरात विधान सभा चुनाव के एक नियंत्रक, प्रवेक्षक और विश्लेषक मैं भी था। मेरी जिम्मेदारी चुनाव प्रचार की खामियां, कमजोरियां निकालना था और प्रचार के मुद्दे खोजने थे, चुनाव प्रचारको की उपियोगिता भी देखनी थी। साथ ही साथ मुझे हिन्दी अखबारों और सोशल मीडिया के लिए विश्लेषनात्मक आलेख भी प्रतिदिन लिखने थे। मेरा कार्य्र बहुत ही दुरूह था, भाषा की समस्या थीं, गुजराती से अनभिज्ञ था और अंग्रेजी में हाथ तंग थे। मेरी दिलचस्पी इस विषय में ज्यादा थी कि बाहर से आने वाले नेता कितना चाकचौबंद चुनाव प्रचार करते हैं या फिर हवाहवाई मनोरंजन करते हैं। इसी सर्वेक्षण के दौरान में मुझे सीपी राधाकृष्णन का नाम मालूम हुआ। सीपी राधाकृष्णन को मैं अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्री कार्यकाल से जानता था, वे 1998 में संसद बने थे। सिर्फ नाम से जानता था और उनसे कभी नहीं मिला था।

नरेन्द्र मोदी की विघान सभा क्षेत्र मणिनगर में अनुराग ठाकुर की सभा थी। उस समय अनुराग ठाकुर भारतीय जनता युवा मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे। मैं भी अंकेक्षण के लिए वहां उपस्थित था। उसी दौरान मुझे सीपी राधाकृष्णन के आने की सूचना मिली। मैं अनुराग ठाकुर की सभा में ही सीपी राधाकृष्णन से मिला। सीपी राधाकृष्णन हिन्दी नहीं जानते थे और न ही उन्हें गुजराती आती थी। दुभाषीय के माध्यम से मेरी उनसे बात होती है। इसी दौरान समाजवादी नेता और राजनारायण के शिष्य क्रांति प्रकाश मिल गये। क्रांति प्रकाश पहले से ही सीपी चन्द्रशेखर के घनिष्ठ मित्र थे। मेरीे तारीफ क्रांति प्रकाश ने जमकर की, इस कारण सीपी राधाकृष्णन हमसे प्रभावित हुए और उन्होंने अपनी सभाओं के लिए मुझे आमंत्रित कर लिया। वे आमंत्रित नहीं करते तो भी मैं उनकी सभाओं में सक्रियता रखता ही, क्योंकि मेरी जिम्मेदारी में वह निहीत था। सीपी राधाकृष्णन की चुनावी दृष्टिकोण और तमिल लोगों को आकर्षित करने के कारक विन्दु को भी मुझे जानना था।

सीपी राधाकृष्णन जब हिन्दी, गुजराती नहीं जानते हैं तब उन्हें गुजरात विधान सभा चुनाव प्रचार के लिए आमंत्रित क्यों किया गया? मेरे मन में बहुत ही क्रोधित करने वाले प्रश्न खडे हो रहे थे। मैंने सीधे भाजपा कार्यालय को फोन लगा दिया। पता चला कि कुछएक वोट तमिल भाषाई लोगों के हैं। इसी कारण उन्हें प्रचार के लिए आमंत्रित किया गया है। सीपी राधाकृष्णन के साथ चुनाव प्रचार के लिए मैं जाता हूं। क्रांति प्रकाश भी साथ रहते हैं। एक तमिल भाषाई कालोनी में जाते हैं जहां पर उनकी सभा रखी गयी थी। पर वहां सभा नाम की कोई चिन्ह और तैयारी नहीं थी। एक मंदिर में बीस-पच्चीस लोग होते हैं। शायद ये तमिल भाषायी मछुआरे और मजदूर थे पर बहुत ही गरीब थे। बीस-पच्चीस लोगों के बीच भी उन्होंने आराम से अपना भाषण तमिल में दिया।

मुझे याद है कि उन्होंने कहा था कि व्यक्तिगत लाभ के लिए देश को खतरे में नहीं डालना चाहिए और हमारे लिए देश महत्वपूर्ण है। चूंकि गुजरात सीमावर्ती प्रदेश हैे, इसीलिए पाकिस्तान के निशाने पर है, नरेन्द्र मोदी की वीरता को पराजित करने का अर्थ राष्ट्र की अस्मिता को कमजोर करना होगा। सभा समाप्त होने के बाद हमलोग गांधी आश्रम लौट गये, जहां पर राधाकृष्णन ठहरे हुए थें वहां पर उन्होंने रात में रूकने का आग्रह किया और साथ में खाना भी खाया। रात के काफी देर तक राधाकृष्णन, मैं और क्रांति प्रकाश देश की राजनीति और नरेन्द्र मोदी की राजनीतिक वीरता और सत्यनिष्ठा पर बात करते रहे थे। उनकी बातों से मुझे समझ में आ गया था कि वे राष्ट्रीय स्तर के ज्ञान रखते हैं और हिन्दी नहीं जानने के कारण उनकी राजनीतिक उडान आसमान नहीं छुऐगी। मैने उन्हें महात्मा गांधी का पाठ पढाना जरूरी समझा। मैंने उन्हें सीधे तौर पर कह दिया कि बडा बनना है तो हिन्दी को जानिये, उदाहरण मैं महात्मा गांधी को देता हूं, महात्मा गंाधी हिन्दी भाषी नहीं थे, वे गुजराती थे, लेकिन उन्होंने गुजराती की जगह हिन्दी को अपने संवाद की भाषा बनायी। अगर आप हिन्दी-गुजराती जानते तो इस विधान सभा चुनाव में आपके विचार मीडिया के सिर चढ कर बोलते। यही कारण है कि आपकी सभा के भाषण मीडिया बाजार में धमाका नहीं कर सका। सीपी राधाकृष्णन ने मेरी इस सीख पर सिर्फ इतना कहा था यू आर राइट।

हिन्दी को लेकर उनकी राय स्पष्ट होने से मैं प्रसन्न था। सीपी राधाकृष्ण्न ने मुझसे कहा कि दक्षिण का हिन्दी विरोध आंदोलन आत्मघाती था, बेवहियात था और अदूरदर्शी था। उनका कहना साफ था कि हिन्दी विरोध का प्रश्न सस्ती राजनीति थी। अपने फायदे के लिए हिन्दी के खिलाफ वातावारण बनाया गया। हिन्दी नहीं जानने के कारण दक्षिण के युवाओं को उत्तर भारत में रोजगार नहीं मिल पाया। रजनीतिज्ञ भी इसका शिकार हुए हैं। हिन्दी नहीं जानने वाले राजनीतिज्ञ अखिल भारतीय स्तर पर अपना जनाधार विकसित नहीं कर पाये। तमिल के राजनीतिज्ञ हिन्दी इलाके मे तो क्या बल्कि कर्नाटक और आध्रप्रदेश में भी विख्यात नहीं हो सके, जहां पर कन्नड और तेलगू का प्रभाव है। उनकी यह समझ बहुत ही चाकचौबंद थी। दक्षिण में सिर्फ तमिल ही नहीं बल्कि कन्नड, मलयालम, तेलगू जैसी मजबूत भाषाएं हैं और इनकी पहचान भी अलग है। इसी के साथ ही साथ राधाकृष्ण्न अंग्रेजी के प्रति भी आग्रही हैं। अंग्रेजी भाषा का विरोध को भी वे असंगत मानते हैं। 

लंबे समय तक राजनीति के मुख्य धारा में होने के बाद भी इनकी पहचान राष्ट्रीय नेता की नहीं बन सकी थी। कारण उपर के तथ्यों में निहित है। एकाएक इनके भाग्य का पिटारा खुलता है और ये राज्यपाल बना दिये जाते हैं। मुझे यह खबर सुनकर अच्छा लगा। सौभाग्य से ये हमारे गृह प्रदेश झारखंड के राज्यपाल थे। लेकिन मैं ठहरा संत और फक्कड संस्कृति का मनुष्य। किसी के पीछे भागना मुझे अच्छा लगता नहीं है, यह मेरी कार्य संस्कृति का हिस्सा नहीं है। मैंने गुजरात के बाद फिर कभी सीपी राधाकृष्ण्न से मिलने और बात करने की जरूरत ही नहीं समझी। जब ये झारखंड के राज्यपाल थे तब भी मुझे इनसे बात करने की इच्छा नहीं हुई और न ही मैं कभी गुजरात प्रसंग के इतिहास पर चर्चा करने की जरूरत समझी।

अब ये उप राष्ट्रपति बनने जा रहे हैं। भाजपा ने इन्हें उप राष्ट्रपति का उम्मीदवार घोषित कर दिया है। भाजपा के पास बहुमत है। इसलिए ये निश्चित तौर पर उपराष्ट्रपति बनने जा रहे हैं। सीपी राधाकृष्ण्न को उपराष्ट्रपति बनाना भाजपा की नीति दूरदष्टि हैं और नरेन्द्र मोदी का मास्टर पोलिटकल स्ट्रोक हैं। निशाना दक्षिण की राजनीति है, तमिल की राजनीति है। तमिलनाडु की राजनीति में इसका प्रभाव पडने वाला है। तमिलनाडु की राजनीतिक सत्ता द्वार पर भाजपा दस्तक दे रही है, जनाधार लगातार मजबूत हो रहा है। तमिल भाषाई आबादी के बीच नरेन्द्र मोदी और भाजपा के प्रति हमदर्दी बढी होगी और भविष्य में बढेगी। ऐसी उम्मीदो को खारिज करना मुश्किल है। 

सीपी राधाकृष्ण्न को दूरदर्शिता दिखाने की जरूरत होगी। इसके पहले भी भाजपा ने बैेंकेया नायडू को उपराष्ट्रपति बनाया था। लेकिन नायडू ने अपनी कोई पहचान नहीं छोड पाये और दक्षिण में भाजपा का कोई लाभ नहीं दिला सके। सीपी राधाकृष्ण्न को अति महत्वाकांक्षा से मुक्त होना होगा, आत्मघाती बनने की मानसिकता से दूर रहना होगा। राज्य सभा के संचालन में शक्ति प्रदर्शन करने की जरूरत होगी। नरमी घातक होगी। सख्ती की भाषा से ही सदन की गरिमा बचेगी, शांति की उम्मीद बनेगी। इस मंत्र को अपना कर्म बनाना होगा।

हमें गर्व है कि उप राष्ट्रपति के पद पर बैठने जाने वाले सीपी राधाकृष्ण्न कभी मेरे चुनावी सहचर्य और संवाद की शख्सियत रहे है, मैंने उन्हें हिन्दी की अनिवार्यता और स्वीकारता का पाठ भी पढाया थां। पर मैं जिस तरह गुजरात के बाद फिर कभी सीपी चन्द्रशेखर से मिलने और बात करने की जरूरत नहीं समझी उसी तरह से मैं आगे भी उनसे शायद ही मिल पाउंगा या फिर कोई बात कर पाउंगा। क्योंकि मेरा कर्म राजनीति नहीं बल्कि सनातन है। ऐसे भी जब कोई बडी कुर्सी पर बैठ जाता है तो फिर उसकी दृष्टि उपर की ओर हो जाती है, आसमान की ओर होती है, सफल बनना है तो पीछे नहीं आगे देखों की मानसिकता पर सवार हो जाती है। संघर्ष के साथी, संवाद के सहचर उन्हें बोझ और फालतू लगने लगते हैं। ऐसी मानसिकता राजनीति के बडे नेताओं से लेकर राजनीति के कीडे-मकौडों पर भी लागू होती है।

मेरी शुभकामनाएं और आशीर्वाद सीपी राधाकृष्ण्न के साथ जरूर है। पर ध्यान यह रखना होगा कि कोई बडी कुर्सी मिलने से महान नहीं होता है बल्कि महान राष्ट्र के प्रति समर्पण और सत्य निष्ठा के प्रदर्शन से होता है।

आचार्य श्रीहरि

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