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Saturday, March 2, 2024

बांग्लादेश- क्रिकेटर लिटन दास: हिन्दू क्रिकेटर और कट्टरपंथी नफरत: पर बुतों से घृणा तो उनके और हिन्दी साहित्य में जमकर है!

बांग्लादेश में हिन्दू क्रिकेटर लिटन दास को एक बार फिर से अपने धर्म के पर्व की शुभकामनाएँ प्रेषित करने पर सोशल मीडिया पर मजहबी असहिष्णुता का शिकार होना पड़ा है। हालांकि यह भी सच है, कि उनके प्रशंसक भी उनके साथ आए हैं, फिर भी यह बहुत ही हैरान करने वाला तथ्य है कि लिटन दास को अपने पर्व का पालन करने के लिए इस प्रकार घृणा का शिकार होना पड़े और वह भी उस देश में, जिसे पंजाबी मुस्लिमों के शोषण से मुक्त करने के लिए हिन्दू बाहुल्य भारत ने हर प्रकार से सहायता की थी।

लिटन दास ने अपने फेसबुक पेज पर पितृपक्ष के अंतिम दिन माता के आगमन को लेकर शुभ महालया का पोस्ट किया। बांग्लादेश में जो कट्टरपंथी समुदाय है उसने एक बार पुन: यह प्रमाणित किया कि वहां पर हिन्दू समुदाय को लेकर वह क्या सोचते हैं? यह कुछ लोगों की एक ऐसी कट्टरपंथी घृणा है, जिसका प्रदर्शन वह बार-बार करते हैं।

महालया का अर्थ है कि माँ दुर्गा कैलाश पर्वत से धरा के लिए प्रस्थान कर चुकी हैं अर्थात यह दिन सभी हिन्दुओं के लिए विशेष होता है। लिटन ने अपने’ फेसबुक पेज पर एक बहुत ही सुन्दर और सरल सन्देश “शुभो महालया! माँ दुर्गा आ रही हैं!” कुछ कट्टर इस्लामिस्ट को इतना चुभा कि उन्होंने न केवल “बुत परस्ती” के खिलाफ अपनी घृणा दिखाई बल्कि साथ ही लिटन को भी इस्लाम में मतांतरित होने की बात की।

जो इस्लाम में बुत है, क्या वही हिन्दुओं में प्रतिमा का अर्थ है?

फैज़ की एक बहुत ही लोकप्रिय नज़्म का हिस्सा है “सब बुत गिरवाए जाएंगे” और अंत में है “बस नाम रहेगा अल्लाह का!”

इस नज़्म को बहुत क्रांतिकारी माना जाता है, जबकि यह पूरी तरह से मजहबी है एवं हिन्दुओं के प्रति घृणा से भरी हुई है। बुत की अवधारणा जो इस्लाम में है, वह हिन्दुओं में प्रतिमा की अवधारणा नहीं है। बुत का अर्थ उर्दू शायरी में महबूब या प्रेमिका का रूपक है अर्थात जिस तरह बुत कुछ सुनता है न उस पर किसी बात का कोई असर होता है । ठीक उसी तरह उर्दू शायरी का महबूब भी अपने प्रेमी से बे-परवा होता है । आशिक़ की फ़रियाद, उसका रोना, गिड़-गिड़ाना,उसकी आहें सब बेकार चली जाती हैं

इसका अर्थ यह हुआ कि बुत का अर्थ हुआ निर्जीव, बेकार, भाव रहित! जैसे उनकी शायरी में कहा ही गया है कि

वफ़ा जिस से की बेवफ़ा हो गया

जिसे बुत बनाया ख़ुदा हो गया

हफ़ीज़ जालंधरी

वो दिन गए कि ‘दाग़’ थी हर दम बुतों की याद

पढ़ते हैं पाँच वक़्त की अब तो नमाज़ हम

दाग़ देहलवी

(अर्थात बुतों की याद दाग थी और अब नमाजी हो गए हैं अर्थात दाग और शैतान त्याग कर मुसलमान हो जाना!)

ये शहर वो है जहाँ राक्षस भी हैं राहत

हर इक तराशे हुए बुत को देवता न कहो

राहत इन्दौरी

यह कुछ शायरी हैं जो बुत पर हैं, बुत का अर्थ या तो शैतान के अर्थ में है या फिर जिसमें जान न हो! कमोबेश यही अर्थ idol या statue का है। cambridge डिक्शनरी के अनुसार इसका अर्थ है an object made from a hard material, especially stone or metal, to look like a person or animal:

https://www.christianity.com/wiki/christian-terms/what-is-the-definition-of-idolatry-in-the-bible.html

एवं ईसाई रिलिजन में भी idol को शैतान ही माना जाता है एवं idol की पूजा करने वाले व्यक्ति को ही नहीं बल्कि देश को ही नष्ट हो जाना चाहिए, ऐसा उनका मानना है।

परन्तु क्या यही अर्थ प्रतिमा का है? क्या हिन्दुओं के लिए उनके आराध्यों की प्रतिमा मात्र बुत है? हिन्दुओं में पहले प्रतिमा में प्राण प्रतिष्ठा की जाती है अर्थात स्थूल में देवत्व का आह्वान किया जाता है कि आराध्य आएं एवं उस प्रतिमा को जीवंत करें। रामायण में उत्तरकाण्ड में भी माता सीता की प्रतिमा को माँ सीता के स्थान रखकर अश्वमेघ यज्ञ का उल्लेख है।

ऐसे में हिन्दुओं के लिए प्रतिमा की महत्ता का अर्थ वह नहीं समझ सकता है, जिसके दिल में बुत का अर्थ निर्जीव है। परन्तु समस्या यह है कि यह असहिष्णुता इतनी कट्टर हो जाती है कि वह हिन्दुओं को अपनी घृणा का शिकार बना लेती है। यह कट्टरता इतनी बढ़ जाती है कि फैज़ जैसे लोगों को भी क्रान्ति का सूत्रपात करने के लिए बुत तोड़ने की बात करनी पड़ी थी और जब शब्दकोष में बुत का अर्थ प्रतिमा, या मूर्ति हो जाता है, तो “बुत तोड़ने को क्रांति माना जाने लगता है!”

जब इकबाल कहने लगते हैं कि

सच कह दूँ ऐ बरहमन गर तू बुरा न माने

तेरे सनम-कदों के बुत हो गए पुराने

अपनों से बैर रखना तू ने बुतों से सीखा

हालांकि कुछ बैलेंस भी बनाते हैं इसमें वह:

जंग-ओ-जदल सिखाया वाइज़ को भी ख़ुदा ने

तंग आ के मैं ने आख़िर दैर ओ हरम को छोड़ा

वाइज़ का वाज़ छोड़ा छोड़े तिरे फ़साने

पत्थर की मूरतों में समझा है तू ख़ुदा है

ख़ाक-ए-वतन का मुझ को हर ज़र्रा देवता है  

मगर यह वही इकबाल हैं जो लिखते हैं कि

दुनिया के बुत-कदों में पहला वो घर ख़ुदा का

हम इस के पासबाँ हैं वो पासबाँ हमारा

यह समझा जा सकता है कि बुतों के प्रति यह घृणा जब फैज़ और इकबाल जैसे लोग, जिन्हें आम हिन्दू लिबरल मानता है, अपनी रचनाओं में इस हद तक प्रदर्शित कर सकते हैं तो, आम कट्टरपंथी मुस्लिम कितनी घृणा करता होगा, वह समझा जा सकता है एवं वही बार-बार हर हिन्दू पर्व पर मुस्लिम देशों जैसे पकिस्तान, बांग्लादेश आदि में देखने को मिलता है!  

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