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Friday, July 19, 2024

क्या बरखा दत्त ने अपने पिता की मृत्यु को भुनाया?

क्या ऐसा हो सकता है कि सरकार के विरोध में जाते जाते कोई अपने पिता की मृत्यु को ही भुना बैठे? अपने पिता को ही दांव पर लगा दे? क्या कोई ऐसा हो सकता है जो अपने पिता की मृत्यु के विषय में झूठी कहानी बेच सके? मगर ऐसा हुआ है! ऐसा किया है अब तक देश की बदनामी बाहर करने वाली कथित प्रगतिशील पत्रकार बरखा दत्त ने! बरखा दत्त पर कारगिल युद्ध की कवरेज के दौरान भी कई आरोप लगे और इसके साथ ही मुम्बई में हुए आतंकी हमले में की जा रही उनकी कवरेज को कौन भूल सकता है।  अभी हाल ही में उन्होंने वाशिंगटन टाइम्स में देश को बदनाम करने के लिए जो लिखा है, उसकी भर्त्सना ही की जा सकती है, और देश के प्रबुद्ध नागरिकों ने उस लेख की आलोचना की ही है।

परन्तु अब जो उन्होंने किया है, वह कहीं अपेक्षा से भी नीचे गिरा हुआ है। हाल ही में उनके पिता का कोविड से निधन हुआ था। और उन्होंने मेदांता अस्पताल की तारीफ़ करते हुए ट्वीट किया था, कि अब उनके पिता सुरक्षित हाथों में हैं। पर अपने पिता के निधन के बाद उन्होंने एकदम से जैसे झूठ बोलना आरम्भ कर दिया। एक ओर जहां उन्होंने यह भी लिखा था कि उनके पिता होमआइसोलेशन में थे, और बाद में सीएनएन में बात करते हुए वह एकदम से पलट गईं।  उन्होंने अपने पिता की मृत्यु को पूरी तरह से भुनाते हुए कहा कि “मेरे पिता के अंतिम शब्द थे कि उनका गला रुक रहा है। और उन्हें इलाज दिया जाए। और मैंने अपनी ओर से पूरे कोशिश की। एक पत्रकार होने के नाते, जो डॉक्टर को जानती थी और जो महंगा से महंगा इलाज अपनी जेब से दे सकती थी, फिर भी मैंने जो प्राइवेट एम्ब्युलेंस मंगाई, उसमे ऑक्सीजन सिलिंडर काम ही नहीं किया।

उसके बाद उन्होंने दिल्ली की सड़कों पर प्रश्न उठाते हुए कहा कि राजधानी की सड़कों पर अभी तक कोई भी ग्रीन कॉरिडोर नहीं है और जब तक हम लोग अस्पताल पहुंचे तब तक सिलिंडर बेकार हो गया था। और फिर उन्हें आईसीयू में ले जाया गया, और उसके बाद वहां से वापस वह नहीं आए।

इतने सनसनीखेज झूठ के बाद जाहिर था कि हलचल मचनी ही थी। क्योंकि वह व्यक्तिगत मामला होते हुए भी व्यक्तिगत नहीं था और पूरे देश की स्वास्थ्य व्यवस्था पर प्रश्न था। और जैसे ही यह बात फ़ैली वैसे ही एम्ब्युलेंस के ड्राइवर पर एकदम से दबाव आ गया और उसे उसके मालिकों ने डांटना शुरू कर दिया। उस ड्राइवर ने कहा कि एक जान गयी उसका उन्हें दुःख है, पर जो दावे किए जा रहे हैं वह गलत हैं। और पूरी तरह से झूठ है।

सोनू ने बताया कि ऑक्सीजन सिलिंडर भरा हुआ था और बरखा ददद ने बार बार उसकी सप्लाई के बारे में पूछा तह। और फिर बताया कि बरखादत्त ने अपने पिता को अस्पताल ले जाने से पहले ऑक्सीजन का फ्लो और मास्क दोनों ही जांचे थे। और इतना ही नहीं सोनू का कहना था कि वह लोग बिना किसी समस्या के अस्पताल पहुँच गए थे और वह खुद 15-20 मिनट तक इमरजेंसी के बहार खड़े रहे थे। उनका यह भी कहना था कि वह खुद ही मरीज को एम्ब्युलेंस तक लाए थे और सोनू को इस बात पर बहुत हैरानी हुई कि वह आखिर झूठ क्यों बोल रही हैं? और इस बात के गवाह बरखा दत्त के दो ड्राइवर और एक सेक्युरिटी गार्ड भी है। फिर सोंनू ने दावा किया कि यह दावा कि एम्ब्युलेंस में ऑक्सीजन सिलिंडर नहीं था, पूरी तरह से झूठ था।

द प्लस के पास यह वीडियो है और उसमें सोनू ने उस दिन की पूरी घटना का विवरण दिया है। जिसमें वह कह रहे हैं कि “मैं झूठ नहीं बोल रहा हूँ।”

Dutt

यह बेहद ही अजीब बात है कि बरखा दत्त ने इस मामले में दिल्ली सरकार की कोई आलोचना नहीं की है। जबकि वह दिल्ली में इलाज करा रहे थे। और यह भी सत्य है कि उनके पिता को सबसे बेहतर इलाज मिल रहा था। और सीएनएन के इंटरव्यू को देखकर यह पूरी तरह से समझ में आ जाता है कि वह एक सुनियोजित और सोचा समझा कदम था, जो न केवल अपनी व्यक्तिगत ब्रांडिंग के लिए बल्कि देश को बदनाम करने के लिए उठाया गया था। आखिर बरखा की आदत है झूठ बोलने की, क्योंकि वह बेहद ही शातिराना तरीके से कश्मीरी हिन्दुओं के नरसंहार को सही ठहरा चुकी हैं।

बरखा जैसे पत्रकार वर्ष 2014 से ही एक नई निचाई पर गिरते जा रहे हैं, पर नेट यूजर्स द्वारा उनके झूठ पकडे जाने पर भी उन्हें लाज नहीं आ रही है, बल्कि वह प्रश्न उठाने वालों को ही ट्रोल कह रही हैं। जबकि सबसे बड़े ट्रोल यही लोग होते हैं, जो हमने अर्नब की गिरफ्तारी के समय देखा था, जब बरखा दत्त आइसक्रीम खाने की बात कह रही थीं।

उनका झूठ उनके ही ट्विटर टाइमलाइन से पकड़ में आ जाता है, जब वह यह लिखती हैं कि उनके पिता अस्प्ताल जाने हिचक रहे थे। इसलिए कहीं न कहीं यह प्रश्न भी उठता है कि कहीं बरखा जानबूझ कर ही तो उन्हें अस्पताल देर से नहीं ले गईं?

बरखादत्त के इस आचरण पर कई प्रश्न उठ रहे हैं, पर उत्तर केवल इसी तथ्य में सिमट कर आ गया है कि वह वर्ष 2014 से एक व्यक्ति के प्रति इतनी घृणा से भरी हुई हैं कि अब वह घृणा देश के विरोध में निकलने लगी है। वैसे जो पत्रकार महामारी के समय अपने देश की चिताओं की तस्वीर बेच सकती है तो पिता की मृत्यु तो बहुत छोटी बात है।


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