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Thursday, August 11, 2022

लखीमपुर खीरी किसान आन्दोलन हिंसा: कुछ प्रश्न एवं पहलू

उत्तर प्रदेश में लखीमपुर खीरी में हुई हिंसा में हाल फिलहाल शांति है तथा उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री योगी आदित्यनाथ के कड़े क़दमों के कारण कोई भी विपक्षी दल और हिंसा करने वाले तत्व लखीमपुर खीरी में कदम नहीं रख पाए हैं। अधिकाँश विपक्षी दलों के नेताओं को लखीमपुर खीरी से बाहर ही रोक दिया गया, और दूसरे प्रदेशों से आने वाले विपक्षी नेताओं को उत्तर प्रदेश में प्रवेश ही नहीं करने दिया गया।

इस हिंसा में कुछ तथ्य हैं, जिन पर बात नहीं हुई है या फिर नहीं की गयी है, जिनमें से एक तथ्य है ब्राह्मणों के प्रति हिंसा या कहें घृणा! यह बात सुनने में कुछ अजीब लग सकती है परन्तु यह संयोग नहीं हो सकता है कि ब्राह्मणों के प्रति अतीव घृणा का प्रदर्शन करते हुए एक ब्राह्मण नेता के विरुद्ध ही विरोध का ताना बाना खींचा गया और जो मारे गए हैं, वह भी ब्राह्मण ही हैं।

क्या ऐसा जानते बूझते किया गया होगा? कुछ ट्वीट हैं जो इस दिशा में ध्यान खींचते हैं। जैसे ही यह खबर आई कि सांसद अजय मिश्र के बेटे की गाड़ी से किसानों के साथ दुर्घटना हो गयी है, वैसे ही अचानक से कुछ ऐसे ट्वीट उभरकर आए जो ब्राह्मणों के विरुद्ध अपशब्द प्रयोग कर रहे थे। और उन्होंने ब्राह्मण को ही इस कथित हत्या का आरोपी बता दिया, जबकि उन्होंने स्वयं ब्राह्मण युवकों को मारा, यह नहीं बताया।

कई ट्विटर हैंडल्स ने ब्राह्मणों के विरुद्ध चुनमंगा आदि कहकर ट्वीट किया। चुनमंगा का अर्थ है, चूना अर्थात सफेद वस्तु अर्थात आटा और मंगा अर्थात मांगने वाला! अर्थात भिक्षा मांगने वाला, अर्थात ब्राह्मण जो अपने जीवनयापन के लिए भिक्षा मांगता था।

क्या इस शब्द का किसान आन्दोलन से कोई सम्बन्ध है? परन्तु ऐसा प्रतीत हो रहा है कि इस बवाल का उद्देश्य ब्राह्मण विरोध और योगी सरकार के खिलाफ ब्राह्मणों को भड़काने दोनों का एक समवेत षड्यंत्र था। जैसे यह सुनियोजित षड्यंत्र एक परत का न होकर कई परतों का था। तभी जो हत्याएं हुई हैं, वह इतनी योजना बनाकर नृशंसतापूर्वक की गयी हैं

वहीं इस घटना के सामने आने के बाद जहाँ विपक्षी दल सरकार को घेरने की फिराक में हैं, तो वहीं वह खुद ही संदेह के दायरे में हैं। इन कथित किसानों के हाथों मारे गए भाजपा कार्यकर्ता शुभम मिश्रा के परिवार वालों की ओर से जो एफआईआर दर्ज कराई गयी है, उसमें तेजेंद्र सिंह विर्क का नाम भी है। यह तेजेंद्र सिंह विर्क वही व्यक्ति है जिसे सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने किसान बताया था, कि तेजेंद्र सिंह विर्क को वह देखने गए हैं।

बाद में सोशल मीडिया से पता चला कि वह सपा का नज़दीकी है और कई तस्वीरें भी सामने आईं।

https://www.indiatv.in/india/uttar-pradesh-lakhimpur-kheri-violence-samajwadi-party-connection-tajinder-virk-akhilesh-yadav-latest-update-news-817186

शुभम मिश्रा के परिवार की ओर से जो शिकायत दर्ज कराई गयी है, उसमें लिखा है कि अमनदीप सिंह सिन्धु व महेंद्र सिंह और तेजेंद्र सिंह विर्क तथा कई अज्ञात लोग उनके पुत्र शुभम मिश्रा और हरिओम मिश्रा को तलवारों और लाठियों से मार रहे हैं।

यदि यह किसान आन्दोलन था तो इसमें तलवारों की क्या आवश्यकता थी?

वहीं इस घटना को लेकर राजनीति अपने चरम पर है। आज दिन भर इसे लेकर गहमागहमी रही। विपक्ष ने इस घटना के बहाने उत्तर प्रदेश सरकार को किसान विरोधी बताने का भरसक प्रयास किया, तो वहीं देश के सबसे बड़े किसान संगठनों में से एक संगठन “भारतीय किसान संघ” ने लखीमपुर खीरी की हिंसा को अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए कहा कि इसमें जो भी लिप्त लोग थे, वह किसान नहीं थे बल्कि किसी राजनीतिक दल के लोग थे, जिन्होनें वामपंथी तरीके से इस घटना को अंजाम दिया। संगठन का कहना था कि जिस प्रकार से लाठी डंडों से पीटकर लोगों की निर्मम हत्या की गयी है, वह काम किसान कर ही नहीं सकते हैं।

फिर बाहरी तत्व कौन हैं? उन बाहरी तत्वों का खुलासा कौन करेगा?

वहीं इस विरोध प्रदर्शन के दौरान जो सबसे रोचक समाचार आया है, वह है पीलीभीत से भारतीय जनता पार्टी के सांसद और गांधी परिवार के वरुण गांधी द्वारा इस किसान आन्दोलन का समर्थन एवं उचित कार्यवाही की मांग करना।

ताजा समाचार यह है कि उन्होंने अपने ट्विटर परिचय से “भाजपा” शब्द को हटा दिया है। उन्होंने कल ही एक अत्यंत मार्मिक पत्र मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नाम लिखा था। और कहा था कि लखीमपुर खीरी में जो विरोध प्रदर्शन कर रहे किसानों को कुचला गया है, उससे देश के नागरिकों में एक पैदा और रोष है।

वरुण गांधी पहले भी ऐसे बागी तेवर दिखा चुके हैं। पर यहाँ पर एक प्रश्न उभरता है कि वरुण गांधी को अपने कार्यकर्ता की रक्तरंजित देह नहीं दिखीं?

बहुत कुछ है, जो चुनावों से पहले इस प्रदेश में दिखाई देगा, क्योंकि विपक्ष के पास जनता के उस विश्वास का कोई उत्तर नहीं था, जिसमें बार बार यही कहा जा रहा था कि उन्हें इस सरकार की कानून व्यवस्था पर पूर्ण विश्वास है। जितने भी वह पत्रकार जिनका रोजगार इन दिनों यूट्यूब बन गया है अर्थात जो मोदी और योगी सरकार आने के बाद नौकरी छोड़ चुके हैं, वह जनता से यही बातें सुनते थे कि श्री योगी आदित्यनाथ के आने के बाद क़ानून व्यवस्था में सुधार हुआ है।

तो क्या यह जनता के मन में वह छवि तोड़ने का षड्यंत्र है?

या फिर भाजपा के कार्यकर्ताओं के मन में भय भरना उद्देश्य है क्योंकि भाजपा के कार्यकर्ता और नेता ही इन खालिस्तानी समर्थक “कथित” किसानों के निशाने पर हैं, और यह पंजाब से लेकर हरियाणा और उत्तर प्रदेश में देखा जा सकता है। या फिर सपा के नेता अखिलेश यादव ने कहा था कि अब यूपी में खेला होबे! तो क्या यह खेला की तैयारी है?

आने वाले समय में क्या हिंसा का यह खेल अधिक तेज होगा या फिर जनता का विश्वास बना रहेगा, यह देखना होगा!

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