“केरल के मंदिर की परंपरा में दखल दे रहा था सरकारी बोर्ड, हाई कोर्ट ने रोका: कहा- मुख्य पुजारी की सहमति के बिना नहीं हो सकता बदलाव”, ऑपइंडिया, जुलाई 10, 2024
“केरल हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि किसी मंदिर की प्रचलित धार्मिक प्रथा में परिवर्तन केवल तंत्री (मुख्य पुजारी) की सहमति से ही किया जा सकता है। कोर्ट ने कूडलमाणिक्यम देवस्वोम प्रबंध समिति के उस निर्णय को रद्द कर दिया, जिसमें अम्मनूर परिवार के सदस्यों के अलावा अन्य हिंदू कलाकारों को त्रिशूर के इरिन्जालाकुडा में मंदिर के कूथम्बलम में कूथु और कूडियाट्टम नृत्य करने की अनुमति दी गई थी।
दरअसल, अम्मनूर परिवार के सदस्यों को कूडलमाणिक्यम मंदिर के कूथम्बलम में कूथु और कूडियाट्टम करने का वंशानुगत अधिकार प्राप्त है। हाई कोर्ट ने कहा कि कुथु और कूडियाट्टम जैसे मंदिर नृत्य धार्मिक और अनुष्ठानिक समारोह हैं। न्यायालय ने कहा कि देवस्वोम प्रबंध समिति तंत्रियों की सहमति के बिना कलाकारों की प्रकृति में बदलाव करने का निर्णय नहीं ले सकती।
न्यायाधीश अनिल के नरेंद्रन और न्यायाधीश पीजी अजितकुमार की खंडपीठ ने अम्मानूर परमेश्वरन चाक्यार द्वारा दायर याचिका पर यह आदेश जारी किया। यह याचिका अम्मानूर परिवार के अलावा हिंदू कलाकारों के लिए कुथु और कूडियाट्टम प्रदर्शन के लिए कुथम्बलम खोलने के फैसले को चुनौती दी गई थी। अदालत ने कहा कि अम्मानूर परिवार के प्रथागत अधिकार में कोई बदलाव नहीं किया जा सकता….”
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