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Sunday, November 27, 2022

जम्मू में डीजीपी की हत्या से मचा हाहाकार: घरेलू नौकर जसीर है फरार! बारामूला में भी कल ही हिन्दू बैंक मैनेजर की हत्या का प्रयास किया गया था

जम्मू से एक बहुत ही चौंकाने वाला समाचार आ रहा है,। वहां पर डीजीपी हेमंत कुमार लोहिया की हत्या कर दी गयी है और इसका संदेह घरेलू नौकर पर है, जो अभी फरार है:

यह एक ऐसी घटना है जिसे अनदेखा करना या सामान्य मानना बेवकूफी कही जा सकती है। यह तब और महत्वपूर्ण है जब गृहमंत्री अमित शाह प्रदेश का दौरा कर रहे हैं।  यह घटना इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह कहीं न कहीं लोगों के दिलों में डर भरने के लिए है कि जब डीजीपी जैसे लोग ही सुरक्षित नहीं हैं तो कौन होगा? परन्तु यदि यह बात सत्य है कि घरेलू नौकर जसीर ने यह हत्या की है, तो यह और भी चौंकाने वाला है।

इस बात का उल्लेख हिन्दी मीडिया में हो रहा है कि “जसीर” नामक घरेलू नौकर ने डीजीपी की हत्या की है, परन्तु यह बात कश्मीर की मीडिया के ट्विटर खतों से लगभग गायब है कि यह हत्या किसने की या कैसे हुई?

इस हत्या के पीछे मानसिकता और कारण अभी निकल कर आएँगे, परन्तु अंग्रेजी मीडिया  या कहें कश्मीर के मीडिया पोर्टल्स जैसे कश्मीर न्यूज़ इसे रहस्यमयी परिस्थितयों में की गयी हत्या कह रहे हैं

जम्मू कश्मीर पुलिस ने ट्वीट करते हुए इस घटना की जानकारी देते हुए लिखा कि

“श्री हेमंत लोहिया डीजी जेल जम्मू-कश्मीर का शव संदिग्ध परिस्थितियों में मिला। पहली नजर में यह हत्या दिख रहा है। अधिकारी के साथ कार्य करने वाला घरेलू नौकर फरार है। उसकी तलाश शुरू कर दी गई है।

मीडिया के अनुसार अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक (जम्मू क्षेत्र) मुकेश सिंह ने बताया कि 1992 बैच के आईपीएस अधिकारी लोहिया (52) शहर के बाहरी इलाके में अपने उदयवाला निवास पर मृत मिले जिनका गला रेता गया था और उनके शरीर पर जलने के निशान थे। पुलिस प्रमुख ने कहा कि घटनास्थल की प्रारंभिक जांच से संकेत मिलता है कि लोहिया ने अपने पैर में कुछ तेल लगाया होगा जिसमें कुछ सूजन दिखाई दे रही थी।

पुलिस यह भी संदेह व्यक्त कर रही हिया कि “हत्यारे ने पहले लोहिया को गला घोंटकर मौत के घाट उतारा और फिर उनके गले को काटने के लिए केचप की टूटी हुई बोतल का इस्तेमाल किया था तथा बाद में शव को आग लगाने की कोशिश की”

यही नहीं यह भी कहा जा रहा है कि डीजीपी लोहिया की हत्या करने वाला जसीर पहले भी कई पुलिस अधिकारियों के साथ कार्य कर चुका है। वह उनके साथ श्रीनगर भी गया था, क्योंकि दरबार मूव के साथ लोहिया श्री नगर गए थे तो वह भी गया था और उनके वापस आते ही जसीर भी वापस आ गया था।

शव को जलाने का भी प्रयास किया गया

डीजीपी की हत्या के बाद  उनका शव जलाने का प्रयास किया गया। कहा जा रहा है कि हत्यारे ने डीजीपी का गला ही नहीं रेता बल्कि कांच की से पेट और बाजू पर कई वार किए। मौके पर डीजीपी के लहूलुहान शव से पेट की आंतें भी बाहर निकली हुई मिलीं। हत्यारा यहीं नहीं रुका, उसने शरीर पर केरोसिन छिड़क कर जलाने की भी कोशिश की। डीजीपी के सिर पर तकिया और कपड़े डालकर ऊपर से आग लगा दी थी।

इस घटना से हर कोई हैरान है

यह घटना अधिक स्तब्ध करने वाली इसलिए भी है क्योंकि ऐसी हत्याएं आम जनता में भय का वातावरण उत्पन्न करने के लिए भी कहीं न कहीं काम आती हैं, कि जिसे वह सुरक्षित मानती हैं, उसे ही मार दिया जाए, जिससे उनका विश्वास ही पूरी तरह से व्यवस्था से हिल जाए। कश्मीर में आतंकियों के कार्य करने का यही तरीका रहा है। हालांकि यह घटना आतंकी है या नहीं, इस विषय में जांच के बाद सत्य पता चलेगा, परन्तु इस बात को बार-बार कश्मीरी पंडित कहते हैं कि उन्हें वहां से भगाने के लिए यही रणनीति प्रयोग में लाई गयी कि एक को मारा जाए और हजारों को भयभीत किया जाए,। और हमला भी उसी पर हो, जिसे यह लोग रक्षक मानते हैं, सुरक्षित मानते हैं।

मार्च 2022 में अशोक भान ने भी इसी रणनीति को बताते हुए लेखलिखा था कि कश्मीरी पंडितों पर पलायन के विकल्प को जबरन थोपा गया,। क्योंकि उन्होंने “Killing one and scaring a thousand” की योजना पर कार्य करना आरम्भ कर दिया था।

ऐसा नहीं है कि अभी सब रुक गया है। कल जब डीजीपी की हत्या हुई है, तो उसी दिन बारामूला जिले में आतंकियों ने एक गैर स्थानीय हिन्दू बैंक मैनेजर विवेक कुमार पर हमला किया था। हालांकि देहरादून के विवेक कुमार का भाग्य प्रबल था, जो आतंकी उनकी हत्या में सफल नहीं हुए। इस घटना के बाद प्रशासन हरकत में आया।

परन्तु कल ही एक और जवान का शव प्राप्त हुआ है। सूत्रों के अनुसार गोलियों से मृत जवान महाराष्ट्र का निवासी राहुल भगत है। मीडिया के अनुसार “पोस्टमार्टम के लिए शव को कस्टडी में ले लिया गया है, और एफआईआर रजिस्टर कर दी गयी है!”

अर्थात मात्र एक ही दिन में तीन ऐसी घटनाएँ हुई हैं, जिनके माध्यम से लोगों में भय फैला है। बैंक मैनेजर और डीजीपी दोनों ही स्थानीय हिन्दू नहीं थे, बल्कि गैर-स्थानीय हिन्दू थे। एवं वह वहां पर बसने भी नहीं गए थे, वह मात्र सरकार द्वारा प्रदत्त कर्तव्य वाहन हेतु गए थे। क्योंकि कश्मीरी पंडितों की हत्या को यह कहकर जस्टिफाई किया जाता है कि उनके बसने से जनसांख्यकी में परिवर्तन होगा, तो वहां पर ऐसे लोगों को क्यों मारा जा रहा है, जो वहां पर बसने का शायद ही इरादा रखें!

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