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Tuesday, October 4, 2022

रक्षाबंधन पर आवश्यक है तोड़ना सेक्युलर इतिहास का मिथक: हुमायूं और कर्णावती की कहानी का मिथक

रक्षाबंधन क्या सारे हिन्दू त्यौहार आते ही सेक्युलर मीडिया और सेक्युलर लेखकों का यह कहना आरम्भ हो जाता है कि मुगलों ने यह त्यौहार ऐसे मनाया, वह त्यौहार ऐसे मनाया! ऐसे ही रक्षाबंधन, जो पूरी तरह से हिन्दुओं का ही त्यौहार है, उसे भी विकृत बनाने का प्रयास किया जाता रहा है और किया जाएगा। रक्षाबंधन पर यह कहा जाएगा कि कैसे रानी कर्णावती ने हुमायूं को राखी भेजी थी और हुमायूं समय पर नहीं पहुँच सका था तो उसने जौहर कर लिया था।

दरअसल यह सबसे बड़ा झूठ है, जो सेक्युलर इतिहासकार फैलाते रहते हैं। वह उस हुमायूं को हिदू रानी का रक्षक बताने का प्रयास करते हैं, जिसने अपनी खुद की ही बेटी को नहीं बचाया था, अपनी जान बचाने के क्रम में उसने अपनी तेरह साल की बेटी को बह जाने दिया था और वह भी चौसा के युद्ध में!

 हुमायूँ नामा में गुलबदन बेगम ने लिखा है

“लाहौर पहुँचने पर समाचार आया कि गंगा के किनारे पर युद्ध हुआ और शाही सेना हार गयी। इतना ही अच्छा रहा था कि बादशाह बच गए थे।

दूसरे संबंधीगण जो आगरे में थे, वह अलवर होते हुए लाहौर चले। उस समय बादशाह ने मिर्जा हिंदाल से कहा कि प्रथम घटना (चौसा युद्ध) में अकीक बीवी खो गयी थी और दुःख है कि उसे अपने सामने ही क्यों नहीं मार डाला। अब भी औरतों का ऐसे समय साथ ही रक्षा के स्थान पर पहुंचना कठिन है!

अब आते हैं कि क्या वास्तव में ही हुमायूं ने रानी कर्णावती की सहायता की थी? या सहायता करने का विचार भी किया था?

यह अत्यंत ही महत्वपूर्ण प्रश्न है क्योंकि रक्षाबंधन के इतिहास के नाम पर यही पढ़ाया जाता है कि कैसे हुमायूं ने कर्णावती की सहायता के लिए कूच किया था। आइये जानते हैं कि सच क्या है?

कहानी शुरू होती है बाबर के भारत पर हमले के साथ। बाबर का सामना राणा सांगा ने किया था और खानवा के युद्ध में बाबर का सामना किया था।

परन्तु उन्हें पीछे हटना पड़ा था और उसके कुछ ही समय उपरान्त 30 जनवरी 1528 को उनका देहांत हो गया था। उसके बाद उनके पुत्र राणा रतन सिंह गद्दी पर बैठे, परन्तु वह वीरगति को प्राप्त हो गए। उसके उपरान्त उनके भाई राणा विक्रमादित्य गद्दी पर बैठे। और कहा जाता है कि चूंकि वह कुशल नहीं थे और विलासितापूर्ण जीवन जीता था, तो लोग उससे खुश नहीं थे। इसी को ध्यान में रखते हुए गुजरात के बहादुरशाह ने चित्तौड़ पर हमले की योजना बनानी शुरू कर दी।

और रूमी खान के नेतृत्व में हमला हुआ भी! यह वर्ष 1533 की बात है, बहादुर शाह ने हमला किया और उस समय रानीकर्णावती ने हुमायूं से सहायता मांगी, परन्तु हुमायूं नहीं आया, बल्कि ग्वालियर आकर रुक गया!

एसके बनर्जी हुमायूं बादशाह पृष्ठ 87

परन्तु इस संधि के बाद भी बहादुर शाह को चैन नहीं था और उसने चित्तौड़ को अपने अधीन करने के लिए एक बार फिर से आक्रमण किया, और उस समय भी रानी ही शासन कर रही थी। बहादुरशाह द्वारा हमले का समाचार सुनकर शासन अपने हाथों में लिया और सभी सरदारों से अनुरोध किया कि वह साथ आएं, और अपने अपने घरों को बचाने के लिए साथ लड़ें। इस अपील का प्रभाव हुआ और सभी राजपूत साथ आए और उन्होंने अपने दोनों पुत्रों को बूंदी भेज दिया।

इसके बाद युद्ध हुआ और इस युद्ध में जब राजपूत पराजित होने लगे तो रानी कर्णावती ने दुर्ग की स्त्रियों के साथ जौहर कर लिया एवं राजपूतों ने केसरिया ओढ़कर दुर्ग और धर्म के लिए अपने प्राणों का बलिदान कर दिया। यह उन तीन जौहरों में से दूसरा जौहर था, जो इस्लामी आक्रान्ताओं के कारण राजपूताना स्त्रियों ने किए थे। एसके बनर्जी के अनुसार कुल 32,000 राजपूत मारे गए एवं उनके महिलाओं ने जौहर कर लिया था!

अब इसमें एक कहानी जोड़ी जाती है कि रानी कर्णावती ने हुमायूँ को पत्र भेजा था और राखी भेजी थी, और सहायता माँगी थी। फर्जी इतिहासकारों ने यह कहानी गढ़ी कि हुमायूँ रानी की राखी की लाज रखने के लिए आया, मगर जब तक वह आया तब तक देर हो गयी थी और रानी जौहर कर चुकी थीं।

यह कितना शातिर तरीके से बोला हुआ झूठ है, वह इतिहास की वास्तविक पुस्तकों पर दृष्टि डालने से परिलक्षित हो जाता है।

कहीं न कहीं यह सत्य प्रतीत होता है कि रानी कर्णावती ने मुग़ल हुमायूँ से सहायता के लिए पत्र भेजा था, परन्तु यह सत्य नहीं है कि हुमायूँ ने उस पत्र को स्वीकार करते हुए सहायता की थी और वहां आया था। बल्कि वह ग्वालियर में आकर रुक गया था और वह भी एसके बनर्जी के अनुसार प्रथम आक्रमण में!

रानी को अपमानजनक संधि करनी पड़ी थी और फिर दोबारा एक वर्ष के उपरान्त अर्थात वर्ष 1534 में नवम्बर में आक्रमण हुआ था, तब के विषय में एस के बनर्जी, अपनी पुस्तक हुमायूँ बादशाह में हुमायूँ और बहादुरशाह के बीच हुए पत्राचार का हवाला देते हैं:

कि बहादुरशाह ने हुमायूँ को लिखा, जिसमें मुहम्मद जमन मिर्जा को शरण देने पर अपने विचार व्यक्त किए हैं और क्यों उन्हें परस्पर एक दसरे का साथ देना चाहिए। लिखा गया है कि चूंकि हम लोग इंसाफ और ईमान लाने वाले हैं, तो जैसा पैगम्बर ने कहा है कि “अपने भाइयों की मदद करो, फिर वह जुल्म करने वाले हों या फिर पीड़ित।” (पृष्ठ 108) यह बात यद्यपि मुहम्मद जमन मिर्जा को शरण देने के कारण कही थी, परन्तु कहीं न कहीं यह पूरी मानसिकता को दर्शाती है!

और उसके बाद उसने लिखा कि “खुदा के करम से जब तक मैं इस वतन का मालिक हूँ, कोई भी राजा मुझे और मेरी सेना को चुनौती नहीं दे सकता है।”

यह सलाह दी जाती है कि आप इस पर काम करें “शैतान आपको राह न भटकाए”

एस के बनर्जी, हुमायूँ बादशाह,पृष्ठ 133

उसके बाद पुर्तगाली फ़रिश्ता के हवाले से लिखते हैं, कि बहादुरशाह ने हुमायूँ को लिखा

“मैं चित्तौड़ का दुश्मन है,

और मैं काफिरों को अपनी सेना से मार रहा हूँ,

जो भी चित्तौड़ की मदद करेगा,

आप देखना, मैं उसे कैसे कैद करूंगा”

एस के बनर्जी, हुमायूँ बादशाह,पृष्ठ 134

मिरत-ए-सिकंदरी, में एक और आयत दी गयी है, जिसे Tazkirah-i-Bukharai में भी दिया गया है। Tazkirah-i-Bukharai के अनुसार यह हुमायूँ ने लिखी थी। वह आयत है

और जिसका अनुवाद है

“मेरे दिल का दर्द अब यह सोच कर खून में बदल गया है, कि हमारे एक होने के बावजूद हम दो है।

मैने कभी भी आपको रोते हुए याद नहीं किया है, मैने कभी सोचा नहीं था कि मैं इतना रोऊँगा,”

एस के बनर्जी, हुमायूँ बादशाह,पृष्ठ 135

यह पत्राचार बहुत बड़ा है, परन्तु चित्तौड़ के साथ ही यह पत्राचार समाप्त होता है। चित्तौड़ एक हिन्दू राज्य था, जिसे पराजित करना जितना आवश्यक बहादुरशाह के लिए था, उतना ही हुमायूँ के लिए था, क्योंकि काफिरों के राज्य पर हमला करना और नेस्तनाबूत करना ही उनके मजहब की सेवा थी और उस सेवा में कोई मुस्लिम कैसे दीवार बन सकता था।

इस पूरे पत्राचार से यह भी स्पष्ट होता है कि भारत में मुस्लिम शासकों ने मुस्लिम और हिन्दू राज्यों के बीच अंतर रखा था, और मुस्लिम राजा को हिन्दू राज्य के साथ स्थाई शान्ति की अनुमति नहीं थी।

इस युद्ध के उपरान्त रानी कर्णावती ने जौहर कर लिया था। यह पूर्णतया सत्य है कि हुमायूँ जानबूझकर नहीं गया और कर्णावती ने दुर्ग की शेष स्त्रियों के साथ जौहर कर लिया। यह चित्तौड़ का दूसरा जौहर था, जो इस्लामी आक्रान्ताओं के कारण हुआ था और यह जौहर इसलिए भी हुआ था क्योंकि एक मुस्लिम शासक ने दूसरे मुस्लिम शासक को एक काफ़िर को हराने के पाक काम से नहीं रोका था।

इस पूरे पत्राचार से यह भी स्पष्ट होता है कि भारत में मुस्लिम शासकों ने मुस्लिम और हिन्दू राज्यों के बीच अंतर रखा था, और मुस्लिम राजा को हिन्दू राज्य के साथ स्थाई शान्ति की अनुमति नहीं थी।

एसके बनर्जी इस बात को अपनी पुस्तक में और स्पष्ट रूप से लिखते हैं

वर्ष 1533 में चित्तौड़ के राणा के साथ संधि के साथ, बहादुर शाह के पास कोई ऐसा कारण नहीं था कि वह राजपूत चित्तौड़ पर हमला करे क्योंकि उसे काफी धन दौलत और कुछ जागीरें चित्तौड़ से इस संधि के कारण मिल चुकी थीं। परन्तु उसे इसलिए हमला करना था क्योंकि वह एक काफिर राज्य था।

बहादुर शाह, महमूद बेगढ़ा का पोता था, और महमूद बेगढा काफिरों से हद से ज्यादा नफरत करता था।

बहादुरशाह ने जब चित्तौड़ पर हमला किया, तो उसे यह डर था कि कहीं हुमायूँ उस पर हमला न कर दे, पर उसके मंत्री सदर खान ने उससे कहा कि ऐसा कुछ नहीं होगा और जब बहादुरशाह एक काफिर पर हमला कर रहे होंगे, तो हुमायूँ बीच में नहीं आएगा क्योंकि यह मुस्लिम परम्परा नहीं है। हाँ, चित्तौड़ पर जीत हासिल करने के बाद वह जरूर हमला कर सकता है।

एसके बनर्जी: हुमायूं बादशाह पृष्ठ 118 और 119

हुमायूँ ने कर्णावती का पत्र पाकर भी साथ नहीं दिया था और बख्तवार खान के मिरात उल आलम के अनुसार बहादुरशाह ने ही हुमायूँ से कहा था कि वह चित्तौड़ पर किए जा रहे हमले से दूर रहे और हुमायूँ इस पर सहमत हुआ और उसने अपने मुस्लिम होने का प्रमाण देते हुए एक काफिर राज्य की मदद नहीं की।

परन्तु कथित सेक्युलर इतिहासकार राखी वाले पूरे दिन हुमायूं का महिमामंडन करेंगे और उसे हिन्दुओं का रक्षक बताएँगे, जबकि वह तो खुद ही अफीमची और भगोड़ा था और हाँ, जिहादी भी था, अंतिम उद्देश्य उसका भी हिन्दुओं का खात्मा करके जिहाद ही करना था, तभी वह नहीं गया और सेक्युलर इतिहासकार और कोई कहानी कहते रहे!

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